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Ambala News: दो दशक के बाद भी शहीद की वर्दी और पगड़ी देख आंखें हो जाती हैं नम
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अंबाला। बराड़ा खंड के कांसापुर गांव के शहीद मनजीत सिंह की शहादत के 25 वर्ष बाद भी परिजनों ने उनकी वर्दी और पगड़ी संभाल रखी है, जिसे देख आज भी माता-पिता की आंखें नम हो जाती हैं। साथ ही देश की रक्षा के लिए शहीद हुए बेटे की याद उन्हें गर्व का भी अहसास कराती है। परिजनों की ओर से शहीद मनजीत सिंह की याद में हर वर्ष पांच से सात जून तक पाठ करवाया जाता है। साथ ही लंगर का आयोजन किया जाता है।
शहीद मनजीत सिंह की बुजुर्ग माता सुरजीत कौर और पिता गुरचरण सिंह बताते हैं कि उनका बेटा बहुत बहादुर था। दादा सरदार सिंह से प्रेरणा लेकर वह बचपन से ही सेना में जाना चाहता था। परिजनों ने भी उसका उत्साह बढ़ाया और वो सेना में भर्ती हो गया था। उसकी शहादत को 25 वर्ष बीत गए पर आज भी ऐसा लगता है कि वह उनकी आंखों के सामने है। जब भी बेटे की याद आती है तो घर पर संभालकर रखी गई उसकी पगड़ी और सेना की वर्दी देख लेते हैं। दो वर्ष पहले सेना ने कारगिल दिवस पर रैली निकाली थी। उस रैली के दौरान उनको तिरंगा झंडा दिया गया था, यह तिरंगा झंडा बेटे की याद में गांव में बने द्वार पर लगाया गया है।
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17 वर्ष की उम्र में हुए भर्ती, पहली पोस्टिंग में साढ़े 18 वर्ष की आयु में कारगिल में शहीद
पिता गुरचरण सिंह बताते हैं कि बेटे मनजीत सिंह की 7 जून 1999 में कारगिल युद्ध में शहादत हो गई थी। वह महज 17 वर्ष की उम्र में सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुआ था। पठानकोट से प्रशिक्षण के बाद उसकी पहली पोस्टिंग कारगिल में ही हुई थी। ग्रेनेड लगने से उनके शरीर का बांया हिस्सा बुरी तरह जख्मी हो गया था। जिससे उनकी मौके पर ही शहादत हो गई। उन्होंने बताया कि शहीद मनजीत सिंह के बड़े भाई हरजीत सिंह भी सेना में थे। 2018 में उनकी सड़क हादसे में मौत हो गई थी। शहीद मनजीत सिंह के भतीजे हर्षजोत सिंह ने बताया कि उनके चाचा शहीद मनजीत सिंह की वर्दी और उनसे जुड़ी निशानियां आज भी परिवार ने संभालकर रखी हुई हैं। हर वर्ष उनकी याद में पाठ रखा जाता है और लंगर भी लगाया जाता है।
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फोटो-- -49
शहीद के नाम पर खुला स्कूल बंद होने और गांव के लिए रास्ता न मिलने का मलाल
संवाद न्यूज एजेंसी
मुलाना। शहीद मनजीत सिंह के पिता गुरचरण सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-344 पर उनका गांव पड़ता है। हाईवे पर उनके गांव को जाने के लिए कोई कट नहीं दिया गया है। इस कारण डेढ़ किलोमीटर घूमकर गांव में आना पड़ता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री तक को इस बारे में चिट्ठी लिखकर रास्ता मांगा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। वहीं कांसापुर गांव में बच्चों के शिक्षा ग्रहण करने के लिए शहीद मनजीत सिंह के नाम से राजकीय प्राथमिक विद्यालय का नाम रखा गया था, लेकिन कम छात्र होने के चलते इसे बंद कर दिया गया। परिजन व ग्रामीण लंबे समय तक इस स्कूल को दोबारा खोलने की गुहार लगाते रहे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। यही नहीं शहीद मनजीत सिंह के नाम पर बना पुस्तकालय भी कई सालों से बंद है। इसके अलावा गांव में लगे गौरव पट्ट पर शहीद मनजीत सिंह का नाम अंकित नहीं है, जबकि प्रदेश सरकार के निर्देशानुसार गांवों के प्रवेश द्वार पर जो गौरव पट्ट बनाए गए हैं। उन पर शहीदों के भी नाम अंकित किए जाने हैं।
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शहीद मनजीत सिंह की बुजुर्ग माता सुरजीत कौर और पिता गुरचरण सिंह बताते हैं कि उनका बेटा बहुत बहादुर था। दादा सरदार सिंह से प्रेरणा लेकर वह बचपन से ही सेना में जाना चाहता था। परिजनों ने भी उसका उत्साह बढ़ाया और वो सेना में भर्ती हो गया था। उसकी शहादत को 25 वर्ष बीत गए पर आज भी ऐसा लगता है कि वह उनकी आंखों के सामने है। जब भी बेटे की याद आती है तो घर पर संभालकर रखी गई उसकी पगड़ी और सेना की वर्दी देख लेते हैं। दो वर्ष पहले सेना ने कारगिल दिवस पर रैली निकाली थी। उस रैली के दौरान उनको तिरंगा झंडा दिया गया था, यह तिरंगा झंडा बेटे की याद में गांव में बने द्वार पर लगाया गया है।
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17 वर्ष की उम्र में हुए भर्ती, पहली पोस्टिंग में साढ़े 18 वर्ष की आयु में कारगिल में शहीद
पिता गुरचरण सिंह बताते हैं कि बेटे मनजीत सिंह की 7 जून 1999 में कारगिल युद्ध में शहादत हो गई थी। वह महज 17 वर्ष की उम्र में सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुआ था। पठानकोट से प्रशिक्षण के बाद उसकी पहली पोस्टिंग कारगिल में ही हुई थी। ग्रेनेड लगने से उनके शरीर का बांया हिस्सा बुरी तरह जख्मी हो गया था। जिससे उनकी मौके पर ही शहादत हो गई। उन्होंने बताया कि शहीद मनजीत सिंह के बड़े भाई हरजीत सिंह भी सेना में थे। 2018 में उनकी सड़क हादसे में मौत हो गई थी। शहीद मनजीत सिंह के भतीजे हर्षजोत सिंह ने बताया कि उनके चाचा शहीद मनजीत सिंह की वर्दी और उनसे जुड़ी निशानियां आज भी परिवार ने संभालकर रखी हुई हैं। हर वर्ष उनकी याद में पाठ रखा जाता है और लंगर भी लगाया जाता है।
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शहीद के नाम पर खुला स्कूल बंद होने और गांव के लिए रास्ता न मिलने का मलाल
संवाद न्यूज एजेंसी
मुलाना। शहीद मनजीत सिंह के पिता गुरचरण सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-344 पर उनका गांव पड़ता है। हाईवे पर उनके गांव को जाने के लिए कोई कट नहीं दिया गया है। इस कारण डेढ़ किलोमीटर घूमकर गांव में आना पड़ता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री तक को इस बारे में चिट्ठी लिखकर रास्ता मांगा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। वहीं कांसापुर गांव में बच्चों के शिक्षा ग्रहण करने के लिए शहीद मनजीत सिंह के नाम से राजकीय प्राथमिक विद्यालय का नाम रखा गया था, लेकिन कम छात्र होने के चलते इसे बंद कर दिया गया। परिजन व ग्रामीण लंबे समय तक इस स्कूल को दोबारा खोलने की गुहार लगाते रहे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। यही नहीं शहीद मनजीत सिंह के नाम पर बना पुस्तकालय भी कई सालों से बंद है। इसके अलावा गांव में लगे गौरव पट्ट पर शहीद मनजीत सिंह का नाम अंकित नहीं है, जबकि प्रदेश सरकार के निर्देशानुसार गांवों के प्रवेश द्वार पर जो गौरव पट्ट बनाए गए हैं। उन पर शहीदों के भी नाम अंकित किए जाने हैं।