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प्रकृति का नियम ही शाश्वत धर्म, पूजा करना आसान है लेकिन प्रेम करना कठिन: मोरारी बापू
Thu, 28 Jan 2021 07:44 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, कुशीनगर।
अमर उजाला नेटवर्क, कुशीनगर।
Published by: vivek shukla
Updated Thu, 28 Jan 2021 07:44 PM IST
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कथावाचक मोरारी बापू।
- फोटो : अमर उजाला।
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प्रकृति का नियम ही शाश्वत धर्म है। पृथ्वी की उत्पत्ति से पहले भी नियम शाश्वत थे और अंत के बाद भी यही स्थिति रहेगी। यह शाश्वत या सनातन व्यवस्था ही धर्म है। परंतु धर्म का नामकरण होने पर विवाद शुरू हो गया। प्रेम और पूजा में अंतर होता है। पूजा करना आसान है लेकिन प्रेम करना कठिन। सनातन प्रेम में करुणा की धारा बहती है।
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ये बातें कुशीनगर में चल रही रामकथा के छठे दिन बृहस्पतिवार को विख्यात कथा वाचक मोरारी बापू ने कहीं। मानस निर्वाण विषय पर व्याख्यान देते हुए मोरारी बापू ने कहा कि सनातन शाश्वत का परिचय है। पृथ्वी नहीं थी, तब भी सूर्य चमक रहा था। यह सतत प्रवाह है। धर्म को प्रेम से जोड़ते हुए कहा कि प्रेम को प्रेम ही रहने दिया जाए। सनातन प्रेम में करूणा की धारा बहती है। प्रेम करना कठिन काम है। इसके लिए खुद को प्रेमी में विलीन करना पड़ता है। मीरा भगवान श्रीकृष्ण का भजन गा रही थी तो उनसे पूछा गया कि उनका ईष्ट कौन हो तो उन्होंने जवाब दिया था कि उनके तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई..।
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इस अगाध प्रेम की राह कठिन है। इस कारण लोग पूजा को अधिक महत्व देते हैं। पूजा आसान है। एक शायरी ..अजीब कश्मकश थी जान किसको दूं, वो भी आ बैठे और मौत भी.. सुनाकर बापू ने कहा कि मौत और प्रेम में से अगर एक को चुनना हो तो प्रेम पहले चुन लेना मौत तो आनी ही है।
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यही अगाध प्रेम निर्वाण की राह है। जो स्वयं को जानता है वही परमात्मा को पहचानता है। महात्मा बुद्ध के संदेश बुद्धम शरण गच्छामि, संघम शरण गच्छामि का जिक्र करते हुए कहा कि महात्मा बुद्ध का भी मत था, पहले स्वयं को पहचानो। खुद के पास जाओ इसके लिए संघ की शरण में जाओ। संघ जहां तमाम बुद्ध बैठे हुए हैं और जो सभी प्रणम्य है उनको प्रणाम करो।
ओशो का जिक्र करते हुए कथा वाचक ने कहा कि ओशो भी इस बात को कहते थे कि जो स्वयं को प्रणाम नहीं करता वह परमात्मा को प्रणाम क्या करेगा। स्व को जानने के लिए अंतरात्मा को जानना होगा। अंतरात्मा में कोई रिश्तेदारी नहीं होती, कोई छूआछूत नहीं होता, कोई भेदभाव नहीं होता। अंतरात्मा को जानने वाला ही परमात्मा को जान पाता है। कथावाचक ने छठे दिन निर्वाण शब्द की व्याख्या करते हुए ब्रह्मा उपनिषद में समेत कई अन्य ग्रंथों का जिक्र किया। समय अधिक होने के चलते छठे दिन शिव विवाह की कथा नहीं सुनाई गई। छठे दिन के आयोजन में मुख्य यजमान अमर तुलस्यान, विक्रम अग्रवाल, सुमित त्रिपाठी, सुधीर वर्मा, राजीव समेत कई लोग मौजूद रहे।