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मुकद्दर का सिकंदर: कठिन हालात को कोसा न हारीं, लगन से टॉप कर बनीं दुलारी

Fri, 30 Jun 2023 12:52 PM IST
vivek shukla विश्वदीपक/राजीव, देवरिया।
विश्वदीपक/राजीव, देवरिया। Published by: vivek shukla Updated Fri, 30 Jun 2023 12:52 PM IST
सार

नौ स्वर्ण मेडल की खबर आम होने के बाद रचना के घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। यह सब देखकर परिवार के लोगों खुशी के आंसू साफ दिख जाते हैं। परिवार के लोगों ने बताया, रचना शुरू से ही मेधावी रही है।

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Daughter of sweets vendor Rachana Gupta got nine gold medals in Gorakhpur University
टॉपर रचना गुप्ता अपनी मां और बहन के साथ। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

गोरखपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में नौ स्वर्ण पदक हासिल करने वाली रचना का नाम अब सबकी जुबान पर है। पिता ठेला चलाकर परिवार का जैसे-तैसे भरणपोषण करते हैं। घर के हालात ऐसे हैं कि इस तरह की उपलब्धियों को हासिल करना छोड़िए, सोचेगा तक नहीं। लेकिन मिठाई बेचने में पिता की मेहनत लगन शिद्दत से सीखकर होनहार और कर्मठ रचना ने अपनी कामयाबी की पटकथा लिख डाली। रचना और उसके परिवार ने न तो मुफलिसी और अपनी किस्मत को कोसा और न ही हार मानी। बस, मेहनत पर भरोसा किया। आज नतीजा सबके सामने है।

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शहर के गरुलपार धोबी टोला में यह परिवार नीचे दो और ऊपर दो कमरों के मकान में रहता है। ऊपर के दो कमरे छह माह पहले ही बने हैं। अब सबसे ऊपर ही मिठाई बनती है। इसके बाद पिता राजकुमार छह बजे शाम तक ठेला लेकर कोतवाली चौराहे पर पहुंच जाते है और रात 11 बजे तक दुकान लगाते हैं।
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मिठाई तैयार करने के लिए तड़के से जुटते हैं और दिन भर तपिश झेलकर देर रात घर आकर टिकते हैं। वह पिछले 25 वर्षों से अनवरत यह काम करते चले आ रहे हैं ताकि बच्चों का भविष्य बेहतर बने। शायद पिता की ऐसी मेहनत और लगन को ही रचना ने आत्मसात किया और मिठाई की जगह पढ़ाई में जुट गई।
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Daughter of sweets vendor Rachana Gupta got nine gold medals in Gorakhpur University
टॉपर रचना गुप्ता - फोटो : अमर उजाला।

नौ स्वर्ण मेडल की खबर आम होने के बाद रचना के घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। यह सब देखकर परिवार के लोगों खुशी के आंसू साफ दिख जाते हैं। परिवार के लोगों ने बताया, रचना शुरू से ही मेधावी रही है। रचना ने बताया कि गोरखपुर में रहकर पढ़ाई करने में रकम ज्यादा लगता, इसलिए हर दिन वह एमएसटी के जरिये ट्रेन से ही गोरखपुर पढ़ने जाती है और शाम तक वापस आ जाती है। बीएससी प्रथम वर्ष में एक साल तक छात्रावास में रही, लेकिन मन नहीं लगने पर घर लौट आई।

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यह बात वह बोलती नहीं है, लेकिन उसे जानने वालों का मानना है कि ऐसा उसने समझादारी के चलते फालतू खर्च बचाने के लिए किया। हर दिन देवरिया से गोरखपुर की 52 किलोमीटर की यात्रा करने का फैसला लिया। प्रतिदिन क्लास करने से सारे शिक्षक पहचानने लगे और उसे जो समझ में नहीं आता, उसे समझाते भी थे। कोरोना काल में भी ऑनलाइन पढ़ाई में शिक्षकों ने मदद की।

रचना ने बताया कि गणित विभाग के विभागाध्यक्ष राजेश कुमार के अलावा सुधीर श्रीवास्तव, ज्ञानवेंद्र प्रताप सिंह, विवेक शर्मा ने विशेष मार्गदर्शन दिया। पढ़ाई में सोशल मीडिया से भी काफी मदद मिली।

मूवी या सीरियल देखने का उसे कभी बचाने शौक नहीं रहा, बेहतर तरीके से पढ़ाई हो, बस वह हर पल यही सोचती। एमएससी के बाद से अब कोई एकेडमिक कोर्स नहीं करना है। अब केवल सिविल सेवा की तैयारियों में समझ जुटना है। इसके लिए ऑनलाइन कोचिंग क्लासेज भी ज्वाइन कर ली है।

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मां पांचवी पास, बेटी ने कर दी गोल्ड की बरसात

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सबसे अधिक गोल्ड पाने वाली रचना गुप्ता को मेडल उपाधि देते कुलपति प्रो.राजेश सिंह। - फोटो : अमर उजाला।

राजकुमार गुप्ता ने इंटर तक की पढ़ाई किए हैं। उनकी पत्नी गायत्री देवी पांचवीं पास हैं। मां काफी कम पढ़ी-लिखी होने के बाद भी बेटी को हमेशा पढ़ाई करने पर जोर देती हैं। बेटी को समझातीं कि पढ़ो और अफसर बनो। पापा की मेहनत रंग लाए, ताकि पूरा परिवार ही संवर जाए।

राजकुमार गुप्ता व गायत्री देवी के तीन संतानों में सबसे बड़ा बेटा विजय कुमार ने कंप्यूटर साइंस से पॉलीटेक्निक में डिप्लोमा एवं बीएससी किया है। वह तरकुलवा ब्लॉक में संविदा पर ब्लॉक कोआर्डिनेटर के पद पर कार्यरत है। दूसरे स्थान पर बहन आरती हैं जिन्होंने बीटीसी पूरा कर परिषदीय शिक्षक के लिए होने वाली परीक्षाएं पास कर भर्ती निकलने की राह देख रही हैं। सबसे छोटी रचना जो घर में सबकी लाडली हैं, इनकी पढ़ाई का सबने विशेष ख्याल रखा। रचना ने बताया कि भाई की नौकरी लगने पर परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।

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बच्चे मेले में ठेला न लगाएं, इसलिए खुद का पेट काटकर पढ़ाया

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रचना गुप्ता के पिता राजकुमार ठेले पर मिठाई बेचते हैं। - फोटो : अमर उजाला।
बेटी के मेडल पाने की खुशी अकल्पनीय है। हमने कभी शौक नहीं पाला। मोबाइल नहीं रखा और न ही बाइक चलाना सीखा। इसके पीछे एक ही कारण रहा कि. एक बार जब दशहरा का मेला था तो लोग अपने परिवार के साथ मेला कर रहे थे और हम ठेला लगाकर दुकानदारी कर रहे थे। हमने उसी दिन सोच लिया कि अपने खर्चे को काटकर बेटे और बेटियों को पढ़ाऊंगा, ताकि वह कभी मेला में ठेला न लगाएं। यह कहते हुए नौ गोल्ड मेडल पाने वाली रचना गुप्ता के पिता राजकुमार गुप्ता की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि अब बेटी को यूपीएससी की तैयारी करानी है।

पिता राजकुमार गुप्ता ने बताया कि गरीबी को हमने बहुत करीब से देखा है। पापा केशव पटेल के पिता भी ठेला लगाते थे। पर हमने सोच लिया था कि अब बच्चों को सड़क पर आकर ठेला नहीं लगाना है। इसके लिए सबसे पहले अपने खर्चे को कम कर दिया। मोबाइल रखता तो 200 रुपये महीने खर्च होता। यही सोचकर बाइक भी चलाने की सोची तक नहीं।

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हर रोज करीब 500 रुपये ठेले से कमा लेता हूं। इतना जरूर है कमरे की व्यवस्था कि कोई भी व्यक्ति वह कितना भी कमा लें, अगर मैनेज करना नहीं जानता है तो जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा। बेटी को ऐसे कोचिंग सेंटर में नाम लिखाया, जहां मैं अपनी बात खुद जाकर कह सकूं।

हाईफाई कोचिंग सेंटर के बारे में कभी नहीं सोचा। दो दिन पहले मैसेज मिल गया था, लेकिन बृहस्पतिवार की सुबह जब मेरे घर हर रोज आने वाले अमर उजाला अखबार में बेटी का फोटो देखा तो कुछ देर के लिए मैं भावुक हो गया और अखबार के उस पन्ने को चूम लिया।



 
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