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Gorakhpur News: इनकी लापरवाही से मजबूत हो रहा मरीज-माफिया नेटवर्क, ट्रॉमा सेंटर के नाम पर सिर्फ कर रहे ठगी

Sat, 02 Mar 2024 12:09 PM IST
रोहित सिंह संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Published by: रोहित सिंह Updated Sat, 02 Mar 2024 12:09 PM IST
सार

गोरखपुर में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से मरीज माफिया नेटवर्क मजबूत हो रहा है। हाल में सील किए गए अस्पतालों में तीन जगहों पर ट्रामा सेंटर बनाकर भर्ती किए गए थे मरीज।

 

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Patient-mafia network is getting stronger, only cheating in the name of trauma center in Gorakhpur
ट्रामा सेंटर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

विस्तार

मरीज-माफिया का नेटवर्क इतना मजबूत हो गया है कि शहर के कई मोहल्लों में चल रहे नर्सिंग होम और ट्रामा सेंटर में बिना किसी सुविधा के ही मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। मामला तब सामने आता है, जब इलाज में कमी के चलते किसी की जान चली जाती है।

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पिछले दिनों जिस ईशू अस्पताल को सील किया है, उसे भी ट्रामा सेंटर बताकर मरीजों को भर्ती किया गया था। मेडिकल कॉलेज रोड पर सील किए गए एक अवैध अस्पताल पर आईसीयू सुविधायुक्त का बोर्ड लगा था। अचरज की बात तो यह है कि सारी हकीकत सामने आने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग ने अभी शहर में चल रहे अवैध नर्सिंग होम व अवैध ट्रामा सेंटर की छानबीन के लिए अभियान तक शुरू नहीं किया। ऐसे अस्पतालों की पड़ताल की गई।
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मेडिकल कॉलेज रोड व उसके आसपास का इलाका मेडिकल हब बन चुका है। हर गली में यहां कोई न कोई अस्पताल संचालित है। इस रोड पर मेडिकल कॉलेज से करीब आधा किलोमीटर पहले सड़क के दाईं तरफ एक अस्पताल संचालित है। आईसीयू और ट्रामा सेंटर की सुविधा युक्त इस अस्पताल में अपना कोई डॉक्टर ही नहीं है। इस अस्पताल का संचालनकर्ता ऐसा व्यक्ति है जो पहले एक अस्पताल की पैथालॉजी में काम करता था।
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मेडिकल कॉलेज से गुलरिहा के बीच संचालित एक अस्पताल में दो डॉक्टर पहले ऑनकॉल जाते थे, लेकिन अब भी उन्हीं के नाम पर मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। शहर के भीतर तिवारीपुर इलाके में भी एक अस्पताल इसी तरह से संचालित हो रहा है।


सुविधा अधिक होने के चलते महंगा होता है ट्रामा सेंटर में इलाज
सड़क हादसों या अन्य चोट की स्थिति में ट्रामा सेंटर में ही बेहतर इलाज की सुविधा होती है। क्योंकि ट्रामा सेंटर में आर्थोपैडिक सर्जन और न्यूरो सर्जन की सुविधाएं 24 घंटे उपलब्ध होती हैं। इसके अलावा एनेस्थेटिक, रक्त आपूर्ति, ऑक्सीजन आपूर्ति और अपने एंबुलेंस की सुविधाएं भी होती हैं।

एक तरह से मरीजों की जीवन रक्षा के लिए जरूरी उपकरण व दवाएं इस अस्पताल की खासियत होती है। इसीलिए ट्रामा सेंटर में इलाज का खर्च अन्य जगहों के मुकाबले अधिक भी होता है, लेकिन यह सुविधा केवल शहर के चुनिंदा अस्पताल में ही उपलब्ध है।

शहर में संचालित कई नर्सिंग होम ट्रामा सेंटर का दावा तो करते हैं, लेकिन उनके पास उस स्तर की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। फिर भी मरीजों को भर्ती कर उनसे इलाज के खर्च के नाम पर मोटी रकम वसूल कर रहे हैं।

केस 1
अवैध रूप से संचालित ईशु अस्पताल में मरीजों को ट्रामा सेंटर के नाम पर भर्ती किया गया था, जबकि यहां कोई सुविधा ही नहीं थी। सुविधा के नाम पर एक केबिन था, जिसमें साधारण बेड के ऊपर दीवार के सहारे पल्स मीटर व कुछ अन्य उपकरण लगे हुए थे।

केस 2
मेडिकल कॉलेज रोड पर संचालित यूनिवर्सल अस्पताल में भी मरीजों को ट्रामा सेंटर के नाम पर ही भर्ती किया गया था। वहां जब सीएमओ की अगुवाई में छापा मारा गया तो तीन मरीज भर्ती पाए गए, जिन्हें बाद में मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। इस अस्पताल का न तो पंजीकरण था और न ही कोई सुविधा

केस 3
चौरीचौरा क्षेत्र में संचालित मां तरकुलही देवी अस्पताल को सील किया गया। यहां आईसीयू और एनआईसीयू की सुविधा का दावा किया गया था, जबकि यहां न तो डॉक्टर मिले और न ही अन्य चिकित्सा उपकरण। इस अस्पताल और पीछे के घर का रास्ता भी एक ही था।

ये होनी चाहिए सुविधाएं
ट्रामा सेंटर में आर्थोपैडिक सर्जन व न्यूरो सर्जन की 24 घंटे उपस्थिति अनिवार्य।
तीन शिफ्ट में ड्यूटी के लिए उपलब्ध प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी।
रक्त आपूर्ति के लिए ब्लड बैंक से अनुबंध आवश्यक।
हर बेड पर 48 घंटे ऑक्सीजन आपूर्ति की सुविधा।
अस्पताल का अपना एंबुलेंस, जिससे मरीज को हायर सेंटर रेफर किया जा सके।

सीएमओ डॉ. आशुतोष द्विवेदी के ट्रामा सेंटर के लिए अलग से पंजीकरण नहीं होता, बल्कि नर्सिंग होम में ही अलग से सुविधाएं होनी चाहिए। जो नर्सिंग होम यह सुविधा दे रहे हैं, वहां 24 घंटे अर्थोपैडिक सर्जन और न्यूरो सर्जन की उपस्थिति जरूर होनी चाहिए। अवैध अस्पतालों की जांच की जा रही है। लगातार इन मामलों में कार्रवाई की जा रही है।
 
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