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मोबाइल फोन, लैपटॉप की यारी, बच्चों की सेहत पर पड़ेगी भारी, विशेषज्ञ बोले, अभिभावकों को रहना होगा सतर्क

Sun, 14 Jun 2020 12:18 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sun, 14 Jun 2020 12:18 PM IST
सार

  • रचनात्मक क्षमता प्रभावित होती है, मानसिक विकास पर भी खराब असर
  • विशेषज्ञ बोले, ऑनलाइन पढ़ाई के दौर में रहना होगा सतर्क

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Experts said Poor impact on student mental development due to online studying
प्रतीकात्मक तस्वीर।

विस्तार

कोरोना संकटकाल में बच्चों की पढ़ाई ज्यादा प्रभावित न हो इसके लिए विद्यालय प्रबंधन ऑनलाइन माध्यमों को तरजीह दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल फोन और लैपटॉप पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों की रचनात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसका असर बच्चों के मानसिक विकास पर भी होगा।

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ध्यान केंद्रित करने में आ सकती है परेशानी
बच्चे छह या सात घंटे से ज्यादा स्क्रीन के सामने रहते हैं तो कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं हो सकती हैं। आत्मसंयम की कमी, जिज्ञासा में कमी, भावनात्मक स्थिरता ना होना, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाना जैसी दिक्कत सामने आ सकती है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी प्रो. धनंजय कुमार ने बताया कि मोबाइल फोन, लैपटाप या टीवी की स्क्रीन पर क्या देखा जा रहा है यह भी मायने रखता है। यह समझना भी जरूरी है कि ऑनलाइन क्लास में जो पढ़ाया जा रहा है, बच्चे उसे कितना समझ पा रहे हैं।
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नॉर्मल अटेंशन 20 से 30 मिनट होता है यानी कोई भी व्यक्ति एक बार में इतनी ही देर तक काम पर अच्छी तरह फोकस कर सकता है। यह सीमा अधिक से अधिक 40 मिनट हो सकती है। इसके बाद ध्यान भटकना शुरू हो जाता है। 

बच्चों को क्रिएटिव एक्टिविटीज में लगाना होगा

गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ. मनीष पांडे ने बताया कि हमें ध्यान रखना है कि ऑनलाइन पढ़ाई मजबूरी में बनी व्यवस्था है। इसे लंबे समय तक जारी रखना बच्चों के शारीरिक और मानसिक दोनों स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा। हालांकि छोटे बच्चों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई  होमवर्क या असाइनमेंट देने तक सीमित है, फिर भी इस नई विधा के साथ सामंजस्य बनाने का दबाव हानिकारक हो सकता है।

ग्रामीण क्षेत्र में माता-पिता के लिए भी यह एक बड़ी समस्या बन गई है। वर्तमान संकट काल में पूरा कोर्स पढ़ाने के बजाय चयनित विषयों पर फ़ोकस करते हुए बच्चों को क्रिएटिव एक्टिविटीज में लगाना होगा। कोर्स कंप्लीट करने के दबाव से बच्चों को मुक्त करना होगा। अगर स्कूल लंबे समय तक बंद रहता है तो बच्चों को सिर्फ भाषा, गणित, बाल साहित्य, स्टोरी बुक्स आदि पढ़ना सिखाकर इसे उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण साल बनाया जा सकता है।

ऐसे कराएं छोटे बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई
स्कूलों द्वारा एप के माध्यम से विषय से संबंधित पाठ्यक्रम और होमवर्क भेजे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि, अभिभावक मोबाइल फोन पर आने वाले पाठ्यक्रम व होमवर्क को कॉपी पर उतारकर बच्चों को स्वयं पढ़ाएं। मोबाइल फोन देकर बच्चों को कभी कमरे में अकेला न छोड़ें। मनो विश्लेषकों के मुताबिक बच्चों का मानसिक विकास पांच चरणों में होता है।

कक्षा एक से पांच तक के बच्चे स्कूलिंग पीरियड में होते हैं। इस दौरान बच्चे अधिक देर तक जिस चीज को देखते हैं, उसकी छवि उनके दिमाग में अपनी जगह बना लेती है। मोबाइल फोन या कंप्यूटर स्क्रीन नजदीक से देखने के कारण छोटे बच्चों की रेटिना पर असर होने के कारण कम उम्र में ही आंखों से संबंधित बीमारी होने की आशंका रहेगी।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान

  • मोबाइल फोन को लैपटॉप, डेस्कटॉप या एलईडी से जोड़कर बड़ी स्क्रीन पर पढ़ाई करवाएं।
  • बीच-बीच में बच्चों को ब्रेक जरूर दिलाएं
  • माता-पिता बच्चों के बैठने के तरीके पर नजर रखें
  • चेक करते रहें कि बच्चे कहीं गेम या चैट पर समय तो नहीं बिता रहे
  • ऑनलाइन मैटर को कॉपी पर लिखवाकर काम करवाएं
  • बच्चों को अभिभावक घर पर पढ़ाएं

आरपीएम ग्रुप ऑफ स्कूल्स के डायरेक्टर अजय शाही ने बताया कि ऑफलाइन पढ़ाई का विकल्प कभी ऑनलाइन पढ़ाई नहीं बन सकती है। महामारी जिस स्थिति में आज अपने पांव पसार रही है। बच्चों  को स्कूूल से जोड़े रखने और पढ़ाई में रूचि बनाए रखने के लिए कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है। जब स्कूल खुलेंगे तो फिर पुराने तरीके से कक्षाएं चलने लगेंगी। लॉकडाउन में जिस तरह ऑनलाइन पढ़ाई को विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों ने अपनाया है। निश्चित तौर पर इसे हमेशा के लिए पढ़ाई में शामिल करने के लिए सरकार की ओर से योजना बनाई जा रही है।
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