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Ambala News: भागवत कथा है अमृत से भी श्रेष्ठ भक्ति वेदांत सिद्धांति
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अंबाला छावनी में श्री कुंज बिहारी गौडीय मठ परिसर में श्री भागवत कथा सुनते श्रद्धालु।
अंबाला। छावनी में श्री भक्त बांधव समिति की ओर से श्री कुंज बिहारी गौडीय मठ परिसर में श्री भागवत में सोमवार को चतुर्थ दिवस की कथा का आयोजन किया। इस दौरान श्रीपाद भक्ति वेदांत सिद्धांति महाराज ने समुद्र मंथन का प्रसंग बहुत विस्तारपूर्वक समझाया।
हमें भगवान के प्रसाद का आदर करना चाहिए। इंद्र ने भगवान की प्रसादी माला का सम्मान नहीं किया और अपने हाथी को पहना दिया और हाथी ने उसे नीचे गिराकर पैरों से कुचल दिया, जिससे इंद्र को अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा। असुरों से अपने राज्य को वापस लेने के उपाय स्वरूप भगवान ने उनको समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्ति के बारे में बताया।
मंदराचल पर्वत की मधानी बनाई गई और वासुकी नाग से रस्सी, जिसको कछुए के रूप में भगवान ने कूर्म अवतार लेकर अपनी पीठ पर धारण किया। सांप के मुख को देवताओं ने पकड़ा और मूछ वाले भाग को असुरों ने पकड़ा। एक-एक करके समुद्र से सबसे पहले विष प्राप्त हुआ। इस विष को शिवजी ने अपने कंठ में धारण किया और वह नीलकंठ कहलाए।
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उसके बाद समुद्र से उच्चश्रवा घोड़ा निकला, जिसे राजा बलि ने ले लिया। ऐरावत हाथी इंद्र ने लिया। कौस्थुभ मणि प्रकट हुई इसे भगवान अपने कंठ में धारण कर लिया। इसके साथ ही पारिजात वृक्ष, कामधेनु, कल्पवृक्ष, वारुणी एवम लक्ष्मी इत्यादि प्रकट हुए। इसके बाद धन्वंतरी भगवान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों में झगड़ा होने लगा।
यह देख भगवान स्वयं मोहिनी अवतार लेकर आए, उन्होंने छलपूर्वक वह अमृत देवताओं को पिला दिया, लेकिन देवताओं के बीच में राहु आकर बैठ गया, चांद और सूरज के बीच में। यह देख मोहिनी का रूप धारण किए भगवान ने अपने चक्र से उसका गला काट दिया। इस कारण से सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण भी घटित होता है ।
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हमें भगवान के प्रसाद का आदर करना चाहिए। इंद्र ने भगवान की प्रसादी माला का सम्मान नहीं किया और अपने हाथी को पहना दिया और हाथी ने उसे नीचे गिराकर पैरों से कुचल दिया, जिससे इंद्र को अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा। असुरों से अपने राज्य को वापस लेने के उपाय स्वरूप भगवान ने उनको समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्ति के बारे में बताया।
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मंदराचल पर्वत की मधानी बनाई गई और वासुकी नाग से रस्सी, जिसको कछुए के रूप में भगवान ने कूर्म अवतार लेकर अपनी पीठ पर धारण किया। सांप के मुख को देवताओं ने पकड़ा और मूछ वाले भाग को असुरों ने पकड़ा। एक-एक करके समुद्र से सबसे पहले विष प्राप्त हुआ। इस विष को शिवजी ने अपने कंठ में धारण किया और वह नीलकंठ कहलाए।
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उसके बाद समुद्र से उच्चश्रवा घोड़ा निकला, जिसे राजा बलि ने ले लिया। ऐरावत हाथी इंद्र ने लिया। कौस्थुभ मणि प्रकट हुई इसे भगवान अपने कंठ में धारण कर लिया। इसके साथ ही पारिजात वृक्ष, कामधेनु, कल्पवृक्ष, वारुणी एवम लक्ष्मी इत्यादि प्रकट हुए। इसके बाद धन्वंतरी भगवान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों में झगड़ा होने लगा।
यह देख भगवान स्वयं मोहिनी अवतार लेकर आए, उन्होंने छलपूर्वक वह अमृत देवताओं को पिला दिया, लेकिन देवताओं के बीच में राहु आकर बैठ गया, चांद और सूरज के बीच में। यह देख मोहिनी का रूप धारण किए भगवान ने अपने चक्र से उसका गला काट दिया। इस कारण से सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण भी घटित होता है ।