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Ambala News: डेढ़ माह चलेगी श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी
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रवालों गांव स्थित गुरुद्वारा श्री हुकमसर साहिब के स्वर्गीय संत बाबा सावण सिंह जी।
- फोटो : अंबाला के सैन्य क्षेत्र में बनी डोमेस्टिक एयरपोर्ट की बिल्डिंग
अंबाला सिटी। रवालों गांव स्थित गुरुद्वारा श्री हुकमसर साहिब में स्वर्गीय श्री संत बाबा सावण सिंह की 18वीं बरसी के उपलक्ष्य में श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी शुरू हो गई।
श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी 18 अक्टूबर बरसी के दिन तक चलेगी। गुरुद्वारा साहिब में हर वर्ष श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी बढ़ती जा रही है। पहले जहां एक सप्ताह या 10 दिन पहले ही बरसी समागम की तैयारी शुरू होती थी, अब यह तैयारी डेढ़ से दो माह पहले ही शुरू हो रही है।
इस वर्ष बीती 23 अगस्त को श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी शुरू हो गई। गुरुद्वारा साहिब में बरसी पर महान गुरमति समागम हर वर्ष गुरुद्वारा साहिब के मुख्य सेवादार बाबा हरबंस सिंह की देखरेख में मनाया जाता है।
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इस वर्ष भी उनकी देखरेख में बरसी समागम की तैयारी चल रही है। बरसी समागम में हरियाणा-पंजाब समेत अन्य जगहों से संगत गुरुद्वारा साहिब में पहुंचती है। बरसी के दिन सुबह 9 से शाम 4 बजे तक ढाडी दरबार सजाए जाते हैं।
दिन-रात गुरुद्वारा साहिब में चल रही सेवा
रोजाना तड़के से देर रात तक गुरुद्वारा साहिब में सेवा चल रही है। हर तीसरे दिन श्री अखंड पाठ साहिब के भोग डाले जाते हैं और इसके बाद फिर श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी शुरू हो जाती है।
भोग डालने के उपरांत ही शब्द-कीर्तन होता है। साथ ही दोपहर में गुरु का लंगर बरताया जाता है। सेवा करने के लिए आसपास के गांवों से भी संगत पहुंच रही है और ग्रामीण भी गुरुद्वारा साहिब में बढ़-चढ़कर सेवा कर रहे हैं। रात को रोजाना गुरुद्वारा साहिब में बाबा हरबंस सिंह गुरबाणी जाप करवाते हैं।
18 अक्टूबर 2006 को सचखंड में विराजमान हुए थे बाबा सावण सिंह
ब्रह्मज्ञानी संत बाबा सावण सिंह का जन्म माजरी गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। उन्होंने जीवन-यापन के लिए जिम्मीदारों के साथ खेती-बाड़ी भी की। कार्य करने के दौरान भी बाबा सावण सिंह नाम-सिमरन में लीन रहते थे।
कुछ समय बाद वह महान पवित्र स्थानों की यात्रा पर निकल गए। उन्होंने गुरुद्वारा श्री लखनौर साहिब, मरदों साहिब, गेंदसर साहिब, पंजोखरा साहिब, नबाणा साहिब, श्री हजूर साहिब, श्री हेमकुंड साहिब ऐतिहासिक स्थानों की सेवा की। उन्होंने अपने जीवन में संगतों को श्री गुरुग्रंथ साहिब के चरणों में लगने के लिए प्रोत्साहित किया।
वह ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब की सेवा करते हुए रवालों गांव में पहुंच गए। यहां उन्होंने बिना किसी उगाही के संगत के सहयोग से गुरुद्वारा श्री हुकमसर साहिब की निष्काम सेवा करवाई।
इसके उपरांत इस स्थान का नाम गुरुद्वारा श्री हुकमसर साहिब रखा गया। उन्होंने वचन किए थे कि इस स्थान की महिमा दूर-दूर तक होगी। उन्होंने संगतों को गुरमति, गुरु-इतिहास, गुरबाणी बोध व कथा विचार करने की शिक्षा दी।
बाबा सावण सिंह जी 18 अक्टूबर 2006 को सचखंड में विराजमान हुए। संत बाबा सावण सिंह की बरसी हर वर्ष समूह गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी व संगत के सहयोग से मनाई जाती है।
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श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी 18 अक्टूबर बरसी के दिन तक चलेगी। गुरुद्वारा साहिब में हर वर्ष श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी बढ़ती जा रही है। पहले जहां एक सप्ताह या 10 दिन पहले ही बरसी समागम की तैयारी शुरू होती थी, अब यह तैयारी डेढ़ से दो माह पहले ही शुरू हो रही है।
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इस वर्ष बीती 23 अगस्त को श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी शुरू हो गई। गुरुद्वारा साहिब में बरसी पर महान गुरमति समागम हर वर्ष गुरुद्वारा साहिब के मुख्य सेवादार बाबा हरबंस सिंह की देखरेख में मनाया जाता है।
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इस वर्ष भी उनकी देखरेख में बरसी समागम की तैयारी चल रही है। बरसी समागम में हरियाणा-पंजाब समेत अन्य जगहों से संगत गुरुद्वारा साहिब में पहुंचती है। बरसी के दिन सुबह 9 से शाम 4 बजे तक ढाडी दरबार सजाए जाते हैं।
दिन-रात गुरुद्वारा साहिब में चल रही सेवा
रोजाना तड़के से देर रात तक गुरुद्वारा साहिब में सेवा चल रही है। हर तीसरे दिन श्री अखंड पाठ साहिब के भोग डाले जाते हैं और इसके बाद फिर श्री अखंड पाठ साहिब की लड़ी शुरू हो जाती है।
भोग डालने के उपरांत ही शब्द-कीर्तन होता है। साथ ही दोपहर में गुरु का लंगर बरताया जाता है। सेवा करने के लिए आसपास के गांवों से भी संगत पहुंच रही है और ग्रामीण भी गुरुद्वारा साहिब में बढ़-चढ़कर सेवा कर रहे हैं। रात को रोजाना गुरुद्वारा साहिब में बाबा हरबंस सिंह गुरबाणी जाप करवाते हैं।
18 अक्टूबर 2006 को सचखंड में विराजमान हुए थे बाबा सावण सिंह
ब्रह्मज्ञानी संत बाबा सावण सिंह का जन्म माजरी गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। उन्होंने जीवन-यापन के लिए जिम्मीदारों के साथ खेती-बाड़ी भी की। कार्य करने के दौरान भी बाबा सावण सिंह नाम-सिमरन में लीन रहते थे।
कुछ समय बाद वह महान पवित्र स्थानों की यात्रा पर निकल गए। उन्होंने गुरुद्वारा श्री लखनौर साहिब, मरदों साहिब, गेंदसर साहिब, पंजोखरा साहिब, नबाणा साहिब, श्री हजूर साहिब, श्री हेमकुंड साहिब ऐतिहासिक स्थानों की सेवा की। उन्होंने अपने जीवन में संगतों को श्री गुरुग्रंथ साहिब के चरणों में लगने के लिए प्रोत्साहित किया।
वह ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब की सेवा करते हुए रवालों गांव में पहुंच गए। यहां उन्होंने बिना किसी उगाही के संगत के सहयोग से गुरुद्वारा श्री हुकमसर साहिब की निष्काम सेवा करवाई।
इसके उपरांत इस स्थान का नाम गुरुद्वारा श्री हुकमसर साहिब रखा गया। उन्होंने वचन किए थे कि इस स्थान की महिमा दूर-दूर तक होगी। उन्होंने संगतों को गुरमति, गुरु-इतिहास, गुरबाणी बोध व कथा विचार करने की शिक्षा दी।
बाबा सावण सिंह जी 18 अक्टूबर 2006 को सचखंड में विराजमान हुए। संत बाबा सावण सिंह की बरसी हर वर्ष समूह गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी व संगत के सहयोग से मनाई जाती है।