चौधर की नैया फिर मझधार में, प्रचार थमा
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हरियाणा में पंचायती चुनाव को लेकर सरकार द्वारा लगाई गई शैक्षणिक योग्यता शर्त पर फैसला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सरकार के इस नए नियम पर अंतरित रोक लगा रखी है। लेकिन राज्य चुनाव आयुक्त ने भी अगली सुनवाई तक फिलहाल पंचायत चुनाव को टालने के आदेश दे दिए हैं। अंबाला के खंड साहा व बराड़ा में अब 4 अक्तूबर को होने वाले चुनाव स्थगित हो गए हैं। ये चुनाव अब कब होंगे, इस बारे में राज्य चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद ही फैसला लेगा। इसी के मद्देनजर राज्य चुनाव आयोग के निर्देशों पर अंबाला में भी तमाम चुनावी प्रक्रिया पर ब्रेक लग गई है। प्रशासनिक चुनावी प्रक्रिया को बंद कर दिया गया है, जबकि मंगलवार को होने वाली प्रत्याशियों के नामाकंन पत्रों की छंटनी कार्यक्रम को भी टाल दिया गया है। अंबाला के निर्वाचन अधिकारी का कहना है कि ये प्रशासनिक प्रक्रिया अब आगामी आदेशों के बाद ही शुरू होगी। ऐसे में अब पंचायत के दावेदारों की नैया फिर मझधार में फंस गई है। अब राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में 7 अक्टूबर को प्रस्तुत किए जाने वाले उत्तर पर ही इनका भविष्य निर्भर करेगा।
फीकी पड़ गई गांवों में चुनावी चौपाल चुनावों पर फिलहाल ब्रेक लगने क बाद गांवों का राजनीतिक माहौल भी एकदम करवट ले गया। गांवों की चौराहों, बैठकों व बाड़ों में जमने वाली चुनावी मजमें एक दम से फीके पड़ गए। चौधराहट पाने के लिए जिन प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल कर दिया है, उनकी चौधराहट फीकी पड़ गई है। प्रत्याशियों के समर्थक पूरी तरह से सुस्त हो चुके हैं और चुनावी प्रचार भी पूरी तरह से ही फिलहाल रोक दिया गया है। गांवों में माहौल यह रहा कि मंगलवार को विभिन्न गांवों में समर्थकों की धमा-चौकड़ी तो लगी और चुनावी चर्चा भी होती रही, लेकिन मायूसी के साथ। पंच, सरपंच, पंचायत समिति व जिला परिषद के प्रत्याशी और उनके समर्थक अपने-अपने खेमों में मायूस बैठे रहे। इन खेमों में मायूसी के साथ चुनावों पर ब्रेक लगाने संबंधी चरचा होती रही।
प्रत्याशियों को लगा आर्थिक झटका इस चुनावी प्रक्रिया थमने से जहां एक ओर नामांकन भरने वाले प्रत्याशियों को खासा झटका लगा है, नामांकन फीस और अभी तक अपने प्रचार अभियान में वे करोड़ों रुपये खर्च चुके हैं। ये सभी फिलहाल बर्बाद होता ही दिख रहा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद अब नए सिरे से चुनाव की डेट आएगी और नए सिरे से चुनाव होंगे। नामांकन भरने वाले प्रत्याशी परमजीत सिंह, बशेशर सिंह, कुलविंद्र सिंह, जंग सिंह, बलजीत सिंह व जसपाल सिंह ने बताया कि वे नामांकन फीस के साथ-साथ अपने शुरुआती प्रचार अभियान में भी कुछ रुपये खर्च चुके हैं। लेकिन अब ये पंगा पड़ गया है। इससे उनके साथ-साथ उनके समर्थक भी मायूस है।
3546 दावेदारों ने ठोकी थी ताल अंबाला में पंचायत चुनावों को लेकर विभिन्न पदों पर चुनाव लडने के लिए 3546 दावेदारों ने ताल ठोकी थी। इनमें पंच के लिए 2193 दावेदारों ने, सरपंच पद के लिए 918 दावेदारों ने, पंचायत समिति के लिए 267 दावेदारों ने व जिला परिषद के लिए 168 दावेदारों ने नामांकन भरा था। लेकिन अब ये सभी हजारों लोग मायूस है, क्योंकि नामांकन फीस के साथ-साथ वे लोग प्रारंभिक चुनावी प्रचार में भी काफी रुपया खर्च कर चुके हैं।
सहकारी बैंक और बिजली निगम की बल्ले-बल्ले चुनाव पर भले ही ब्रेक लग गया, लेकिन इस सारी प्रक्रिया में सहकारी बैंक और बिजली निगम की बल्ले-बल्ले हो गई। अंबाला में ही दोनों संस्थाओं ने करीबन पांच करोड़ रुपये अपने बकाया के वसूल कर लिए हैं। सरकार की शर्त थी कि जो लोग चुनाव लड़ना चाहते हैं, उनका सहकारी बैंक व बिजली निगम की तरफ कोई बकाया नहीं होना चाहिए। इसी को लेकर हजारों प्रत्याशियों ने मैदान में कूदने से पहले अपने-अपने सहकारी बैंकों व बिजली निगम में करोड़ों के बकाया को क्लीयर करवाया और फिर वहां से एनओसी लेकर अपना नामांकन पत्र दाखिला किया। लेकिन करोड़ों रुपये बकाया चुकाने के बावजूद भी प्रत्याशियों को चुनावी प्रक्रिया पचड़े में पड़ने की वजह से खासा झटका लगा है, लेकिन सहकारी बैंक व बिजली निगम की कमाई हो गई है।
पुराने चौधरियों में आया जोश इस पंचायत चुनाव में हरियाणा ने शैक्षणिक योग्यता की शर्त लागू कर दी थी। सरपंच पद के लिए दसवीं व आरक्षित महिला के लिए पांचवीं पास होना अनिवार्य था। सरकार की सोच थी कि गांवों की चौधराहट करने वाले पंच, सरपंच, जिला परिषद व पंचायत समिति सदस्य कम से कम पढ़े-लिखें तो हों। लेकिन सरकार की ये सोच पुराने कम पढ़े-लिखे चौधरियों को रास नहीं आई। ये वे धुरंधर पूर्व चौधरी है, जो पहले अपने-अपने गांवों में कई बार पंच, सरपंच रह चुके हैं, लेकिन इस बार शैक्षणिक योग्यता की शर्त की वजह से चुनावी दंगल से बाहर थे। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट की इस मामले पर तल्ख तेवरों के चलते इन पुराने धुरंधर चौधरियों में भी उत्साह बढ़ गया है और इन पुराने चौधरियों ने भी अब चुनावी दंगल में कूदने की रणनीति तैयार कर ली है। इन लोगों का कहना है कि वे कम पढ़े-लिखे हैं, लेकिन पंचायत चलाने का उन्हें खासा अनुभव है। मगर शैक्षणिक योग्यता की वजह से उन्हें अपनी ओर से दूसरे प्रत्याशी उतारने पड़ रहे थे। लेकिन अब यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन जैसे कम शिक्षित ग्रामीणों के पक्ष में आ गया, तो वे भी चुनाव जरूर लड़ेंगे।
राज्य चुनाव आयोग के निर्देशों के चलते तमाम चुनावी प्रक्रिया को रोक दिया गया है। नामांकन पत्रों की जांचने की प्रक्रिया भी फिलहाल थम गई है। आयोग की ओर से जो भी आगामी आदेश आएंगे, उनके मुताबिक ही प्रशासन आगे काम करेगा। -मनदीप सिंह बराड़, डीसी, अंबाला