खुशखबर: गोरखपुर जिले के तीन अस्पतालों में लगेंगे ऑक्सीजन प्लांट, भेजा गया प्रस्ताव
जिला और जिला महिला अस्पताल में भी लगेंगे, सीएमओ ने शासन को अस्पतालों में प्लांट लगाने का प्रस्ताव भेजा
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गोरखपुर में कोरोना संक्रमण के दौरान ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे जिले के टीबी अस्पताल, जिला अस्पताल और जिला महिला अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित होंगे। टीबी अस्पताल में तो ऑक्सीजन प्लांट स्थापना की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में हर जिले में ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना किए जाने की घोषणा की थी। सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय ने बताया कि शासन के निर्देश पर जिला अस्पताल, जिला महिला अस्पताल के एमसीएच विंग में और टीबी अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किए जाने का प्रस्ताव बनाकर भेजा है।
बताया कि टीबी अस्पताल में प्लांट की स्थापना शुरू हो गई है। शुरू में इस प्लांट की क्षमता सौ जंबो सिलिंडर प्रतिदिन भरने की होगी, आवश्यकता पड़ने पर क्षमता और बढ़ाई जाएगी। ऑक्सीजन प्लांट संचालन के लिए बिजली निगम को भी विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।
सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय ने कहा कि शासन से जिले में तीन ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए स्थान का चयन करने का निर्देश आया था। प्रस्ताव बना कर भेजा गया है, टीबी अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट स्थापना का काम भी शुरू हो गया है।
टाउनहाल (प्रथम) अधिशासी अभियंता नवनीत प्रजापति ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग की तरफ से ऑक्सीजन प्लांट के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। दो दिन पहले जिला अस्पताल का भौतिक निरीक्षण किया गया था। 106 किलोवाट कनेक्शन के लिए प्रस्ताव आया था। स्वास्थ्य विभाग की तरफ से बिजली कनेक्शन की क्षमता के अनुसार आवेदन मिलते ही काम शुरू करवा दिया जाएगा।
पीएसए तकनीक पर काम करता है ऑनसाइट ऑक्सीजन प्लांट
अस्पतालों में लगने वाले अधिकतर ऑक्सीजन प्लांट प्रेशर स्विंग एडजॉर्ब्शन (पीएसए) तकनीक पर काम करते हैं। इस तकनीक में प्लांट आसपास की हवा में से ही ऑक्सीजन को अलग कर इकट्ठा करता है। वातावरण की हवा में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, 21 प्रतिशत ऑक्सीजन और एक प्रतिशत से भी कम में अन्य गैसीय तत्व होते हैं।
पीएसए तकनीक में वातावरण की हवा से नाइट्रोजन व अन्य गैसों को अलग कर 95 फीसदी तक शुद्ध ऑक्सीजन प्राप्त की जाती है। इस तकनीक में वातावरण की हवा उच्च दाब पर जियोलाइट क्रिस्टल से भरे सिलिंडर से गुजारी जाती है। जियोलाइट के संपर्क में आकर नाइट्रोजन अलग हो जाती है और अंत में शुद्ध ऑक्सीजन मिलती है। इस ऑक्सीजन का इस्तेमाल सीधे अस्पताल में मरीजों को दिए जाने के लिए किया जा सकता है या सिलिंडरों में भंडारण कर बाद में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।