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‘बैले का बियाह’ ने युवा पीढ़ी की विसंगतियों को दर्शाया, जिन्हें कर्म नहीं किस्मत में यकीन
Mon, 13 Jan 2020 12:45 PM IST
विजय जैन
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Mon, 13 Jan 2020 12:45 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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आजादी के सात दशक बाद भी युवा पीढ़ी अपने और देश के भविष्य के प्रति चिंतित नहीं है। गोरखपुर महोत्सव में नाटक बैले का बियाह में हास्य व्यंग्य के जरिए इस गंभीर विषय को प्रस्तुत कर कलाकारों ने दर्शकों को हंसने के साथ सोचने को मजबूर किया।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रेडियो एंड टेलीविजन और नव्य इंडिया के कलाकारों की ओर से विज्ञान प्रदर्शनी में प्रस्तुत किए गए नाटक की कहानी में सिद्धार्थनगर जनपद के एक गांव के युवकों को दर्शाया गया है। इस गांव के युवक आजादी के सत्तर साल बाद भी कर्म में नहीं, बल्कि किस्मत पर यकीन करते हैं। इन्हीं युवकों में एक है मजनू। उसके शायराना अंदाज के कारण सभी उसे मजनू माधवपुरी कहते हैं। एक पात्र सुरेंदर बिगड़ैल स्वभाव का युवक है।
वह अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्य से दूर रहने के बहाने ढूंढता है। उसे हमेशा अपनी ही सनक रहती है। इन्हीं युवकों के इर्द-गिर्द घूमती नाटक की कहानी ने दर्शकों को खूब गुदगुदाया। नाटक के कथानक में अंधविश्वास, कन्या भ्रूण हत्या, शिक्षा के प्रति जागरुकता के अभाव आदि सामाजिक विषयों को दूर करने के लिए सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी को भी बेहतरीन ढंग से पिरोया गया था।
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नाटक में राहुल तिवारी, हिमांशु गुप्ता, कार्तिक जायसवाल, प्रज्ञा मल्ल, रूबी पासवान, प्रियंका यादव, आशुतोष पांडेय अनुज, अनिकेत मोदनवाल, कुनाल यादव, प्रिंस मद्धेशिया, चंदन यादव, नितिन सिंह, अभिजीत मिश्र और अतुल पांडेय ने विभिन्न चरित्र मंच पर जीवंत किए। आशुतोष पांडेय के लिखे नाटक की परिकल्पना और निर्देशन का जिम्मा नवीन पांडेय ने बखूबी निभाया।
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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रेडियो एंड टेलीविजन और नव्य इंडिया के कलाकारों की ओर से विज्ञान प्रदर्शनी में प्रस्तुत किए गए नाटक की कहानी में सिद्धार्थनगर जनपद के एक गांव के युवकों को दर्शाया गया है। इस गांव के युवक आजादी के सत्तर साल बाद भी कर्म में नहीं, बल्कि किस्मत पर यकीन करते हैं। इन्हीं युवकों में एक है मजनू। उसके शायराना अंदाज के कारण सभी उसे मजनू माधवपुरी कहते हैं। एक पात्र सुरेंदर बिगड़ैल स्वभाव का युवक है।
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वह अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्य से दूर रहने के बहाने ढूंढता है। उसे हमेशा अपनी ही सनक रहती है। इन्हीं युवकों के इर्द-गिर्द घूमती नाटक की कहानी ने दर्शकों को खूब गुदगुदाया। नाटक के कथानक में अंधविश्वास, कन्या भ्रूण हत्या, शिक्षा के प्रति जागरुकता के अभाव आदि सामाजिक विषयों को दूर करने के लिए सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी को भी बेहतरीन ढंग से पिरोया गया था।
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नाटक में राहुल तिवारी, हिमांशु गुप्ता, कार्तिक जायसवाल, प्रज्ञा मल्ल, रूबी पासवान, प्रियंका यादव, आशुतोष पांडेय अनुज, अनिकेत मोदनवाल, कुनाल यादव, प्रिंस मद्धेशिया, चंदन यादव, नितिन सिंह, अभिजीत मिश्र और अतुल पांडेय ने विभिन्न चरित्र मंच पर जीवंत किए। आशुतोष पांडेय के लिखे नाटक की परिकल्पना और निर्देशन का जिम्मा नवीन पांडेय ने बखूबी निभाया।