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स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र की टोली से घबराते थे ब्रिटिश अफसर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 13 Aug 2021 12:06 AM IST
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British officers were afraid of freedom fighter Ramchandra's team
स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र। फाइल फोटो - फोटो : Bhiwani
तोशाम। आजादी के लिए तमाम यातनाएं झेलने वाले क्रांतिकारी के गांव के लोग इस समय पेयजल जैसी मूलभूत समस्या से लड़ रहे हैं। ग्रामीण खरीदकर पानी पीने को मजबूर हैं। पड़ोसी गांवों के संपर्क मार्ग भी खस्ताहाल हैं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस से प्रभावित होकर आईएनए में भर्ती हुए स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र ने आजादी के आंदोलन में क्रांतिकारी साथियों के साथ कई बार अंग्रेजों से लोहा लिया। शानदार नेतृत्व की वजह से ब्रिटिश अफसर भी इनकी टोली से घबराते थे, लेकिन अब आजादी के इस सिपाही के गांव मनसरवास के लोग पीने के पानी के संकट से लड़ रहे हैं।
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गांव के निवर्तमान सरपंच सनबीर मेचू ने बताया कि गांव में नहरी पानी नहीं आने से पेयजल संकट बना हुआ है। कुछ पानी आता है तो जलघर के टैंक में लीकेज के कारण बात नहीं बन रही। टैंक के लीकेज की समस्या को लेकर प्रशासन से कई बार गुहार लगा चुके हैं। गांव की फिरनी भी ऊबड़-खाबड़ है। उन्होंने बताया कि कैरू लिंक मार्ग भी टूटा हुआ है। आजादी के सिपाही स्व. रामचंद्र के पुत्र जयपाल सिंह जो ऑल इंडिया फ्रीडम फाइटर एक्सेस ऑर्गेनाइजेशन के महासचिव भी हैं। उन्होंने बताया कि गांव की पीएचसी ढाणीमाहू लगती है और ढाणीमाहू के लिए मार्ग नहीं है। उन्होंने बताया कि ढाणीमाहू का रास्ता बनने से जिला मुख्यालय की दूरी भी कम हो जाएगी।
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1942 में आईएनए में शामिल हुए थे रामचंद्र
आजादी के जांबाज सिपाही रामचंद्र का जन्म 8 जुलाई 1922 को हुआ था। बचपन से ही आजादी की भावना उनमें कूट-कूटकर भरी थी। 6 जुलाई 1940 को वे हांगकांग-सिंगापुर रॉयल तोपखाना में भर्ती है। बाद में रासबिहारी बोस के एक पर्चे को पढ़कर 1942 में आईएनए में भर्ती हो गए। नेताजी सुभाषचंद्र बोस से वे काफी प्रभावित थे और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। सिंगापुर, मलाया, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा में उनकी तैनाती रही। वहीं रंगून व मणिपुर में ब्रिटिश सेना के साथ सीधा मुकाबला हुआ। इस दौरान उनको जेल में काफी यातनाएं सहनी पड़ीं। 23 मई 2019 को उनका निधन हो गया।
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आजादी के इस सिपाही को कई बार सम्मानित किया गया। 9 अगस्त 2010 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति भवन बुलाकर सम्मानित किया। 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया। 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने, 21 अक्टूबर 1997 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने उनको सम्मानित किया।
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