{"_id":"5ee3834890036b0f162caa4f","slug":"special-story-of-ner-saloon-in-train","type":"story","status":"publish","title_hn":"1887 में पूर्वोत्तर रेलवे में चलने लगी थी सैलून, इस महाराज को मिलती थी खास सुविधा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
1887 में पूर्वोत्तर रेलवे में चलने लगी थी सैलून, इस महाराज को मिलती थी खास सुविधा
Fri, 12 Jun 2020 07:06 PM IST
vivek shukla
राजन राय, गोरखपुर।
राजन राय, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 12 Jun 2020 07:06 PM IST
विज्ञापन
NER saloon
- फोटो : अमर उजाला।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूर्वोत्तर रेलवे में 1887 में ट्रेनों के अंदर सैलून लगने लगी थी। बेतिया महाराज (बेतिया बिहार में है) ने रेलवे से सैलून की मांग की थी। राजा की इच्छा के अनुसार सैलून के अंदर की डिजाइन तैयार की गई थी।
वे छह माह का किराया पांच हजार रुपये रेलवे को देते थे। राजा चाहते थे कि सैलून का रंग लाल हो, वे पीला रंग पंसद नहीं करते थे। जबकि सैलून का रंग पीला होता था।
हालांकि रेलवे प्रशासन को यह स्वीकार नहीं था। वहीं लेडीज कंपार्टमेंट में लाल रंग का कारपेट और कुसुन दिया गया था। 1893 में राजा की मौत के बाद भी यह सुविधा बरकरार रहा।
विज्ञापन
बाद में रेल प्रशासन ने सैलून की सुविधा बेतिया के भविष्य के राजा के लिए रख दिया गया। राज्य के ऑफिसियल कर्मचारियों के सैलून में प्रवेश पर रोक लगा दिया।
विज्ञापन
वे छह माह का किराया पांच हजार रुपये रेलवे को देते थे। राजा चाहते थे कि सैलून का रंग लाल हो, वे पीला रंग पंसद नहीं करते थे। जबकि सैलून का रंग पीला होता था।
विज्ञापन
हालांकि रेलवे प्रशासन को यह स्वीकार नहीं था। वहीं लेडीज कंपार्टमेंट में लाल रंग का कारपेट और कुसुन दिया गया था। 1893 में राजा की मौत के बाद भी यह सुविधा बरकरार रहा।
विज्ञापन
बाद में रेल प्रशासन ने सैलून की सुविधा बेतिया के भविष्य के राजा के लिए रख दिया गया। राज्य के ऑफिसियल कर्मचारियों के सैलून में प्रवेश पर रोक लगा दिया।