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Gorakhpur News: विद्यालयों में जिला अस्पताल तैयार कर रहा ''''मनपरी'''' और ''''मनदूत''''

Wed, 18 Dec 2024 01:09 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 18 Dec 2024 01:09 AM IST
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preparing district hospitals in schools
गोरखपुर। जिला अस्पताल की ओर से विद्यालयों में अध्ययन कर रहे छात्रों की मानसिक बीमारियों की पहचान, रोक लगाने और समय रहते इलाज की पहल शुरू की है। इसमें स्कूल में पढ़ने वाले 20 छात्र चयनित कर ''''मनपरी'''' और ''''मनदूत'''' बनाए जा रहे हैं। इन्हें मानसिक बीमारियों के प्रति जागरूक करने और विद्यालय में पढ़ रहे किसी छात्र में ऐसी समस्या होने पर सहायता करने के लिए तैयार किया जा रहा है।
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जिला अस्पताल का मानसिक स्वास्थ्य विभाग (मनकक्ष) छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देते हुए उन्हें मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रहा है। इसके लिए जिले के सरकारी एवं गैरसरकारी 24 विद्यालयों का चयन भी किया गया है। इन विद्यालयों में से एक शिक्षक को प्रशिक्षण देकर विद्यालय का नोडल काउंसलर बनाया गया है। वहीं छात्रों में कक्षा नौ से लेकर 12 तक के छात्रों में से 40 छात्रों की टोली को मानसिक बीमारियों के प्रति प्रशिक्षित किया जा रहा है। प्रशिक्षण बाद इनमें से 10 छात्रों को मनदूत (मानसिक स्वास्थ्य दूत) और 10 छात्राओं को मनपरी (मानसिक स्वास्थ्य प्रेरक) बनाए जा रहे हैं।
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मनदूत और मनपरी विद्यालय में छात्रों के बीच रहकर उनकी मानसिक स्थिति पर ध्यान देंगे। नैदानिक मनोवैज्ञानिक मनकक्ष के मनोचिकित्सक रमेंद्र त्रिपाठी बताया कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति को परखना, उन्हें मानसिक दबाव से मुक्त रहने के लिए जागरूक करना और सही समय पर आवश्यक सहायता प्रदान करना है। छात्रों की हरकतों में परिवर्तन आने या किसी तरह की मानसिक उलझन होने पर पहले नोडल काउंसलर को बताएंगे। इसके बाद जिला अस्पताल के मनोचिकित्सकों एवं काउंसलर से संपर्क करेंगे। इन्हें समय- समय पर अस्पताल बुलाकर गाइड भी किया जाएगा।
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वर्जन
शासन की ओर से अच्छी पहल शुरू की गई है। 50 प्रतिशत मानसिक बीमारियां छात्र जीवन की आयुवर्ग में होती है। पढ़ाई का तनाव, पारिवारिक उलझन, अवसाद, ग्लानि, मनोभावाें को व्यक्त करने में संकोच सहित अन्य दिक्कत से छात्र परेशान रहते हैं। इन सब के कारण ये गलत रास्ते पर भी चले जाते हैं। कुछ केसों में गलत कदम भी उठा लेते हैं, जो इनके साथ परिवार को भी बर्बाद कर देता है। मनदूत और मनपरी छात्रों के बीच रहते हैं, इसलिए वे आसानी से ऐसे बच्चों की पहचान कर प्राथमिक सहायता कर सकेंगे।
- डॉ. अमित शाही, मनोचिकित्सक जिला अस्पताल

छविराम।

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