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UPSC Result: आईआईटियन दिव्यांश को दूसरे प्रयास में मिली 153वीं रैंक, सात से आठ घंटे करते थे सेल्फ स्टडी
Tue, 31 May 2022 01:07 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Tue, 31 May 2022 01:07 PM IST
सार
दिव्यांश कहते हैं कि शार्ट कट से कभी भी मंजिल नहीं मिल सकती। वे रोजाना सात से आठ घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। उन्होंने सफलता का श्रेय माता-पिता और गुरुजनों को दिया है।
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दिव्यांश शुक्ला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
गोरखपुर जिले के सैनिक बिहार नंदानगर निवासी दिव्यांश शुक्ला ने दूसरे प्रयास में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 153वीं रैंक हासिल कर शहर का मान बढ़ाया है। दिव्यांश कहते हैं, मेहनत कोई विकल्प नहीं होता है। जब तक लक्ष्य हासिल न कर लें, तब तक हिम्मत न छोड़ें।
केंद्रीय विद्यालय (केवी) नंबर-एक एयरफोर्स में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता सुभाष चंद्र शुक्ला के पुत्र दिव्यांश ने पिता की देखरेख में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की है। केवी से ही वर्ष 2014 में प्रथम श्रेणी में इंटर करने के बाद वर्ष 2015 में आईआईटी बीएचयू से (सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक) किया।
पढ़ने में शुरू से मेधावी रहे दिव्यांश ने बीटेक करने के बाद सीसीएल झारखंड में सिविल इंजीनियर हो गए। झारखंड में रहते हुए उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा तैयारी की। पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली, लेकिन निराश नहीं हुए। पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा।
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दिव्यांश कहते हैं कि शार्ट कट से कभी भी मंजिल नहीं मिल सकती। वे रोजाना सात से आठ घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। उन्होंने सफलता का श्रेय माता-पिता और गुरुजनों को दिया है।
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केंद्रीय विद्यालय (केवी) नंबर-एक एयरफोर्स में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता सुभाष चंद्र शुक्ला के पुत्र दिव्यांश ने पिता की देखरेख में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की है। केवी से ही वर्ष 2014 में प्रथम श्रेणी में इंटर करने के बाद वर्ष 2015 में आईआईटी बीएचयू से (सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक) किया।
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पढ़ने में शुरू से मेधावी रहे दिव्यांश ने बीटेक करने के बाद सीसीएल झारखंड में सिविल इंजीनियर हो गए। झारखंड में रहते हुए उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा तैयारी की। पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली, लेकिन निराश नहीं हुए। पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा।
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दिव्यांश कहते हैं कि शार्ट कट से कभी भी मंजिल नहीं मिल सकती। वे रोजाना सात से आठ घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। उन्होंने सफलता का श्रेय माता-पिता और गुरुजनों को दिया है।