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एक्सक्लूसिव: हत्या में भुगत रहा आजीवन कारावास की सजा, अब कैदी बन गया कार्मिक अफसर

Sun, 14 Mar 2021 05:12 PM IST
vivek shukla शिवम सिंह, गोरखपुर।
शिवम सिंह, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sun, 14 Mar 2021 05:12 PM IST
सार

  • दाढ़ी चाचा को याद है जेल के 1850 कैदियों और बंदियों के नाम
  • गूगल जैसा चलता है दिमाग, पल भर में बताते हैं कैदियों के बारे में कोई भी जानकारी

 

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special story on Dadhi wale chacha in Gorakhpur jail
गोरखपुर जेल। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हत्या में आजीवन कारावास की सजा काट रहे शेषनाथ यादव (66) उर्फ दाढ़ी चाचा मंडलीय कारागार गोरखपुर में कार्मिक अफसर बन गए हैं। उनकी याददाश्त इतनी तेज है कि उन्हें गूगल कहा जाता है। उन्हें जेल के 1850 कैदियों और बंदियों के नाम व उनकी बैरक मुंहजबानी याद है, जिसे वह एक पल में बता देते हैं। स्थिति यह है कि जेल में कोई भी जानकारी इन्हीं से ली जाती है।

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जेल रिकॉर्ड के मुताबिक, शेषनाथ करीब 16 साल पहले जेल में आए थे। हत्या के मामलेे में आजीवन कारावास की सजा होने के बाद जेल के स्थायी कैदी बनकर आए शेषनाथ ने दो साल में ही अपनी पहचान ढाढ़ी चाचा के रूप में बना ली। बेहतर काम करने लगे तो जेल अफसरों की नजर उन पर पड़ी।
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आठ साल पूरा होते ही इन्हें आदर्श कैदी बना दिया गया। इस तरह यह जेल प्रशासन के मददगार की भूमिका में आ गए। अफसरों की चाय और नाश्ते की व्यवस्था देखने के साथ ही जेल में बंद, बंदी-कैदी की निगरानी करने लगे। कैदी होने की वजह से सभी इनकी बात मान भी जाते हैं। नियम-कानून का सख्ती से पालन भी करवाते हैं।
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नाम, पता और अपराध का डाटा दिमाग में

शेषनाथ यादव को ढाढ़ी चाचा उपनाम बंदियों ने दिया है। इन्हें एक-एक बंदी का नाम, पता, किस अपराध में, कब से बंद है तथा किस बैरक में रहता है, सब याद है। जेल कर्मियों को भी तत्काल किसी कैदी के बारे में जानकारी लेनी होती है तो वे इनकी मदद लेते हैं। मुलाकात के समय ये कैदियों को बैरकों से बुलाने का काम भी करते हैं।

बस्ती में पट्टीदार की हत्या में हुई थी कैद
बस्ती के मूल निवासी ढाढ़ी चाचा को पट्टीदारी के विवाद में हुई हत्या में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इनकी फाइल सजा माफी के लिए भेजी गई थी, लेकिन मंजूरी नहीं मिल पाई।

दो और कैदी भी करते हैं दफ्तर का काम
ढाढ़ी चाचा की तरह ही आजीवन कारावास की सजा काट रहे सुदामा यादव उर्फ साधु और संजू दुबे भी अच्छे व्यवहार की वजह से आदर्श कैदी हैं। ये भी दफ्तर का काम निपटाने में जेल प्रशासन की मदद करते हैं। मसलन, रजिस्टर को इधर-उधर ले जाना। कोई सामान लाना। किसी कैदी को बुलाना या बगीचे और खेती का काम करना। जेल प्रशासन का भरोसा इन पर है तो इस भरोसे को ये लोग बखूबी निभाते भी हैं।

क्या होता है कार्मिक अफसर
जेल में आजीवन कारावास की सजा भुगतने वाले कैदी जब आठ साल की सजा पूरी कर लेते हैं तो आदर्श कैदी की श्रेेेणी में आ जाते हैं। यदि वह बेहतर काम और व्यवहार रखते हैं तो उन्हें कार्मिक अफसर का पद दिया जाता है। आम कैदियों और बंदियों की तरह इन्हें शाम के बाद बैरक में नहीं रहना पड़ता है। जेल के अंदर बिना रोक-टोक ये कहीं पर भी आ-जा सकते हैं।

जेलर प्रेम सागर शुक्ला ने कहा कि शेषनाथ उर्फ ढाढ़ी चाचा को सभी कैदी, बंदी का नाम, बैरक याद रहता है। बेहतर कार्य व्यवहार होने की वजह से ही उन्हें कार्मिक अफसर बनाया गया है।

 
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