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Gorakhpur News: कारीगरों की कमी से फीकी पड़ी बापू की खादी की चमक, 40 फीसदी कम हुआ उत्पादन

Tue, 21 Feb 2023 02:34 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी गोरखपुर।
संवाद न्यूज एजेंसी गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Tue, 21 Feb 2023 02:34 PM IST
सार

खादी को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1920 में जेपी कृपलानी ने क्षेत्रीय गांधी आश्रमों की स्थापना की थी। इसका एक और मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार महिलाओं और लोगों को रोजगार देना था। मगर, अब यह अपने लक्ष्य से भटक गया है।

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Bapu khadi faded due to lack of artisans
गोरखपुर गांधी आश्रम। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

कत्तिन और बुनकरों की कमी से बापू की खादी की चमक गोरखपुर में फीकी पड़ रही है। बाजार में खादी की डिमांड के बावजूद क्षेत्रीय श्रीगांधी आश्रम गोलघर में खादी के उत्पादन में 40 फीसदी कमी आई है। इससे खादी की बिक्री प्रभावित हो रही है।

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आलम यह है कि पांच वर्ष पहले तक जिस गांधी आश्रम से गोरखपुर और महाराजगंज के 2200 कत्तिन और बुनकर जुड़े थे, अब संख्या घटकर 900 से आसपास रह गई है। केवल पुराने कारीगर ही कत्तिन और बुनकर के रूप में काम कर रहे हैं। नए कारीगर कम पारिश्रमिक की वजह से इसे रोजगार के रूप में अपनाने से हिचकिचा रहे हैं।
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यही वजह है कि इन दिनों आयोजित होने वाली प्रदर्शनियों में भी खादी के स्टॉल पर हैंडलूम के उत्पाद ही नजर आ रहे हैं। कम दाम, ज्यादा वैराइटी और आकर्षक होने की वजह से लोग भी धड़ल्ले से इसकी खरीदारी कर रहे हैं। जबकि गांधी आश्रम के कपड़े हाथ से कते-बुने होते हैं, इसलिए महंगे पड़ते हैं। अगर जल्द ही इसमें कोई सुधार न हुआ तो गांधी आश्रम को बंद करने की नौबत आ जाएगी।
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1920 में हुई थी गांधी आश्रम की स्थापना

खादी को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1920 में जेपी कृपलानी ने क्षेत्रीय गांधी आश्रमों की स्थापना की थी। इसका एक और मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार महिलाओं और लोगों को रोजगार देना था। मगर, अब यह अपने लक्ष्य से भटक गया है। यही वजह है कि खादी की खपत तो बढ़ी है पर इसका लाभ उसके असली हकदारों को नहीं मिल रहा है।

एक घुंडी सूत के मिलते हैं 7.50 रुपये पारिश्रमिक
कारीगर को एक घुंडी सूत (एक हजार मीटर) सूत काटने के लिए 7.50 रुपये पारिश्रमिक मिलते हैं।

क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम के सचिव विशेश्वरनाथ तिवारी ने कहा कि कारीगरों की कमी से गांधी आश्रम में खादी का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। डिमांड के बावजूद खादी की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इसे दूर किया जाना आवश्यक है।

 

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