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रीति-रिवाज: यहां नई पीढ़ी में सहरी पार्टियों के प्रति रुचि नहीं होने से खत्म हुई यह परंपरा, पचास साल पहले थीं कई पार्टियां
Tue, 20 Apr 2021 11:10 AM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Tue, 20 Apr 2021 11:10 AM IST
सार
आधुनिक तकनीक और नई पीढ़ी में सहरी पार्टियों के प्रति लगाव कम होने के कारण रोजेदारों को जगाने वाली सदियों पुरानी यह परंपरा गोरखपुर में लुप्त हो गई है।
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रमजान 2021
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वक्त सहरी का हो गया जागो, नूर हर सम्त छा गया जागो, उठो सेहरी की कर लो तैयारी, रोजा रखना है आज को जागो। रमजानुल मुबारक में रोजेदारों को सहरी के लिए जगाने वाली पार्टियों के यह पंक्तियां अब सुनाई नहीं देती। दरअसल आधुनिक तकनीक और नई पीढ़ी में सहरी पार्टियों के प्रति लगाव कम होने के कारण रोजेदारों को जगाने वाली सदियों पुरानी यह परंपरा गोरखपुर में लुप्त हो गई है।
करीब पचास वर्ष तक सहरी पार्टी की अगुवाई करने वाले शहर के बुजुर्ग सगीर साबिरी कव्वाल बताते हैं कि पार्टी में उनके साथ गाने बजाने वाले साथी गुजरते गए और नई पीढ़ी के लोग जुड़े ही नहीं। लिहाजा बारह साल पहले वह अकेले पड़ गए तो सहरी पार्टी निकालना बंद कर दिया।
सहरी पार्टी में पढ़े जाने वाले कलाम याद करते हुए उनकी बूढ़ी आंखें चमक उठती हैं। अपने समय के कलाम सुनाते हैं, उठो मुसलमां आए जगाने हैं माहे रमजान, सहर का वक्त हुआ। बताते हैं कि उनकी सहरी पार्टी मियांबाजार, इमाम बाड़ा पूरब फाटक, मुफ्तीपुर, बख्शीपुर, अलीनगर, जाफरा बाजार आदि मोहल्लों में करीब पचास साल तक रोजेदारों को सहरी के लिए उठाती रहीं। साथी नासिर, हबीबुल्लाह, सगीर आदि अल्लाह पाक को प्यारे हो गए, कोई नया साथी नहीं जुड़ा तो सहरी पार्टी बंद कर दी गई।
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करीब पचास वर्ष तक सहरी पार्टी की अगुवाई करने वाले शहर के बुजुर्ग सगीर साबिरी कव्वाल बताते हैं कि पार्टी में उनके साथ गाने बजाने वाले साथी गुजरते गए और नई पीढ़ी के लोग जुड़े ही नहीं। लिहाजा बारह साल पहले वह अकेले पड़ गए तो सहरी पार्टी निकालना बंद कर दिया।
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सहरी पार्टी में पढ़े जाने वाले कलाम याद करते हुए उनकी बूढ़ी आंखें चमक उठती हैं। अपने समय के कलाम सुनाते हैं, उठो मुसलमां आए जगाने हैं माहे रमजान, सहर का वक्त हुआ। बताते हैं कि उनकी सहरी पार्टी मियांबाजार, इमाम बाड़ा पूरब फाटक, मुफ्तीपुर, बख्शीपुर, अलीनगर, जाफरा बाजार आदि मोहल्लों में करीब पचास साल तक रोजेदारों को सहरी के लिए उठाती रहीं। साथी नासिर, हबीबुल्लाह, सगीर आदि अल्लाह पाक को प्यारे हो गए, कोई नया साथी नहीं जुड़ा तो सहरी पार्टी बंद कर दी गई।
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नातख्वां रईस अनवर बताते हैं कि वह मास्टर तौफीक और हफीजुल्लाह की सहरी पार्टी के सदस्य थे। कलाम- रोजेदारों ये माहे सयाम आ गया, लेके रिजवां से कौसर का जाम आ गया, उठ के सहरी करो और कुरआं पढ़ो कि तुम पे हूरो मलक का सलाम आ गया, सुनाते हुए कहते हैं कि उस समय सहरी पार्टियों की बहुत इज्जत होती थी।
ईद के बाद सहरी पार्टियों में बाकायदा कलाम की प्रतियोगिता होती थी और खूब ईनाम व इकराम से नवाजा जाता था। उनकी पार्टी शहर के इलाहीबाग, घासीकटरा, निजामपुर, पिपरापुर आदि मोहल्लों में रोजेदारों को जगाती थी। उनके अलावा मरहूम बारक अल्लाह अरबी की भी पार्टी थी। उनकी पार्टी अस्करगंज, रेती, काजीपुर खुर्द, अलहदादपुर, रायगंज, घंटाघर, शाहमारूफ में रोजेदारों को जगाती थी।
शायर व अदीब अनवर जिया बताते हैं कि सहरी के लिए जगाने वाली पार्टियों की परंपरा कई पीढ़ी पुरानी है। समय के साथ तकनीक में उन्नति हुई, अलार्मयुक्त घड़ियां आ गईं। मस्जिदों में लाउडस्पीकर से घोषणा होने लगी। नई पीढ़ी की भी रूहानी कलाम और शायरी के प्रति दिलचस्पी कम होती गई, इसी कारण यह परंपरा अब इतिहास बन गई।
ईद के बाद सहरी पार्टियों में बाकायदा कलाम की प्रतियोगिता होती थी और खूब ईनाम व इकराम से नवाजा जाता था। उनकी पार्टी शहर के इलाहीबाग, घासीकटरा, निजामपुर, पिपरापुर आदि मोहल्लों में रोजेदारों को जगाती थी। उनके अलावा मरहूम बारक अल्लाह अरबी की भी पार्टी थी। उनकी पार्टी अस्करगंज, रेती, काजीपुर खुर्द, अलहदादपुर, रायगंज, घंटाघर, शाहमारूफ में रोजेदारों को जगाती थी।
शायर व अदीब अनवर जिया बताते हैं कि सहरी के लिए जगाने वाली पार्टियों की परंपरा कई पीढ़ी पुरानी है। समय के साथ तकनीक में उन्नति हुई, अलार्मयुक्त घड़ियां आ गईं। मस्जिदों में लाउडस्पीकर से घोषणा होने लगी। नई पीढ़ी की भी रूहानी कलाम और शायरी के प्रति दिलचस्पी कम होती गई, इसी कारण यह परंपरा अब इतिहास बन गई।