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कहानी 71 की जंग की: गोली कान के पास से निकली तो बढ़ गया हौसला, अब भी जेहन में ताजा है गोलियों की तड़तड़ाहट
Thu, 16 Dec 2021 12:27 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महराजगंज।
संवाद न्यूज एजेंसी, महराजगंज।
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 16 Dec 2021 12:27 PM IST
सार
बांग्लादेश की आजादी के लिए महराजगंज जिले के फरेंदा क्षेत्र के कई जवानों ने जान की बाजी लगादी थी। पूर्व सैनिक उस युद्ध की वीर गाथा सुनाते हुए रोमांचित हो उठते हैं।
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विजय दिवस।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की बात सामने आते ही सेवानिवृत्त सैनिकों के जहन में तोपों के धमाके व गोलियों की तडतड़ाहट गूंज उठती है। 50 साल पहले युद्ध में भाग लेने वाले सैनिक गर्व से बताते हैं कि उस समय कैसे पाकिस्तानी सेना के जनरल अमीर अब्दुल्ला नियाजी के नेतृत्व में 93 हजार सैनिकों ने घुटनों के बल पर चलते हुए जान बचाने की गुहार के साथ आत्मसमर्पण किया था। इस युद्ध में महराजगंज जिले के फरेंदा क्षेत्र के कई जवानों ने जान की बाजी लगाते हुए देश की रक्षा की थी। पूर्व सैनिक उस युद्ध की वीर गाथा सुनाते हुए रोमांचित हो उठते हैं।
सूबेदार मेजर सुखबहादुर गुरूंग (74) ने बताया युद्ध के दौरान वह लोगेंवाला सेक्टर में तैनात रहे। एक गोली कान के पास से निकली तो जोश और बढ़ गया। हमारी यूनिट पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर करते हुए आगे बढ़ी। तत्कालीन सेना प्रमुख फील्ड मार्शल मानिक शॉ सभी सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे।
नायब सुबेदार रामप्रसाद (83) ने यादों को ताजा करते हुए बताया कि 1971 में वह जम्मू के श्रीनगर छम्य जोड़िया इलाके में तैनात थे। युद्ध शुरू होते ही उन्हें तथा उनके साथियों को तत्काल अखनूर सेक्टर के लिए मूव करने का आदेश मिला। अखनूर सेक्टर में भयंकर युद्ध हो रहा था, पूरा इलाका तोपों के गोलों के धमाके व गोलियों की तड़तड़ाहत से गूंज रहा था। युद्ध में साथ के 45 जवान व दो अफसर शहीद हुए। कई बार गोली लगने से वह भी बाल-बाल बचे। भरतीय सैनिक मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। दुश्मन का कोई भी विमान उड़ने लायक नहीं छोड़ा गया। भारतीय सेना के साहस से पाकिस्तानी सेना आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हुई।
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प्रेम बहादुर गुरूंग (70) ने बताया 1971 में वह बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप में तैनात थे। युद्ध शुरू हुआ तो पाकिस्तान के नागी पोस्ट एरिया में जाने का आदेश मिला। तैनाती स्थल से नागी पोस्ट एरिया की दूरी करीब 60 किलोमीटर थी। सूचना मिली कि रास्ते में दुश्मन ने माइंस बिछा दिए हैं, जिसको डिफ्यूज करके सड़क बनाते हुए पहुंचना था। चारों तरफ से गोलाबारी हो रही थी। जिसमें कई जवान भी शहीद हुए। आज भी चर्चा होने पर वो मंजर आंखों के सामने आ जाता है।
फेम बहादुर गुरूंग (70 ) ने बताया उस समय वह जम्मू के सांबा सेक्टर में देवीगढ़ पिकेट पर तैनात रहे। आमने-सामने का युद्ध हो रहा था। फ्रंट पर रहकर युद्ध लड़ रहे थे। पूरी रात युद्ध चलता रहा। आंखो के सामने जवान शहीद हो रहे थे लेकिन भारतीय जवानों का हौसला बढ़ता जा रहा था। नतीजा पाकिस्तान के दो टुकड़े के रूप में आपके सामने है। 3 दिसबंर से शुरू हुआ युद्ध 13 दिन के बाद भारतीय सेना की जीत के साथ समाप्त हुआ। पाकिस्तानी जनरल नियाजी ने अपने सैनिकों के साथ 16 दिसबंर 1971 को ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया था।
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सूबेदार मेजर सुखबहादुर गुरूंग (74) ने बताया युद्ध के दौरान वह लोगेंवाला सेक्टर में तैनात रहे। एक गोली कान के पास से निकली तो जोश और बढ़ गया। हमारी यूनिट पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर करते हुए आगे बढ़ी। तत्कालीन सेना प्रमुख फील्ड मार्शल मानिक शॉ सभी सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे।
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नायब सुबेदार रामप्रसाद (83) ने यादों को ताजा करते हुए बताया कि 1971 में वह जम्मू के श्रीनगर छम्य जोड़िया इलाके में तैनात थे। युद्ध शुरू होते ही उन्हें तथा उनके साथियों को तत्काल अखनूर सेक्टर के लिए मूव करने का आदेश मिला। अखनूर सेक्टर में भयंकर युद्ध हो रहा था, पूरा इलाका तोपों के गोलों के धमाके व गोलियों की तड़तड़ाहत से गूंज रहा था। युद्ध में साथ के 45 जवान व दो अफसर शहीद हुए। कई बार गोली लगने से वह भी बाल-बाल बचे। भरतीय सैनिक मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। दुश्मन का कोई भी विमान उड़ने लायक नहीं छोड़ा गया। भारतीय सेना के साहस से पाकिस्तानी सेना आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हुई।
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प्रेम बहादुर गुरूंग (70) ने बताया 1971 में वह बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप में तैनात थे। युद्ध शुरू हुआ तो पाकिस्तान के नागी पोस्ट एरिया में जाने का आदेश मिला। तैनाती स्थल से नागी पोस्ट एरिया की दूरी करीब 60 किलोमीटर थी। सूचना मिली कि रास्ते में दुश्मन ने माइंस बिछा दिए हैं, जिसको डिफ्यूज करके सड़क बनाते हुए पहुंचना था। चारों तरफ से गोलाबारी हो रही थी। जिसमें कई जवान भी शहीद हुए। आज भी चर्चा होने पर वो मंजर आंखों के सामने आ जाता है।
फेम बहादुर गुरूंग (70 ) ने बताया उस समय वह जम्मू के सांबा सेक्टर में देवीगढ़ पिकेट पर तैनात रहे। आमने-सामने का युद्ध हो रहा था। फ्रंट पर रहकर युद्ध लड़ रहे थे। पूरी रात युद्ध चलता रहा। आंखो के सामने जवान शहीद हो रहे थे लेकिन भारतीय जवानों का हौसला बढ़ता जा रहा था। नतीजा पाकिस्तान के दो टुकड़े के रूप में आपके सामने है। 3 दिसबंर से शुरू हुआ युद्ध 13 दिन के बाद भारतीय सेना की जीत के साथ समाप्त हुआ। पाकिस्तानी जनरल नियाजी ने अपने सैनिकों के साथ 16 दिसबंर 1971 को ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया था।