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फसलों की बर्बादी से किसान परेशान, खेतों के चारों ओर बाड़बंदी के बावजूद भी प्रवेश कर जा रहे जानवर
Thu, 24 Dec 2020 04:10 PM IST
vivek shukla
टीपी शाही, गोरखपुर।
टीपी शाही, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Thu, 24 Dec 2020 04:10 PM IST
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खेतों में फसल खाते पशु।
- फोटो : अमर उजाला।
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दिल्ली की सीमा पर किसान तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। इधर, गोरखपुर जिले समेत पूर्वांचल के किसान एक दूसरी समस्या से त्रस्त हैं। इन किसानों की फसलों को छुट्टा और जंगली जानवर नुकसान पहुंचा रहे हैं। खेतों के चारों ओर बाड़बंदी के बावजूद ऐसे जानवरों को रोकना मुश्किल हो गया है। छुट्टा और जंगली जानवरों से फसलों को बचाने में अधिकतर किसानों के 24 घंटे बर्बाद हो जा रहे हैं। इसके बावजूद फसल नहीं बच पा रही है। खेतों से जानवरों को भगाने में विवाद और झगड़े अलग से हो रहे हैं। गोरखपुर में एक युवती की जान भी जा चुकी है।
वैसे तो छुट्टा पशुओं के लिए जनपद में गो आश्रय स्थल बनाए गए हैं, लेकिन हर क्षेत्र के खेतों में दर्जनों की संख्या में घूमते बछड़े मिल ही जाते हैं। भूख मिटाने के लिए इनके पास खेतों को चरने के अलावा और कोई चारा भी नहीं होता है। इन्हें रोकने के लिए किसानों को रखवाली करनी पड़ती है। खेत के चारों ओर बाड़बंदी करनी पड़ती है। बावजूद इसके यह खेतों में घुस ही जाते हैं। जब इन्हें खेत मालिक अपने खेत से भगाता है तो से दूसरे के खेत में चले जाते हैं। ऐसे में दोनों खेत मालिकों को झगड़ा हो जाता है। कभी-कभी मारपीट भी हो जाती है।
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वैसे तो छुट्टा पशुओं के लिए जनपद में गो आश्रय स्थल बनाए गए हैं, लेकिन हर क्षेत्र के खेतों में दर्जनों की संख्या में घूमते बछड़े मिल ही जाते हैं। भूख मिटाने के लिए इनके पास खेतों को चरने के अलावा और कोई चारा भी नहीं होता है। इन्हें रोकने के लिए किसानों को रखवाली करनी पड़ती है। खेत के चारों ओर बाड़बंदी करनी पड़ती है। बावजूद इसके यह खेतों में घुस ही जाते हैं। जब इन्हें खेत मालिक अपने खेत से भगाता है तो से दूसरे के खेत में चले जाते हैं। ऐसे में दोनों खेत मालिकों को झगड़ा हो जाता है। कभी-कभी मारपीट भी हो जाती है।
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काला नमक धान को छुट्टा पशुओं ने किया बर्बाद
इसी तरह 25 से 50 के झुंड में नीलगाय खेतों में आती हैं। ये फसल को चरने के अलावा उसे तहस नहस भी कर देती हैं। कितना भी ऊंचा बाड़ लगा दिया जाए यह उसे उछल कर पार कर लेती हैं। किसान दिन में इनकी रखवाली कर भी लेते हैं लेकिन रात में इन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है।
मटर-मक्का और सब्जी वाली फसलों को यह अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। धान-गेहूं की फसलों पर कम धावा बोलते हैं। इस वजह से अधिकतर किसान धान और गेहूं की फसल उगाने के लिए ही मजबूर हैं। मटर और मक्का की फसल को तो नीलगाय किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ते हैं। जिस खेत में यह फसल बोई जाती है उसे चौपट करके ही मानते हैं। यही वजह है कि किसानों ने मक्का और मटर की फसल को उगाना ही बंद कर दिया है।
गगहा ब्लाक के रियांव गांव निवासी डॉ. राम कुबेर यादव कालेज में प्रवक्ता थे। सेवानिवृत्ति के बाद वह गांव आकर खेती करने लगे। प्रयोग के तौर पर उन्होंने करीब तीन एकड़ में काला नमक धान की रोपाई की। काला नमक धान की फसल देरी से तैयार होती है। डॉ. यादव बताते हैं कि धान पकने के लिए एक सप्ताह का समय चाहिए था। इस बीच छुट्टा पशु और जंगली जानवरों ने खेत चरना शुरू कर दिया। उन्हें रोकने के लिए एक आदमी भी लगाया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। 20 से 25 की संख्या में जानवर खेत में धावा बोल देते। हार कर अधपका धान कटवा दिया। जहां 50 क्विंटल धान होता वहां दो क्विंटल ही पैदा हो सका। 60 हजार की पूंजी डूब गई।
मटर-मक्का और सब्जी वाली फसलों को यह अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। धान-गेहूं की फसलों पर कम धावा बोलते हैं। इस वजह से अधिकतर किसान धान और गेहूं की फसल उगाने के लिए ही मजबूर हैं। मटर और मक्का की फसल को तो नीलगाय किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ते हैं। जिस खेत में यह फसल बोई जाती है उसे चौपट करके ही मानते हैं। यही वजह है कि किसानों ने मक्का और मटर की फसल को उगाना ही बंद कर दिया है।
गगहा ब्लाक के रियांव गांव निवासी डॉ. राम कुबेर यादव कालेज में प्रवक्ता थे। सेवानिवृत्ति के बाद वह गांव आकर खेती करने लगे। प्रयोग के तौर पर उन्होंने करीब तीन एकड़ में काला नमक धान की रोपाई की। काला नमक धान की फसल देरी से तैयार होती है। डॉ. यादव बताते हैं कि धान पकने के लिए एक सप्ताह का समय चाहिए था। इस बीच छुट्टा पशु और जंगली जानवरों ने खेत चरना शुरू कर दिया। उन्हें रोकने के लिए एक आदमी भी लगाया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। 20 से 25 की संख्या में जानवर खेत में धावा बोल देते। हार कर अधपका धान कटवा दिया। जहां 50 क्विंटल धान होता वहां दो क्विंटल ही पैदा हो सका। 60 हजार की पूंजी डूब गई।
किसान संगठन पशुओं की समस्या नहीं उठाते
ग्राम प्रधान बृजेश शाही बड़े किसान हैं। इन्होंने भी काला नमक धान की रोपाई की थी। इनके धान को भी छुट्टा पशु और जंगली जानवर खा गए। बताते हैं कि दो एकड़ फसल में एक क्विंटल भी धान घर हीं आया। शाही कहते हैं कि किसान संगठन जानवरों की समस्या को नहीं उठाते हैं। जबकि इस समस्या से अधिकतर किसान परेशान हैं। कइयों ने तो खेती करनी भी छोड़ दी है। जानवरों की वजह से घर का पैसा भी डूब जाता है।
नीलगायों ने किसानों को किया बर्बाद
पीपीगंज क्षेत्र निवासी भोला यादव कहते हैं कि किसान की सबसे बड़ी समस्या छुट्टा पशु हैं। खेतों में सौ-सौ की संख्या में नीलगाय और बीस-बीस की संख्या में घूमने वाले पशु किसानों को तबाह कर रहे हैं। किसानों का सबसे अधिक नुकसान इन जानवरों से हो रहा है। भोला यादव कहते हैं कि सरकार को इस संबंध में प्रभावी कदम उठाना चाहिए।
जिला कृषि अधिकारी अरविंद चौधरी ने बताया कि छुट्टा पशुओं के लिए पशुपालन विभाग काम कर रहा है। जगह-जगह गो आश्रय केंद्र बनाए गए हैं। नीलगायों को रोकने के लिए कृषि विभाग की तरफ से कोई उपाय नहीं किया जाता है।
नीलगायों ने किसानों को किया बर्बाद
पीपीगंज क्षेत्र निवासी भोला यादव कहते हैं कि किसान की सबसे बड़ी समस्या छुट्टा पशु हैं। खेतों में सौ-सौ की संख्या में नीलगाय और बीस-बीस की संख्या में घूमने वाले पशु किसानों को तबाह कर रहे हैं। किसानों का सबसे अधिक नुकसान इन जानवरों से हो रहा है। भोला यादव कहते हैं कि सरकार को इस संबंध में प्रभावी कदम उठाना चाहिए।
जिला कृषि अधिकारी अरविंद चौधरी ने बताया कि छुट्टा पशुओं के लिए पशुपालन विभाग काम कर रहा है। जगह-जगह गो आश्रय केंद्र बनाए गए हैं। नीलगायों को रोकने के लिए कृषि विभाग की तरफ से कोई उपाय नहीं किया जाता है।