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Ambala News: अपनों ने मुंह फेरा, अब विदेशी लाएंगे जीवन में सवेरा
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अंबाला सिटी। कहते हैं किस्मत का लिखा कोई बदल नहीं सकता। यदि किस्मत में सुख लिखा है, तो वह मिलकर ही रहेगा। यदि दुख है तो उसे भी टाला नहीं जा सकता। इन पंक्तियों को पूरी तरह से झूठा साबित कर रहे हैं कुछ विदेशी। अभी हाल ही में ऐसा ही कुछ हुआ बस में मिले एक लावारिस बच्चे के साथ।
डेढ़ साल पहले बस में लावारिस मिली एक बच्ची का भविष्य सुधारने के लिए कनाडा के एक परिवार में हाथ बढ़ाए हैं। इस परिवार के बच्ची को गोद लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जल्द ही कागजी कार्रवाई के बाद बच्ची को उस परिवार के साथ कनाडा भेज दिया जाएगा। बता दें कि जिला महिला और बाल विकास विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे पहले भी कुछ बच्चों को विदेश के परिवारों ने गोद लिया है। बता दें कि शून्य से छह साल तक के कुल 39 बच्चे हैं। ये बच्चे 2018 से 31 मार्च 2023 तक के बीच में मिले हैं। इनमें 21 बेटियां और 18 बेटे हैं। इनकी कुल संख्या 35 है।
गोद लेने तक प्रशासन करता है पालन
लावारिस हालत में मिलने के बाद छोटे बच्चों के घर का पता लगाना भी नामुमकिन होता है। ऐसे में जब तक बच्चे को माता-पिता गोद नहीं लेते हैं तब तक प्रशासन ही बच्चों की देखभाल करता है। वहीं, अगर कोई बच्चा रह भी जाता है तो 18 साल तक प्रशासन ही उसकी सेवा करता है। अगर बच्चा अच्छी पढ़ाई करता है तो 21 साल तक भी उसका सारा जिम्मा जिला महिला और बाल विकास विभाग की ओर से ही उठाया जाता है।
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नवजात मिलते ही होती है मेडिकल जांच
गैर संस्थागत देखभाल संरक्षण अधिकारी प्रीति शर्मा ने बताया कि संबंधित इलाके की पुलिस लावारिस नवजात मिलने पर चाइल्ड लाइन टीम (1098) को बुलाती है। चाइल्ड लाइन उसकी मेडिकल जांच कराती है। नवजात के स्वस्थ होने पर उसे सीडब्ल्यूसी (चाइल्ड वेलफेयर कमेटी) के सामने पेश किया जाता है। फिर मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद नवजात को दत्तक गृह इकाई में भेज दिया जाता है। जब नवजात को दत्तक गृह में भेजा जाता है तो तीन महीने तक सीडब्ल्यूसी उसके मां-बाप का इंतजार करता है। तीन महीने के बाद शिशु के एडॉप्शन की प्रक्रिया शुरू होती है। सीडब्ल्यूसी की वेबसाइट के जरिये संतानविहीन दंपत्ति शिशु को अडॉप्ट कर सकते हैं।
जिला बाल संरक्षण इकाई को मिले नवजात शिशु
साल-- लड़के-- लड़कियां
2008-- 00-- 01
2009-- 00-- 01
2010-- 01-- 02
2011-- 01-- 00
2012-- -01-- 05
2013-- 01-- 01
2014-- 02-- 02
2015-- 00-- 01
2016-- 02-- 00
2017-- 02-- 04
2018-- 03-- 00
2019-- 02-- 01
2021-- 01-- 01
2022-- 01-- 02
2023-- 01-- 00 मार्च तक
दत्तक ग्रहण करने के लिए पात्रता मापदंड
-एक ऐसे दंपत्ति को बच्चे का दत्तक ग्रहण करने अनुमति तक तक नहीं दी जा सकती, जब तक उनके वैवाहिक संबंध कम से कम दो वर्ष तक रहे हो।
-दत्तक ग्रहण करने वाले संभावित माता-पिता के पास बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन होने चाहिए।
-दत्तक ग्रहण करने वाले संभावित माता-पिता का स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए और उन्हें कोई संक्रामक या गंभीर रोग या मानसिक या शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं होनी चाहिए जो उसे बच्चे की देखभाल से रोक सके।
-दूसरे बच्चे के दत्तक ग्रहण की अनुमति केवल तभी दी जाती है जब प्रथम बच्चे के लिए कानूनी रूप से दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया गया हो परंतु यह भाई बहनों के मामलों में लागू नहीं है।
जो भी बच्चे मिलते हैं। उनकी तीन माह के बाद एडॉप्शन की प्रक्रिया शुरू होती है। अब तक कुल मिले बच्चों में से करीब 35 बच्चों को माता-पिता मिल गए हैं। इसमें कई बच्चे तो विदेश गए हैं। एक बच्चा जल्द चला जाएगा। अगर कोई लावारिस हालत में शिशु मिलता है तो इसकी सूचना चाइल्ड हेल्प लाइन नंबर और पुलिस को जरूर दें।
- कविता, जिला कार्यक्रम अधिकारी, जिला महिला एवं बाल विकास विभाग।
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डेढ़ साल पहले बस में लावारिस मिली एक बच्ची का भविष्य सुधारने के लिए कनाडा के एक परिवार में हाथ बढ़ाए हैं। इस परिवार के बच्ची को गोद लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जल्द ही कागजी कार्रवाई के बाद बच्ची को उस परिवार के साथ कनाडा भेज दिया जाएगा। बता दें कि जिला महिला और बाल विकास विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे पहले भी कुछ बच्चों को विदेश के परिवारों ने गोद लिया है। बता दें कि शून्य से छह साल तक के कुल 39 बच्चे हैं। ये बच्चे 2018 से 31 मार्च 2023 तक के बीच में मिले हैं। इनमें 21 बेटियां और 18 बेटे हैं। इनकी कुल संख्या 35 है।
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गोद लेने तक प्रशासन करता है पालन
लावारिस हालत में मिलने के बाद छोटे बच्चों के घर का पता लगाना भी नामुमकिन होता है। ऐसे में जब तक बच्चे को माता-पिता गोद नहीं लेते हैं तब तक प्रशासन ही बच्चों की देखभाल करता है। वहीं, अगर कोई बच्चा रह भी जाता है तो 18 साल तक प्रशासन ही उसकी सेवा करता है। अगर बच्चा अच्छी पढ़ाई करता है तो 21 साल तक भी उसका सारा जिम्मा जिला महिला और बाल विकास विभाग की ओर से ही उठाया जाता है।
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नवजात मिलते ही होती है मेडिकल जांच
गैर संस्थागत देखभाल संरक्षण अधिकारी प्रीति शर्मा ने बताया कि संबंधित इलाके की पुलिस लावारिस नवजात मिलने पर चाइल्ड लाइन टीम (1098) को बुलाती है। चाइल्ड लाइन उसकी मेडिकल जांच कराती है। नवजात के स्वस्थ होने पर उसे सीडब्ल्यूसी (चाइल्ड वेलफेयर कमेटी) के सामने पेश किया जाता है। फिर मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद नवजात को दत्तक गृह इकाई में भेज दिया जाता है। जब नवजात को दत्तक गृह में भेजा जाता है तो तीन महीने तक सीडब्ल्यूसी उसके मां-बाप का इंतजार करता है। तीन महीने के बाद शिशु के एडॉप्शन की प्रक्रिया शुरू होती है। सीडब्ल्यूसी की वेबसाइट के जरिये संतानविहीन दंपत्ति शिशु को अडॉप्ट कर सकते हैं।
जिला बाल संरक्षण इकाई को मिले नवजात शिशु
साल
2008
2009
2010
2011
2012
2013
2014
2015
2016
2017
2018
2019
2021
2022
2023
दत्तक ग्रहण करने के लिए पात्रता मापदंड
-एक ऐसे दंपत्ति को बच्चे का दत्तक ग्रहण करने अनुमति तक तक नहीं दी जा सकती, जब तक उनके वैवाहिक संबंध कम से कम दो वर्ष तक रहे हो।
-दत्तक ग्रहण करने वाले संभावित माता-पिता के पास बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन होने चाहिए।
-दत्तक ग्रहण करने वाले संभावित माता-पिता का स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए और उन्हें कोई संक्रामक या गंभीर रोग या मानसिक या शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं होनी चाहिए जो उसे बच्चे की देखभाल से रोक सके।
-दूसरे बच्चे के दत्तक ग्रहण की अनुमति केवल तभी दी जाती है जब प्रथम बच्चे के लिए कानूनी रूप से दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया गया हो परंतु यह भाई बहनों के मामलों में लागू नहीं है।
जो भी बच्चे मिलते हैं। उनकी तीन माह के बाद एडॉप्शन की प्रक्रिया शुरू होती है। अब तक कुल मिले बच्चों में से करीब 35 बच्चों को माता-पिता मिल गए हैं। इसमें कई बच्चे तो विदेश गए हैं। एक बच्चा जल्द चला जाएगा। अगर कोई लावारिस हालत में शिशु मिलता है तो इसकी सूचना चाइल्ड हेल्प लाइन नंबर और पुलिस को जरूर दें।
- कविता, जिला कार्यक्रम अधिकारी, जिला महिला एवं बाल विकास विभाग।