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साइकिल लेकर दिल्ली से बिहार जाने की जद्दोजहद में मजदूर, इसकी दास्तां सुनकर भर आएंगी आंखें

Mon, 30 Mar 2020 11:30 AM IST
vivek shukla ज्ञानप्रकाश गिरी, गोरखपुर।
ज्ञानप्रकाश गिरी, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 30 Mar 2020 11:30 AM IST
सार

  • लॉकडाउन में दिल्ली, नोएडा से साइकिल से ही निकल पड़े यूपी, बिहार, बंगाल के मजदूर
  • कर्ज चुकाने के लिए घर छोड़ा था, लौटते वक्त और कर्जदार हो गए

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Many Workers struggle in back to Home due to Lockdown
लॉकडाउन। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

खुद और परिवार का पेट भरने के साथ ही कई सारे कर्ज चुकाने और जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए बड़े शहरों में पसीना बहाने वाले यूपी, बिहार और बंगाल के मजदूरों ने कभी सोचा नहीं था कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें ऐसी आफत का सामना करना पड़ेगा। संकट की घड़ी में इन्हें घर लौटने के लिए कई दुश्वारियों से जूझना पड़ रहा है।

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दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद से घर लौटने के लिए कई मजदूरों को जब कोई साधन नहीं मिला तो उन्होंने पास बची रकम से साइकिलों का इंतजाम किया और उन्हीं से निकल पड़े हैं। हाइवे पर अब पैदल कम, साइकिल से लौटने वाले ज्यादा लोग दिख रहे हैं। गोरखपुर-कुशीनगर फोरलेन हाईवे पर चौरीचौरा इलाके के सोनबरसा बाजार के पास थककर चूर कुछ साइकिल सवार मिले।
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कुछ सो गए थे, कुछ चिंता में डूबे थे। कुल छह की तादाद में आए इन लोगों में से परमेश और रमेश ने बताया कि वे सभी पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के हरिपुर गांव के हैं। वे राजमिस्त्री हैं। बाढ़ की विभीषिका झेलने के बाद घर की माली हालत को संभालने के लिए पांच माह से नोएडा में काम कर रहे थे।
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छह दिन पहले उन्हें बताया गया कि कई महीने तक कर्फ्यू जैसे हालात होंगे और खाने-पीने को कुछ नहीं मिलेगा। वे और उनके साथी घर भागने के लिए तैयार हुए तो पता चला कि गाड़ियां ही नहीं मिलेंगी। एक आदमी ने साइकिलों का इंतजाम कराया और वे निकल पड़े।

छह दिन से चला रहे हैं साइकिल

छह दिन हो गए साइकिल चलाते। बस रात में हाइवे किनारे कहीं आराम करते हैं। सबके पैरों में दर्द है। रास्ते में मील के पत्थरों और बोर्ड को देखते चल रहे हैं, ताकि दूरी और दिशा का एहसास रहे। मजदूरों ने बताया कि अभी जितनी दूर चलकर पहुंचे हैं, उससे भी ज्यादा दूरी तय करनी है।

घर पहुंचने में अभी और कितने दिन लगेंगे, नहीं मालूम। इन्हीं के एक साथी अनेश मंडल ने पुरानी सी दिख रही साइकिल की ओर इशारा करते हुए बताया कि उनके पास सिर्फ दो हजार रुपये थे, दो हजार एक साथी से कज़ॱर लेकर इसे खरीदा है।

अनेश के मुताबिक, दिल्ली और नोएडा में कई लोग जरूरतमंदों को अपनी पुरानी साइकिलें मनचाही कीमत में बेच रहे हैं। जिन मजदूरों के पास रकम है, वे साइकिल खरीदकर जैसे-तैसे घरों के लिए निकल रहे हैं।

आपबीती सुनाते अनेश भावुक हो गए, ‘कर्ज से मुक्ति पाने के लिए घर-परिवार छोड़ा था, अब उसी घर-परिवार में लौटने के लिए और कर्जदार हो गया।’ रास्ते में खाने-पीने के सवाल पर दिकेश मंडल की आंखें भर आईं और अल्फ़ाज थे, ‘यूपी में कुछ जगहों पर मदद करने वाले बाबू मोशाय लोग मिले, जो हमारी तरह आ रहे लोगों को खाना खिला रहे हैं, तो कुछ जगहों पर हम लोग स्थानीय लोगों से खाना-पानी मांग ले रहे हैं।’

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