करिश्माई मुआवजा: बच्चों को IAS की तैयारी करा रहे तो कुछ दावतों में उड़ा रहे रकम, लोगों की बदली जीवनशैली
आदित्य प्रकाश का कहना है कि तब सरकार ने बेहद ही कम पैसा दिया था। करीब-करीब 10 से 12 हजार रुपये प्रति डिसमिल भुगतान किया गया था। इसी क्षेत्र के रवि प्रकाश ने मुआवजे की रकम से ट्रैक्टर खरीद कर खेती में उसका इस्तेमाल किया। 10 साल तक ट्रैक्टर चलाने के बाद उसे बेच दिया।
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गोरखपुर शहर की सीमा से सटे गांवों की जमीनें जब फोरलेन के लिए अधिगृहित की गईं तो किसानों की बांछें खिल उठीं। जो जमीन कौड़ियों के भाव नहीं बिकती थी, उसकी अच्छी-खासी कीमत मुआवजे के रूप में मिली। ज्यादातर किसानों की तरक्की की राह खुल गई, लेकिन कुछ ने रकम शानो-शौकत में उड़ा दी। हालांकि, बहुत ऐसे भी जरूरतमंद थे, जिनके लिए मुआवजे की रकम किसी संजीवनी से कम नहीं थी।
अब माड़ापार गांव के राधेश्याम को ही ले लीजिए, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही उनकी पत्नी उर्मिला की जान बच गई तो इसी गांव के दूधिए जयराम अपने बेटा-बेटी को दिल्ली में आईएएस की तैयारी करवा रहे हैं। वहीं, बसडीला के ही दो किसान ऐसे भी हैं जिन्होंने मुआवजे की राशि को दावत में उड़ा दिए। जमीन भी गई और हाथ भी खाली हैं।
माली हालत ठीक नहीं थी...अब सपने सच होते दिख रहे
माड़ापार के रहने वाले जयराम यादव दूध बेचते हैं। 15 साल पहले उनकी माली हालत ठीक नहीं थी। दूध बेचने से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। उनकी एक बेटी पूजा और बेटा महेश हैं। दोनों की पढ़ाई को लेकर वह चिंतित रहते थे। वर्ष 2006 में जब जमीन का अधिग्रहण का शुरू हुआ तो उनकी चिंता और बढ़ गई थी। उनको लगा कि खेती की भूमि भी हाथ से निकल जाएगी तो क्या करेंगे।
जगदीशपुर के पास उनके सहित अन्य 10 पट्टीदारों की जमीन थी। सरकार ने जब जमीन ली तो एक मुश्त रकम दी। करीब 12 लाख रुपये मिले। इसमें अपने हिस्से की भूमि से मिले दो लाख रुपये को जयराम ने बैंक में जमा करा दिए। दूध बेचकर होने वाली कमाई और मुआवजे की मदद से उन्होंने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा ग्रहण कराने का फैसला लिया। अप्रैल माह में उन्होंने अपनी बेटी पूजा को आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली भेजा है।
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मुआवजे से बनवाई दुकानें, बना आय का जरिया
इसी गांव के रहने वाले नरेंद्र मौर्या और उनके बड़े भाई धर्मेंद्र कुमार की पांच बीघा जमीन सड़क बनाने के लिए सरकार ने ली। इसके बदले में उनको करीब 40 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया। इस पैसे से दोनों भाइयों ने हाइवे के किनारे ही नया मकान और कटरा बनवाया। इसी कटरे में नरेंद्र ने किराना की दुकान खोली, जबकि उनके भाई ने शृंगार और सजावट का सामान बेचना शुरू कर दिया।
एक दर्जन से अधिक दुकानों को दोनों भाइयों ने किराए पर दे दिया है। इससे होने वाली आय से परिवार का खर्च चलाने के साथ ही बच्चों की पढ़ाई- लिखाई भी हो रही है। नरेंद्र का कहना है कि उस समय जो रकम तय थी। वहीं सभी लोगों को दी गई, जिसका उन्होंने सदुपयोग किया। उनकी जीवन शैली जरूर बदली। इसी पैसे से शादी- विवाह सहित अन्य काम भी निपट गए।
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मकान बनवाया, जमीन में कर दिए निवेश
जगदीशपुर के रहने वाले आदित्य प्रकाश त्रिपाठी की जमीन कोनी मोड़ पर थी। उनकी पूरी जमीन फोरलेन निर्माण की भेंट चढ़ गई। करीब दो एकड़ भूमि के अधिग्रहण के बाद मुआवजा के रूप में 29 लाख रुपये मिले। इस रकम को पाकर वह संतुष्ट नहीं हुए। लेकिन जो रकम मिली, उससे मोहद्दीपुर में एक नया मकान बनवाया। खेती के लिए अलग जमीन खरीदी।
आदित्य प्रकाश का कहना है कि तब सरकार ने बेहद ही कम पैसा दिया था। करीब-करीब 10 से 12 हजार रुपये प्रति डिसमिल भुगतान किया गया था। इसी क्षेत्र के रवि प्रकाश ने मुआवजे की रकम से ट्रैक्टर खरीद कर खेती में उसका इस्तेमाल किया। 10 साल तक ट्रैक्टर चलाने के बाद उसे बेच दिया।
दावतों में उड़ा दिए...अब पछतावा
तमाम ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपने हिस्से की रकम को खाने-पीने में उड़ा दी। बसडीला गांव के एक व्यक्ति को ढाई लाख रुपये मिले थे। उन्होंने कोई नया काम शुरू करने के बजाय शराब पीने और शान शौकत में अपनी रकम खर्च कर दी। चौराहे पर पहुंचकर लोगों को दावत देने, लोगों को आकर्षित करने के लिए रोजाना हर हफ्ते नए कपड़े सहित अन्य कामों में अपने पैसा गवां दिए। अन्य लोगों की तरक्की देखकर वह पछतावा रहता है।
लखनऊ से गोरखपुर होते हुए कुशीनगर तक फोरलेन का शुभारंभ वर्ष 2012 में हुआ था। इस हाइवे के निर्माण में 24 गांवों के 400 किसानों की जमीनें अधिगृहित की गईं। बसडीला गांव के सामने से होकर फोरलेन गुजरती है। इस गांव के अक्षयवर यादव, भगवंत और अभिमन्यु यादव तीन भाई हैं।
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अक्षयवर दुबई में रहकर शटरिंग का काम करते थे। भगवंत फैजाबाद की चीनी मिल में कार्यरत थे। तीनों भाइयों की 36 डिसमिल जमीन सड़क के लिए अधिगृहित की गईं। नौ लाख रुपये मुआवजा मिला तो अभिमन्यु यादव ने गांव के सामने ही ढाबा खोलकर रोजगार शुरू कर दिया। इसी ढाबे की देखभाल के लिए उन्होंने अपने भाई अक्षयवर को दुबई से बुला लिया।
चीनी मिल की नौकरी छोड़कर भगवंत भी गांव आ गए। अब तीनों भाई मिलकर ढाबा चलाते हैं। आठ- आठ घंटे का समय देकर ढाबे से परिवार की आजीविका चला रहे हैं। अभिमन्यु का कहना है कि तब उन लोगों का काफी पैसा मिला था। इसलिए ज्यादा बड़ा कारोबार नहीं शुरू कर पाए, लेकिन मुआवजे से आगे बढ़ने में मदद मिल रही है।
इन गांवों की जमीनें अधिग्रहित हुईं
सिक्टौर, तालकंद्रा, कोनी, रामपुर बजुर्ग, जगदीशपुर, बसडीला, भैंसहा, रामनगर कड़जहां, बहरामपुर, कुरमौल, कटहरवां, खलवा टोला, सिसवा उर्फ चनका, मल्लपुर, जगपुर, रामूडीहा आदि।
पैसे से खोला ढाबा
बसडीला निवासी अभिमन्यु यादव ने कहा कि मेरे दोनों भाई बाहर रहकर कमाते थे। पैसा मिला तो हम लोगों ने ढाबा खोलने का फैसला लिया। हाइवे से गुजरने वाले ट्रक सहित अन्य वाहन रुकते हैं। इससे अच्छी कमाई हो जाती है। अब एक नया ढाबा खोलने की सोच रहे हैं।
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दुकान में लगाई रकम
बसडीला निवासी नरेंद्र मौर्या ने कहा कि हम लोगों के पास खेती की जमीन थी। पूरा परिवार खेती पर निर्भर था। सरकार ने जब जमीन ली तो मां खूब रोई। उसे लगा कि मेरे बच्चे अब कैसे जीएंगे, लेकिन हम लोगों को जो पैसा मिला। उसी से नया मकान और कटरा बनवाकर अपनी दुकान खोल ली। अब कोई दिक्कत नहीं है।
मुआवजे की रकम से बच्चे पढ़ाएंगे
माड़ापार निवासी जयराम यादव ने कहा कि मैं दूध बेचता था। तब हर गांव में लोगों के भैंस और गायें थीं। इसलिए कम बिक्री होती थी। मेरे दो बच्चे हैं। उनकी पढ़ाई और बेटी की शादी की चिंता थी। मुआवजा मिला तो मैंने अपने हिस्से का पैसा बैंक में जमा करा दिया। तभी तय कर लिया था कि इसी पैसे से बच्चों की पढ़ाई पूरी करुंगा।
पत्नी के इलाज में लग गया पैसा
जमीन खरीदी और मकान
जगदीशपुर निवासी आदित्य प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि मेरी काफी भूमि सड़क निर्माण की भेंट चढ़ गई। इसका हम लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ। फिर भी जो पैसा मिला। उससे नए सिरे से जमीन खरीदी। शहर में छोटा मकान लिया। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था।