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गुफ्तगू में बोले गीतकार व कवि तनवीर गाजी- दिल के अल्फाजों को बयां करती है मेरी शायरी

Sat, 01 Feb 2020 10:22 PM IST
विजय जैन डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर Published by: विजय जैन Updated Sat, 01 Feb 2020 10:22 PM IST
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poet and singer tanveer ghazi live performed in gorakhpur literary festival
गीतकार व कवि तनवीर गाजी। - फोटो : अमर उजाला
‘तू खुद की खोज में निकल, तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की, समय को भी तलाश है।’ प्रसिद्ध गीतकार और कवि तनवीर गाजी ने जब ये रचनाएं सुनाई तो तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। लोग अपनी जगह से ही हाथ उठाकर दाद देने लगे।
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मौका था गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल में चौथे सत्र के आयोजन गुफ्तगू का, आयोजन समिति के डॉ रजनीकांत श्रीवास्तव ने सम्मानित करने के बाद तनवीर गाजी से सवालों की श्रृंखला के पहले एक रचना सुनाने की आग्रह किया था। लेकिन तनवीर एक रचना से मानने वाले कहां थे, जब शुरू हुए तो कई रचनाएं सुना डाली। ‘उसकी आंखों में मुहब्बत की चमक आज भी है, उसको हालांकि मेरे प्यार पर शक आज भी है, नाव में बैठ के धोए थे हाथ उसने, सारे तालाब में मेंहदी की खुशबू आज भी है’ और ‘उसने हसीन आंखों पे चश्मा चढ़ा लिया, छोटी सी कायनात पे पर्दा चढ़ा लिया, मेरे भी कदम रुक गए सिंदूर देखकर, उसने भी देखकर कर कार का शीशा चढ़ा लिया’ सुनाकर खूब दाद बटोरी।
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रेसलर बनाना चाहते थे पिता, किस्मत में गीत लिखना था

तनवीर गाजी ने सवाल-जवाब में अपने जीवन के कुछ रोमांचक पहलू भी सुना डाले। बोले, गांव में कव्वालियों को सुनने जाते थे, जहां से उन्हें गजलों और शेरो, शायरी का चस्का लगा। पिताजी रेसलर बनाना चाहते थे। उनकी शौक में जूडो में ब्लैक बेल्ट भी हासिल किया। लेकिन किस्मत में कलम से गीत लिखना था सो मुंबई चले आए। परिवार इस फैसले के सख्त खिलाफ  था और एक बार तो मन में खुदकुशी करने का ख्याल आया। सोचा कि खुदकुशी से अच्छा है बगावत कर लें।

अब संगीत पहले बनता है, गीत बाद में संवरते हैं
डॉ. रजनीकांत ने जब उनसे गीतों की रचना और धुन के सामंजस्य पर सवाल पूछा, मुस्कराते हुए बोले, पहले यह परंपरा थी कि गीत पहले लिख दिए जाते थे फिर उन्हें संगीतबद्ध किया जाता था। लेकिन मौजूदा दौर में संगीत पहले बना लिया जाता है और गीत उसके मुताबिक संवार दिया जाता है। मंचीय कविता और किताबी कविता के बीच मौजूद साहित्यिक चुनौती पर अभिषेक पांडेय के सवाल पर उन्होंने कहा कि कविता को दिल को छूने वाला होना चाहिए।

मैं इसमें भेद नहीं मानता। कविता को बस कविता होना चाहिए और उसे खूबसूरत होना चाहिए। नित्यानंद शर्मा ने सवाल किया, धुन पर कविता लिखना आसान है या कठिन। इसका जवाब देते हुए तनवीर गाजी ने कहा कि यह सीखने पर और अभ्यास पर निर्भर करता है। जितना जल्दी आप सीखेंगे और बेहतर अभ्यास करेंगें वही आपके लिए आसानी पैदा करेगा। डॉ. उत्कर्ष सिन्हा ने पूछा कि ‘ए भाई जरा देख के चलो’ जैसे गाने अचानक से किसी वाकये से पैदा हुए अल्फाजों से लिखे गए, क्या आज भी ऐसे हालात हैं?

इस पर उन्होंने कहा कि पुराने लोगों के पास वक्त अधिक होता था और वे अपने काम को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर हुआ करते थे। आज के वक्त में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आनंद बख्शी और वर्मन साहब जैसी शैली की कमी है। आज का समय हर चीज तेज और जल्दी करने पर ़जोर देता है। इसलिए ऐसे वाकये से निकलने वाले गीत अब न के बराबर सामने आ रहे हैं। डॉ राजीव केतन ने गीतों में उपमाओं के कम होते प्रयोग सवाल किया। जिस पर उन्होंने कहा कि आज केवल भाषा बदली है, अंदाज बदला है पर उपमाएं आज भी वैसी ही हैं। कनक हरि अग्रवाल, सुधा मोदी, आतिफ  हसन आदि दर्शकों ने भी सवाल पूछे। संचालन मानवेंद्र त्रिपाठी ने किया।
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