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Gorakhpur News: गोरखपुर विश्वविद्यालय में स्टार्टअप के नाम पर 63 लाख का घपला
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गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में स्टार्टअप को बढ़ावा देने के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। दो कुलपतियों ने दो कंपनियां बनवा दीं और विश्वविद्यालय के फंड से 25 लाख रुपये का कर्ज भी दिलवा दिया। महाविद्यालयों से भी प्रशिक्षण शुल्क के नाम पर 38 लाख रुपये वसूल लिए गए। इस 63 लाख रुपये का कोई हिसाब-किताब नहीं है। न तो आयकर रिटर्न भरा गया और न ही ऑडिट कराइ गई। विश्वविद्यालय प्रशासन अब इसकी जांच कराने की तैयारी में है।
पूर्व कुलपति प्रो. राजेश सिंह के कार्यकाल में वर्ष 2021 में पूर्वांचल इनक्यूबेशन काउंसिल नाम से कंपनी बनाई गई थी। कंपनी में दो निदेशक पद की व्यवस्था बनाई गई। तत्कालीन कुलपति प्रो. राजेश सिंह खुद निदेशक बने और तत्कालीन वित्त अधिकारी प्रो. अजय सिंह को दूसरा निदेशक बना दिया। मजेदार बात यह है कि कंपनी के बायलॉज में यह शर्त रखी गई कि पूर्व कुलपति प्रो. राजेश सिंह जब तक स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं देते हैं निदेशक बने रहेंगे। भले ही वे कुलपति पद पर बने न रहें। कंपनी को विश्वविद्यालय से 25 लाख रुपये का कर्ज दिलवा दिया गया। कंपनी ने 76 महाविद्यालयों को इनक्यूबेशन सेल संचालित करने का प्रशिक्षण दिया। इसके लिए प्रत्येक कॉलेज से औसतन पांच हजार रुपये शुल्क लिया गया। इससे करीब 38 लाख रुपये मिले।
कंपनी के संचालन के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी नरेश त्रिखा समेत छह कर्मचारियों की नियुक्ति की गई। इनके वेतन पर करीब तीन साल तक हर महीने तीन लाख रुपये से अधिक खर्च हुए। इसके अलावा विश्वविद्यालय ने करीब 12 लाख रुपये में जीरो वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट खरीदा था, जिसमें पत्तों से खाद बनाई जाती थी। अब यह प्लांट भी बंद है।
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इनसेट
मार्च 2026 में पूर्व कुलपति ने बनाई दूसरी कंपनी
मार्च 2026 में पूर्व कुलपति प्रो. पूनम टंडन के कार्यकाल में नवोन्मेष-द इनोवेशन एंड स्टार्टअप फाउंडेशन नाम से दूसरी कंपनी बनाई गई। पहली कंपनी की न तो ऑडिट कराई गई थी और न ही आयकर रिटर्न दाखिल किया गया। इसकी जांच भी नहीं कराई गई। इतना जरूर है कि नई कंपनी के गठन के दौरान पुरानी कंपनी का बैंक खाता भी बंद करा दिया गया। दूसरी कंपनी तत्कालीन कुलपति प्रो. पूनम टंडन खुद निदेशक बनीं और तत्कालीन वित्त अधिकारी जय मंगल राव, रजिस्ट्रार धीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव, डॉ. राजू कुमार गुप्ता और डॉ. अंशू गुप्ता को निदेशक बना दिया। अब तीसरे कुलपति प्रो. केपी सिंह दोनों कंपनियों के गठन से लेकर उनके वित्तीय लेनदेन और कामकाज की जांच कराने की तैयारी कर रहे हैं।
ऑडिट और आयकर रिटर्न पर भी सवाल
पूर्वांचल इनक्यूबेशन काउंसिल का पंजीकरण वर्ष 2021 में कंपनी अधिनियम की धारा आठ के तहत कराया गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनी का नियमित ऑडिट नहीं हुआ और न ही आयकर रिटर्न दाखिल किया गया। इससे कंपनी के वित्तीय लेनदेन और खर्चों का सत्यापित ब्योरा सामने नहीं आ पा रहा है। अब जांच में कंपनी को मिले शुल्क, कर्मचारियों के वेतन पर हुए खर्च, जीरो वेस्ट प्लांट पर किए गए व्यय और विश्वविद्यालय से लिए गए 25 लाख रुपये के कर्ज की स्थिति की पड़ताल अहम होगी।
कोट-- -
गोरखपुर विश्वविद्यालय से पूर्वांचल इनक्यूबेशन काउंसिल को कर्ज दिए गए 25 लाख रुपये कहां और किस मद में खर्च हुए, इसकी जांच कराई जाएगी। इनक्यूबेशन सेल को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। कंपनी को फंड नहीं मिल पाने की प्रमुख वजह समय से प्रयास न किया जाना रहा। अब इस दिशा में फोकस किया गया है - प्रो. केपी सिंह, कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय
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पूर्व कुलपति प्रो. राजेश सिंह के कार्यकाल में वर्ष 2021 में पूर्वांचल इनक्यूबेशन काउंसिल नाम से कंपनी बनाई गई थी। कंपनी में दो निदेशक पद की व्यवस्था बनाई गई। तत्कालीन कुलपति प्रो. राजेश सिंह खुद निदेशक बने और तत्कालीन वित्त अधिकारी प्रो. अजय सिंह को दूसरा निदेशक बना दिया। मजेदार बात यह है कि कंपनी के बायलॉज में यह शर्त रखी गई कि पूर्व कुलपति प्रो. राजेश सिंह जब तक स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं देते हैं निदेशक बने रहेंगे। भले ही वे कुलपति पद पर बने न रहें। कंपनी को विश्वविद्यालय से 25 लाख रुपये का कर्ज दिलवा दिया गया। कंपनी ने 76 महाविद्यालयों को इनक्यूबेशन सेल संचालित करने का प्रशिक्षण दिया। इसके लिए प्रत्येक कॉलेज से औसतन पांच हजार रुपये शुल्क लिया गया। इससे करीब 38 लाख रुपये मिले।
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कंपनी के संचालन के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी नरेश त्रिखा समेत छह कर्मचारियों की नियुक्ति की गई। इनके वेतन पर करीब तीन साल तक हर महीने तीन लाख रुपये से अधिक खर्च हुए। इसके अलावा विश्वविद्यालय ने करीब 12 लाख रुपये में जीरो वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट खरीदा था, जिसमें पत्तों से खाद बनाई जाती थी। अब यह प्लांट भी बंद है।
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मार्च 2026 में पूर्व कुलपति ने बनाई दूसरी कंपनी
मार्च 2026 में पूर्व कुलपति प्रो. पूनम टंडन के कार्यकाल में नवोन्मेष-द इनोवेशन एंड स्टार्टअप फाउंडेशन नाम से दूसरी कंपनी बनाई गई। पहली कंपनी की न तो ऑडिट कराई गई थी और न ही आयकर रिटर्न दाखिल किया गया। इसकी जांच भी नहीं कराई गई। इतना जरूर है कि नई कंपनी के गठन के दौरान पुरानी कंपनी का बैंक खाता भी बंद करा दिया गया। दूसरी कंपनी तत्कालीन कुलपति प्रो. पूनम टंडन खुद निदेशक बनीं और तत्कालीन वित्त अधिकारी जय मंगल राव, रजिस्ट्रार धीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव, डॉ. राजू कुमार गुप्ता और डॉ. अंशू गुप्ता को निदेशक बना दिया। अब तीसरे कुलपति प्रो. केपी सिंह दोनों कंपनियों के गठन से लेकर उनके वित्तीय लेनदेन और कामकाज की जांच कराने की तैयारी कर रहे हैं।
ऑडिट और आयकर रिटर्न पर भी सवाल
पूर्वांचल इनक्यूबेशन काउंसिल का पंजीकरण वर्ष 2021 में कंपनी अधिनियम की धारा आठ के तहत कराया गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनी का नियमित ऑडिट नहीं हुआ और न ही आयकर रिटर्न दाखिल किया गया। इससे कंपनी के वित्तीय लेनदेन और खर्चों का सत्यापित ब्योरा सामने नहीं आ पा रहा है। अब जांच में कंपनी को मिले शुल्क, कर्मचारियों के वेतन पर हुए खर्च, जीरो वेस्ट प्लांट पर किए गए व्यय और विश्वविद्यालय से लिए गए 25 लाख रुपये के कर्ज की स्थिति की पड़ताल अहम होगी।
कोट
गोरखपुर विश्वविद्यालय से पूर्वांचल इनक्यूबेशन काउंसिल को कर्ज दिए गए 25 लाख रुपये कहां और किस मद में खर्च हुए, इसकी जांच कराई जाएगी। इनक्यूबेशन सेल को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। कंपनी को फंड नहीं मिल पाने की प्रमुख वजह समय से प्रयास न किया जाना रहा। अब इस दिशा में फोकस किया गया है - प्रो. केपी सिंह, कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय