गोरखपुर: दूसरों को न्याय दिलाने वाले बुजुर्ग हरिशंकर खुद न्याय के इंतजार में, पेंशन का लाभ दिलाने के लिए किया था संघर्ष
एसएसपी ने रामगढ़ताल पुलिस को जांच पूरी कर रिपोर्ट भेजने का दिया निर्देश, पूर्वांचल बैंक कर्मचारी एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं हरिशंकर।
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पूर्वांचल बैंक कर्मियों के लिए संघर्ष कर उनको न्याय दिलाने वाले हरिशंकर सिंह उम्र के आखिरी पड़ाव में खुद के न्याय के लिए इंतजार कर रहे हैं। हालांकि, मामला संज्ञान में आने के बाद एसएसपी डॉ. विपिन ताडा ने रामगढ़ताल पुलिस से जांच कर पूरी रिपोर्ट मांगी है। अब हरिशंकर सिंह को न्याय कब मिलेगा, यह देखना होगा। पर इतना जरूर है कि अगर प्रशासनिक और पुलिस अफसर चाहें तो वह अपने उस घर में जरूर लौट जाएंगे, जिसे बड़े अरमानों से उन्होंने बनवाया था।
जानकारी के मुताबिक, देवरिया के रुद्रपुर के मूल निवासी हरिशंकर सिंह पूर्वांचल बैंक के मैनेजर पद से रिटायर्ड थे। 78 वर्षीय हरिशंकर ने बताया कि वे नेशनल फेडरेशन ऑफ रिटायर्ड रीजनल रूरल बैंक स्टाफ एसोसिएशन के वर्ष 2009 से 2021 तक राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। दूसरों के लिए बहुत संघर्ष किया। मेरे ही संघर्ष के बाद पूर्वांचल बैंक कर्मियों को पुरानी पेंशन का लाभ मिला। लेकिन, आज अपने ही बेटे से हार गया हूं। पुलिस प्रशासन में शिकायत करने के बाद कोई सुनने वाला ही नहीं है। खुद का मकान होते हुए भी बेघर होकर बुढ़ापे में किराए के कमरे में रहने को मजबूर हूं।
वरिष्ठ अधिवक्ता शंकर शरण त्रिपाठी ने कहा कि बुजुर्ग माता-पिता को कानून ने कई अधिकार दिए हैं। कोई भी बेटा अपने मां-बाप को घर से नहीं निकाल सकता है। उनकी अपनी संपत्ति से बेदखल करना अपराध की श्रेणी में आता है। अगर, कोई संतान मां-बाप को लावारिस छोड़ देता है तो उन्हें भरण-पोषण पाने का अधिकार भी है। डीएम के पास यह दिलाने का पूरा अधिकार होता है। अगर माता-पिता नहीं चाहें तो उनकी संपत्ति (घर में) बेटे को घुसने तक का अधिकार नहीं है। अगर मकान की रजिस्ट्री बेटे के नाम पर है तो उसे गुजारा भत्ता देना होगा।
बुजुर्ग माता-पिता के ये हैं अधिकार
- बुजुर्ग माता-पिता को अपने बच्चों से भरण-पोषण पाने का अधिकार है।
- जिस घर में वे रह रहें, उसकी रजिस्ट्री उन्हीं के नाम पर है तो बच्चा उन्हें घर से बाहर नहीं कर सकता।
- बच्चे अपने घर में उन्हें नहीं रखना चाहते तो उसे मां-बाप को हर माह गुजारा भत्ता देना होगा।
- गुजारा भत्ता माता-पिता की जरूरतों और बेटे की कमाई के हिसाब से तय होता है।
बेटा घर से बाहर कर दे तो क्या करें
- वरिष्ठ नागरिक संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत पेरेंट्स ऐसे में कार्रवाई की मांग कर सकते हैं।
- सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा-भत्ते की मांग कर सकते हैं।
- डीएम से शिकायत की जा सकती है।
- बच्चे ने मारपीट की या धमकी दी है तो पुलिस में भी शिकायत की जा सकती है।
- पुलिस मामले को न सुने तो मजिस्ट्रेट या फैमिली कोर्ट में अपील कर सकते हैं।
धोखे से घर अपने नाम करवा लिया तो मान्य नहीं
यदि किसी बेटे ने माता या पिता को बहला-फुसलाकर धोखे से अपने नाम उनकी प्रॉपर्टी करवा ली है तो यह मान्य नहीं है। अभिभावक इसकी शिकायत करते हैं तो जिला प्रशासन उन्हें वापस कब्जा दिलवा सकता है। प्रशासन से सहयोग न मिलने पर अभिभावक कोर्ट में केस लगा सकते हैं।
यह हो सकती है सजा
- मां-बाप को बाहर निकालने पर तीन महीने तक की सजा का प्रावधान है, जमानत जल्दी नहीं मिलती।
- ऑर्डर के बाद भी कोई बच्चा अपने पेरेंट्स को गुजारा भत्ता नहीं देता, तो उसे एक माह का कारावास हो सकती है।
कानपुर में पुलिस ने दिलाया था बुजुर्ग दंपती को त्वरित न्याय
अगस्त 2021 को कानपुर पुलिस के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर असीम अरुण के पास एक बुजुर्ग दंपती, बेटे-बहू की शिकायत लेकर पहुंचे थे। कमिश्नर ने जरा भी देरी नहीं की और खुद ही दोनों को लेकर उनके घर पहुंच गए। सुरक्षा दी और बेटे-बहू को घर से बाहर कर दिया। इस घटना से गोरखपुर पुलिस क्यों सबक नहीं लेती, उसके पास भी वही कानूनी अधिकार हैं, जो कानपुर पुलिस के पास है। बस मामला इच्छा शक्ति का है। क्या वैसी ही इच्छा शक्ति गोरखपुर पुलिस नहीं दिखा सकती ?
एसएसपी डॉ. विपिन ताडा ने कहा कि रामगढ़ताल पुलिस को निर्देशित किया गया है कि बुजुर्ग के प्रार्थनापत्र पर नियमानुसार कार्रवाई करें। इसके बाद भी लापरवाही सामने आई तो कार्रवाई की जाएगी।