आजादी की लड़ाई का गवाह है नागरी प्रचारिणी सभा, यहां मौजूद है हिंदी किताबों का भंडार
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1915 से संचालित नागरी प्रचारिणी संस्था आजादी की लड़़ाई से लेकर स्वतंत्र भारत की गवाह है। संस्था का संघर्ष इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यह सभा शिक्षा एवं हिंदी भाषा के विकास के साथ स्वाधीनता संग्राम, इतिहास व ¨हिंदी के दुर्लभ ग्रंथों को सुरक्षित एवं संरक्षित कर रही है।
नागरी प्रचारिणी सभा के इतिहास को देखे तो कुंज बिहारी चतुर्वेदी, बाबू अमीर एवं रामनारायण मिश्र की प्रेरणा से एक जनवरी 1915 को इसकी आधार शिला रखी गई।
शुरू में नागरी प्रचारिणी सभा का संचालन यहां के हिंदी साहित्य प्रेमियों ने किया तो शिक्षा प्रेमी तमकुही नरेश राजा इंद्रजीत प्रताप बहादुर शाही की प्रेरणा एवं सहयोग राशि से सन् 1923 में खपरैल का अस्थाई भवन बना। फिर ¨हदी पुस्तकों की व्यवस्था की गई।
जन सहयोग से वर्तमान भवन की आधारशिला उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सीएम चंद्रभानु गुप्ता ने 1963 में रखी था। इसका उद्धाटन 13 जून 1965 को तत्कालीन वित्त मंत्री केंद्र सरकार के मोरार जी देसाई ने किया।
पं. कमलापति त्रिपाठी, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ.रामकुमार वर्मा, भगवती, सच्चिदानंद, हीरानंद वात्सायन, अज्ञेय, सेठ गोवद दास, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रो. सरन घई यहां आयोजित कार्यक्रमों में शरीक हो चुके हैं।
सभा की ओर से 2003 से नगरी रत्न, नागरी भूषण एवं नागरी श्री सम्मान पुरस्कार दिया जाता है। विश्व हिंदी दिवस दस जनवरी 2015 से अप्रवासी भारतीय हिंदी साहित्यकारों को विश्व नागरी सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है।
नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष सुधाकर मणि त्रिपाठी एवं मंत्री इंद्र कुमार दीक्षित के अनुसार प्रदेश में मात्र तीन जिलों वाराणसी, आगरा एवं देवरिया में राष्ट्रभाषा ¨हदी के विकास एवं भारतीय संस्कृति के उत्थान के लिए यह संस्था समर्पित एवं कार्यशील है।
यहां के पुस्तकालय में ज्ञान विज्ञान की लगभग 25 हजार पुस्तकें उपलब्ध हैं। तुलसी जयंती, हिंदी दिवस, गांधी जयंती, निराला जयंती, हर माह के द्वितीय शनिवार को काव्य गोष्ठी का आयोजन होता है।
इन्हें मिला गौरव सम्मान
विशेष आवरण एवं विरूपण के डिजाइनर हिमांशु कुमार के अनुसार नागरी प्रचारिणी सभा पर डाक टिकट जारी होना गौरव की बात है। इससे पहले पूर्व सांसद विश्वनाथ राय व राजकीय इंटर कॉलेज के सौ वर्ष पूरे होने पर डाक टिकट जारी हो चुका है।