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Jivitputrika Vrat 2022: पुत्रों की दीर्घायु के माताएं आज रखा जीवत्पुत्रिका निर्जल व्रत, सोमवार को होगा पारण

Sun, 18 Sep 2022 07:06 AM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sun, 18 Sep 2022 07:06 AM IST
सार

वाराणसी से प्रकाशित हृषीकेश पंचांग के अनुसार, 18 सितंबर को अष्टमी तिथि का मान सायंकाल चार बजकर 39 मिनट तक, मृगशिरा नक्षत्र भी सायंकाल चार बजकर 31 मिनट और इस दिन सौम्य नामक औदायिक योग है।

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Mothers will keep Jivatputrika Nirjal fast for longevity of their sons
जीवत्पुत्रिका व्रत - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

पुत्रों की दीर्घायु के लिए माताएं जीवत्पुत्रिका का निर्जल व्रत 18 सितंबर रविवार को रखेंगी। व्रत का पारण सोमवार को होगा। शास्त्रों के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पुत्र की लंबी आयु और कल्याण के लिए जीवत्पुत्रिका या जिमूतवाहन व्रत का विधान है।

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वाराणसी से प्रकाशित हृषीकेश पंचांग के अनुसार, 18 सितंबर को अष्टमी तिथि का मान सायंकाल चार बजकर 39 मिनट तक, मृगशिरा नक्षत्र भी सायंकाल चार बजकर 31 मिनट और इस दिन सौम्य नामक औदायिक योग है।
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जीवत्पुत्रिका व्रत का महत्व
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, धर्मशास्त्र की दृष्टि से यह व्रत स्त्रियों का है। प्रदोष व्यापिनी अष्टमी को अंगीकृत करते हुए आचार्यों ने प्रदोष काल या सायंकाल में जीमूतवाहन के पूजन का विधान निर्दिष्ट किया है। इस व्रत का पारण अष्टमी के बाद नवमी में ही पारण करना चाहिए।
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व्रत की विधि
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, व्रती महिलाएं पवित्र होकर संकल्प के साथ प्रदोष काल में गाय के गोबर से पूजन स्थल को लीप दें और छोटा तालाब भी बना लें। तालाब के निकट एक पाकड़ की डाल लाकर खड़ा कर दें। जिमूतवाहन की कुश निर्मित मूर्ति, जल या मिट्टी के पात्र में स्थापित कर पीली और लाल रूई से उसे अलंकृत करें और धूप, दीप, अक्षत, फूल, माला व नैवेद्यों से पूजन करें।


मिट्टी या गाय के गोबर से चिल्होरिन (मादा चील) और सियारिन की मूर्ति बनाकर उसका मस्तक लाल सिंदूर से विभूषित कर दें। अपने वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए दिनभर उपवास कर बांस के पत्तों से पूजन करें। पूजन के बाद व्रत महात्म्य की कथा श्रवण करें। अगले दिन दान-पुण्य के पश्चात व्रत का पारण करें।

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