खतरनाक: इंटरनेट गेमिंग एडिक्शन के शिकार हो रहे बच्चे, विशेषज्ञों ने बताई ये खास वजह
ऑनलाइन क्लास ने बच्चों के हाथों में दे दिया है मोबाइल और लैपटॉप, अधिकतर ऑनलाइन गेमिंग एडिक्शन के शिकार हैं।
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डेढ़ साल की कोराना महामारी के दौरान बच्चों का घर से बाहर निकलना बंद हो गया। इस दौरान उनके हाथ में मोबाइल आ गया। आभासी दुनिया के इस हथियार ने बच्चों को एक ऐसे अंतरजाल में फंसा दिया है, जहां पर वह अवसाद ग्रस्त होते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि जिला अस्पताल के मनोविज्ञान विभाग में हर सप्ताह पांच से छह बच्चे मानसिक इलाज कराने पहुंच रहे हैं। इनमें से अधिकतर ऑनलाइन गेमिंग एडिक्शन के शिकार हैं।
जानकार बताते हैं कि कोरोना महामारी ने बच्चों से पहले उनका स्कूल छीना, फिर पढ़ाई। ऑनलाइन क्लास के नाम पर स्मार्ट फोन हाथ आया तो उनका बचपन छीनना शुरू कर दिया। खेलकूद बंद हुआ तो इंटरनेट की दुनिया भाने लगी। आभासी दुनिया में बच्चों के हाथ लग गए तरह-तरह के गेम। घंटों ऑनलाइन गेम खेलने में व्यस्त बच्चे खाना-पीना तक भूलने लगे।
जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ अमित शाही का कहना है कि बच्चों का पिछले एक डेढ़ साल से घरों से न निकल पाना उन्हें मानसिक तनाव की ओर धकेल रहा है। उस पर बच्चों की ऑनलाइन क्लास ने उनके हाथों में मोबाइल और लैपटॉप थमा दिया। इस वजह से वह इंटरनेट गेमिंग एडिक्शन का शिकार हो रहे हैं। पांच से लेकर 17 वर्ष के बच्चे इसकी लती होते जा रहे हैं। इसकी लत छुड़ाने के लिए अभिभावक अगर जरा सा दबाव डाल रहे हैं, तो बच्चे खाना-पीना छोड़कर चिड़चिड़े होते जा रहे हैं। उनका व्यवहार गुस्सैल हो गया है। ऐसे केस सप्ताह में पांच से छह आ रहे हैं। अभिभावकों को सलाह दी जा रही है कि जरूरत के अनुसार ही बच्चों को मोबाइल या लैपटॉप दें।
इस तरह से बचा जा सकता है
डब्ल्यूएचओ ने मानसिक बीमारी की सूची में किया है शामिल
डॉ अमित शाही ने बताया कि ऑनलाइन गेम की लत नशीले पदार्थ के सेवन से कम खतरनाक नहीं है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे मानसिक बीमारियों की सूची में शामिल किया है। इसके कई नाम हैं जैसे इंटरनेट की लत, मोबाइल की लत या गेमिंग एडिक्शन। नशीले पदार्थ का सेवन करने पर वह शरीर के अंदर जाकर नुकसान पहुंचाता है, जबकि ऑनलाइन गेम की लत में दूसरी तरह का असर होता है। यह मानसिक रूप से बच्चों को दूसरी ओर ले जाता है।
यह दिक्कतें हों तो डॉक्टर को दिखाएं
डॉ अमित शाही ने बताया कि कई बच्चों को मोबाइल के बिना घबराहट और बेचैनी होने लगती है। कई अभिभावकों को पता ही नहीं चलता कि यह ऑनलाइन गेम की लत का परिणाम है। इस समस्या पर माता-पिता का ध्यान बच्चों पर नहीं जाता है। इसकी जानकारी उन्हें तब हो पाती है जब समस्या बढ़ जाती है। इसलिए इस तरह की दिक्कतें अगर होती हैं तो तत्काल चिकित्सक से संपर्क करें।
केस- एक
राप्ती नगर का रहने वाला एक आठ वर्षीय बालक इंटरनेट पर हार्ड कोर गेम खेलते-खेलते इस तरह अवसाद में आ गया कि उसे हर जगह ऐसा दिखता था कि मानो उसे लोग मारने आ रहे हैं। शाम होते ही वह कांपने लगता था। हालात ऐसे हो गए कि उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वह डॉक्टरों को देखकर रोने लगता था।
केस- दो
हरिओम नगर के रहने वाले 10 वर्षीय बालक को मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई। परिजन गेम को अनस्टॉल कर दिए तो उसने खाना ही छोड़ दिया। उसके सिर में दर्द भी रहने लगा। परिजन बच्चों के डॉक्टर के पास ले गए तो उसे मानसिक रोग विभाग भेज दिया गया। चिकित्सकों के अनुसार उसे गेमिंग एक्डिशन हो गया था। काउसिंलिंग करके उसे ठीक किया गया।