Exclusive: पिंजरों में कैद होते जा रहे, झुंड में कम दिखते हैं तोते
डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष पर्यावरण विज्ञान प्रो डीके सिंह ने कहा कि अवैध शिकार, वनों का विनाश और प्रदूषण के चलते तोते कम होते जा रहे हैं। तोतों की घटती संख्या पर्यावरण और जैव विविधता के लिए नुकसानदायक है।
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रंग बिरंगे पंखों और सुरीली आवाज के लिए विख्यात तोता पक्षी लोगों के घरों के पिंजरे में कैद होते जा रहे हैं। इस कारण बाग-बगीचों में इनकी संख्या कम होती जा रही है। यह स्थिति न तो पर्यावरण के अनुकूल है, न जैव विविधता के लिए अच्छी है। बावजूद इसके वन विभाग तोतों को पिंजरे में कैद करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता है।
आए दिन सड़कों पर पिंजरे में कैद तोतों को बेचते देखा जा सकता है। शिकारी तोतों को पकड़कर धंधा कर रहे हैं। लोग तोतों को पाल कर इस पक्षी को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा रहे हैं, लेकिन वन विभाग के अधिकारी खामोश हैं।
बताते हैं कि दशक पहले जंगल कौड़िया, मीरपुर, तुर्कवलिया, मजनू चौक, डोहरिया, नयागांव, फुलवरिया, रायपुर आदि स्थानों पर तोते झुंड के रूप में दिखाई देते थे। अब नहीं दिखाई देते हैं। तोते सामान्य रूप से पेड़ के खोखले घोंसला बनाते हैं। जब ये झुंड में होते थे तब मक्का और बाजरा की फसलों को चाव से खाते थे।
तोते अपनी खूबसूरती और सुरीली आवाज की वजह से इंसानों को प्रिय होते हैं। यही वजह है कि इंसान इन्हें पिंजरे में कैद करके पालता है। बताया जाता है कि दुनिया में तोतों की 399 जातियां पाई जाती हैं। जिन्हें 92 वंशों में संगठित किया जाता है।
इसका वैज्ञानिक नाम सिटासिफोर्मीस है। करीब एक तिहाई तोता जातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। अपने रंग-बिरंगे पंखों और घुमावदार चोंच के कारण यह काफी खूबसूरत होते हैं। अक्सर नर और मादा तोते की पहचान करना बहुत मुश्किल होता है।
तोतों को अवैध तरीके से पकड़ने और तस्करी करने वाले बड़ी संख्या में मिल जाते हैं। तस्करी के दौरान सैकड़ों की संख्या में हर साल तोते मर भी जाते हैं। इससे जैव विविधता को क्षति पहुंच रही है। इन्हीं कारणों से वर्तमान में तोतों का झुंड दिखाई नहीं देता है।
तोते विलुप्त होने के गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। अवैध शिकार के अलावा इनके लुप्त होने का बड़ा कारण प्राकृतिक आवास का खत्म होना भी बताया जा रहा है। वनों की कटाई, पर्यावरण प्रदूषण, जंगल की आग, भोजन की अनुपलब्धता और जलवायु परिवर्तन भी तोतों पर आए संकट की वजहें हैं।
डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष पर्यावरण विज्ञान प्रो डीके सिंह ने कहा कि अवैध शिकार, वनों का विनाश और प्रदूषण के चलते तोते कम होते जा रहे हैं। तोतों की घटती संख्या पर्यावरण और जैव विविधता के लिए नुकसानदायक है।
गोरखपुर डीएफओ विकास यादव ने कहा कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत तोतों का शिकार करना और उन्हें बेचना व पालना जुर्म है। ऐसा करने वालों पर जुर्माना लगाया जाएगा। सजा के लिए विधिक कार्रवाई की जाएगी।