गोरखपुर: दिन ढलते ही घर से निकलने में डरते थे, एडीजी की पहल पर अब कम हुई दहशत
गांव में शराब माफिया का खौफ ऐसा है कि कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। गांव का सबसे बड़ा शराब माफिया जयसराम है। पुलिस ने इस पर गैंगस्टर की कार्रवाई भी की थी, लेकिन वह फिर जमानत पर बाहर आ गया है। उसके खिलाफ बोलने के लिए कोई तैयार नहीं होता है।
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गोरखपुर जिले में कैंपियरगंज थाने की करमैनी चौकी से महज 1.5 किलोमीटर की दूरी पर बसा है मूसाबार गांव। कच्ची शराब के धंधे के लिए बीते दिनों सुर्खियों में रहे इस गांव में पहले लोग दिन ढलने के बाद घर से निकलने से डरते थे कि कहीं किसी शराबी से आमना-सामना न हो जाए। एडीजी की पहल पर पुलिस सक्रिय हुई तो हालात थोड़े सुधरे हैं। अब पुलिस गांव में कच्ची शराब के धंधेबाजों की निगरानी कर रही है।
बृहस्पतिवार को दोपहर के दो बजे गांव में चारों तरफ सन्नाटा नजर आया। एक दुकान पर चार-पांच लोग बैठे मिले। पास में इतनी ही महिलाएं आपस में बात कर रही हैं। सबकी जुबां पर एक ही चर्चा है, वह है कच्ची शराब। रामभवन कहते हैं कि गांव की पहचान ही कच्ची शराब हो गई है। बहन-बेटी निकलें कैसे, यह बड़ा सवाल है। इसी दौरान सूर्य नारायण कहते हैं कि अब अफसरों के हस्तक्षेप के बाद हालात सुधरने की उम्मीद है। पुलिस तो आने लगी है, लेकिन चिंता यह भी सता रही है कि कितने दिन। आखिर यह बंद कैसे होगा।
गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा है। शराब बनाने वाले घर से लापता हो गए हैं। घर में महिलाएं ही बची हैं। वे भी खुद को पुलिस से बचाने में जुटी हैं। गांव की बर्फी कहती हैं कि बाबू...ये हालात पुराने नहीं हैं। पहले गांव में इस काम को कुछ लोग ही करते थे। उनका घर एक किनारे है। अब तो कई लोग शराब बनाने लगे हैं। शाम ढलते ही घर से निकलने में डर लगता है।
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गुजराती कहती हैं कि इस दर्द को हम लोग झेल तो बहुत दिन से रहे हैं, लेकिन गांव की बेटी ने हिम्मत की तो पुलिस आई है। अब दिन में कई बार पुलिस आकर गांव में घूमती है। पहले तो कोई सुनने वाला नहीं था। पुलिस आती भी थी तो कुछ करती नहीं थी। गुलाबी देवी ने बताया कि जिंदगी गांव में गुजर गईल, लेकिन, अइसन कब्बो ना रहल, जईसन अब भईल बा। अब केहू के डर नाहीं लागत बा।
लौजारी, सवित्रा कहती हैं कि बच्चों का भविष्य खराब हो रहा है। गांव का माहौल ऐसा हो गया है कि दिन में भी बच्चे निकलते हैं तो डर लगता है कि कहीं वे भी शराब के आदी न हो जाएं। मंजू कहती हैं कि गांव के कई बच्चे बिगड़ गए हैं। बहुत कम उम्र में ही वे शराब के आदी हो गए हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं और बच्चियों को होती है। गांव में जो लोग बाहरी आते हैं, वे छींटाकशी करते हैं। किस-किस से कोई झगड़ा कर सकता है।
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बेटा...तुम लोग शराब मत पीना...पुलिस साथ है
दोपहर डेढ़ बजे के करीब गांव की एक गली में दो पुलिस वाले भी नजर आए। वे नए उम्र के बच्चों को एकत्र कर समझा रहे थे। कह रहे थे कि बेटा, तुम लोग शराब मत पीना। कहीं से कोई जानकारी मिले तो बता देना। तुम लोगों का नाम भी सामने नहीं आएगा। पुलिस की कोशिश थी कि शराब बनाने वालों की जानकारी हासिल की जाए। मगर, इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि यह काम आसान नहीं है।
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खौफ ऐसा कि जानते सब हैं, बोलता कोई नहीं
गांव में शराब माफिया का खौफ ऐसा है कि कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। गांव का सबसे बड़ा शराब माफिया जयसराम है। पुलिस ने इस पर गैंगस्टर की कार्रवाई भी की थी, लेकिन वह फिर जमानत पर बाहर आ गया है। उसके खिलाफ बोलने के लिए कोई तैयार नहीं होता है। बताया तो यह भी जा रहा है कि सब कुछ उसके संरक्षण में ही चल रहा है। उसकी लोकल पुलिस से सेटिंग भी गहरी है। हालांकि, एडीजी के चौपाल के बाद पुलिस ने सक्रियता बढ़ा दी है। इस गांव में शराब की बिक्री पर पुलिस की नजर है।
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गांव की भौगोलिक स्थिति भी धंधेबाजों के अनुकूल
मूसाबर गांव की भौगोलिक स्थिति भी कच्ची शराब के धंधेबाजों के अनुकूल ही है। सरुआ ताल के किनारे गांव होने की वजह से ताल के रास्ते नाव से ये लोग फरार हो जाते हैं। इसी रास्ते का इस्तेमाल यह लोग शराब को ठिकानों तक पहुंचाने में भी करते हैं।