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हरियाणवीं फिल्म बिन तेरे बेचैन की राष्ट्रीय स्तर पर दस्तक
ब्यूरो अमर उजाला
Updated Sun, 27 Mar 2016 12:26 AM IST
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राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड
- फोटो : अमर उजाला
घर के लिए जोड़े रुपयों से घर न बनाकर फिल्म बनाई। हरियाणवीं सिनेमा को जिंदा रखने के लिए बनाई फिल्म ऐसी बनी कि रिलीज होने से पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर दस्तक दे दिए। हम बात कर रहे है निर्माता, गीतकार व मुख्य कलाकार वीएम बेचैन की फिल्म तेरे बिन बेचैन की। पेरेंटर के सपनों, युवाओं के कॅरियर से बड़ी नहीं है मोहब्बत थीम पर बनी फिल्म में बेटी बचाने का भी संदेश दिया है। 63वें नेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गई फिल्म को अवार्ड मिलने की उम्मीद है। यह फिल्म विविध भाषा की श्रेणी में शामिल की गई है। 29 मार्च को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा की जाएगी।
दो साल पहले पानीपत की धरती से फिल्म निर्माण शुरू हुआ और अब फिल्म बनकर तैयार है। फिल्म की कहानी जितनी रोचक है उससे भी ज्यादा रोचक कहानी फिल्मकार की है। मौजूदा दौर में सोशल साइट्स के दुष्प्रभावों को दर्शाती फिल्म में पारिवारिक रिश्तों पर हावी होती युवाओं की मनोदशा को चित्रित किया गया है। साथ ही दर्शाया गया है कि मां बाप के सपने व कॅरियर से ज्यादा बड़ा प्यार नहीं हो सकता। ढाणी माहू गांव में फिल्म की शूटिंग के दौरान बेटी बचाओ के नारे के साथ बेटी बचाने का संदेश दिया गया था। यहां बच्चों के हत्यारे कंस के पुतले को भी जलाया गया है। फिल्म के निर्माता, गीतकार व मुख्य कलाकार वीएम बेचैन पिछले 20 साल से हरियाणवी कला संस्कृति व साहित्य के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं। अब तक पांच हरियाणवी किताब व एक उर्दू पुस्तक निकाल चुके हैं। कालीदास के संस्कृत नाटक अभिज्ञानशांकुतलम को शकुंतला अर दुष्यंत नाम से हरियाणवी में अनुवाद करने का काम भी इन्होंने किया।
घर नहीं बनाया, फिल्म बनाई
इसे हरियाणवीं संस्कृति के प्रति दीवानगी ही कहेंगे कि उन्होंने अपने मकान के लिए जमा किए रुपयों से मकान बनाने की बजाए फिल्म बनाई। वीएम बेचैन की वास्तविक एवं निजी जिंदगी भी किसी कहानी से कम नहीं है। एक मोची के घर पैदा हुए वीएम बेचैन ने फुटपाथ पर पिता के साथ जूते पॉलिश किए तो एक ही सपना था कि अपनी बोली व भाषा को किस तरह स्तरोन्नत किया जाए।
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तीसरी फिल्म जो पहुंची नेशनल फिल्म फेस्टिवल
तेरे बिन बेचैन से पहले वर्ष 2014 में पगड़ी नेशनल फिल्म फेस्टिवल में पहुंची। जिसे रजत कमल अवार्ड मिला। इससे पहले पहले 2001 में फिल्म लाडो को स्वर्ण कमल अवार्ड मिला।
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दो साल पहले पानीपत की धरती से फिल्म निर्माण शुरू हुआ और अब फिल्म बनकर तैयार है। फिल्म की कहानी जितनी रोचक है उससे भी ज्यादा रोचक कहानी फिल्मकार की है। मौजूदा दौर में सोशल साइट्स के दुष्प्रभावों को दर्शाती फिल्म में पारिवारिक रिश्तों पर हावी होती युवाओं की मनोदशा को चित्रित किया गया है। साथ ही दर्शाया गया है कि मां बाप के सपने व कॅरियर से ज्यादा बड़ा प्यार नहीं हो सकता। ढाणी माहू गांव में फिल्म की शूटिंग के दौरान बेटी बचाओ के नारे के साथ बेटी बचाने का संदेश दिया गया था। यहां बच्चों के हत्यारे कंस के पुतले को भी जलाया गया है। फिल्म के निर्माता, गीतकार व मुख्य कलाकार वीएम बेचैन पिछले 20 साल से हरियाणवी कला संस्कृति व साहित्य के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं। अब तक पांच हरियाणवी किताब व एक उर्दू पुस्तक निकाल चुके हैं। कालीदास के संस्कृत नाटक अभिज्ञानशांकुतलम को शकुंतला अर दुष्यंत नाम से हरियाणवी में अनुवाद करने का काम भी इन्होंने किया।
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घर नहीं बनाया, फिल्म बनाई
इसे हरियाणवीं संस्कृति के प्रति दीवानगी ही कहेंगे कि उन्होंने अपने मकान के लिए जमा किए रुपयों से मकान बनाने की बजाए फिल्म बनाई। वीएम बेचैन की वास्तविक एवं निजी जिंदगी भी किसी कहानी से कम नहीं है। एक मोची के घर पैदा हुए वीएम बेचैन ने फुटपाथ पर पिता के साथ जूते पॉलिश किए तो एक ही सपना था कि अपनी बोली व भाषा को किस तरह स्तरोन्नत किया जाए।
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तीसरी फिल्म जो पहुंची नेशनल फिल्म फेस्टिवल
तेरे बिन बेचैन से पहले वर्ष 2014 में पगड़ी नेशनल फिल्म फेस्टिवल में पहुंची। जिसे रजत कमल अवार्ड मिला। इससे पहले पहले 2001 में फिल्म लाडो को स्वर्ण कमल अवार्ड मिला।