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गोरखपुर: अंजाम तक पहुंचने से एक कदम पहले लटक गया असुरन पोखरे का दो दशक पुराना विवाद, जानिए क्या है पूरा मामला
Thu, 19 Aug 2021 12:16 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
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Published by: vivek shukla
Updated Thu, 19 Aug 2021 12:16 PM IST
सार
पोखरे की कब्जा हुई जमीन के बराबर जमीन देने को तैयार थे, भेड़ियागढ़ कॉलोनी बसाने वाले जमींदार। पूर्व ज्वाइंट मजिस्ट्रेट गौरव सिंह सोगरवाल के तबादले के साथ ही फिर ठंडा पड़ गया मामला। जमीन सरकार के नाम हो जाती तो 200 परिवारों को दो दशक से चली आ रही समस्या से मिल जाता स्थायी छुटकारा।
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भेड़ियागढ कॉलोनी में पोखरे की जमीन पर कब्जा किया गया है।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
गोरखपुर जिले के असुरन पोखरे की कब्जा हुई जमीन का मामला एक बार फिर अंजाम तक पहुंचने से एक कदम पहले लटक गया। यह हाल तब है, जबकि प्रशासन की सख्ती के बाद पोखरे की जमीन पर भेड़ियागढ़ कॉलोनी बसाने वाले जमींदार, कब्जा हुई जमीन के बराबर जमीन सरकार के नाम रजिस्ट्री कराने को तैयार थे।
उनकी तरफ से सदर तहसील प्रशासन के सामने शहर एवं उसके आस-पास के इलाकों में स्थित छह जमीनों का प्रस्ताव भी दिया गया था। जमीन की पड़ताल और उसकी कीमत के आकलन के लिए टीम भी गठित हुई, मगर लगातार दो महीने तक गरमाया मामला, फरवरी 2021 में तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट व एसडीएम सदर गौरव सिंह सोगरवाल के यहां से तबादले के बाद से अचानक ठंडा पड़ गया।
पोखरे की जमीन पर कॉलोनी बसाने का मामला 2010 से रह-रहकर उठता आया है। यदि इस बार प्रशासन, जमींदार से पोखरे की कब्जा हुई जमीन के बदले सरकार के नाम जमीन रजिस्ट्री कराने में कामयाब हो गया होता तो भेड़ियागढ़ कॉलोनी में खून-पसीने की कमाई से मकान बनाकर रह रहे 200 से अधिक परिवारों की मुसीबत हमेशा के लिए खत्म हो जाती, मगर अंजाम तक पहुंचने के बाद एक बार फिर मामला अटक गया।
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इसका नुकसान यह हुआ कि कॉलोनी के इन परिवारों के सिर पर आशंका की तलवार लटकती रहेगी। भविष्य में कभी भी प्रशासन या शासन की तरफ से सख्ती हुई तो इनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बड़ी बात यह भी कि जमीन देने के मुद्दे पर उस समय जमींदार का रुख क्या होगा?
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उनकी तरफ से सदर तहसील प्रशासन के सामने शहर एवं उसके आस-पास के इलाकों में स्थित छह जमीनों का प्रस्ताव भी दिया गया था। जमीन की पड़ताल और उसकी कीमत के आकलन के लिए टीम भी गठित हुई, मगर लगातार दो महीने तक गरमाया मामला, फरवरी 2021 में तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट व एसडीएम सदर गौरव सिंह सोगरवाल के यहां से तबादले के बाद से अचानक ठंडा पड़ गया।
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पोखरे की जमीन पर कॉलोनी बसाने का मामला 2010 से रह-रहकर उठता आया है। यदि इस बार प्रशासन, जमींदार से पोखरे की कब्जा हुई जमीन के बदले सरकार के नाम जमीन रजिस्ट्री कराने में कामयाब हो गया होता तो भेड़ियागढ़ कॉलोनी में खून-पसीने की कमाई से मकान बनाकर रह रहे 200 से अधिक परिवारों की मुसीबत हमेशा के लिए खत्म हो जाती, मगर अंजाम तक पहुंचने के बाद एक बार फिर मामला अटक गया।
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इसका नुकसान यह हुआ कि कॉलोनी के इन परिवारों के सिर पर आशंका की तलवार लटकती रहेगी। भविष्य में कभी भी प्रशासन या शासन की तरफ से सख्ती हुई तो इनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बड़ी बात यह भी कि जमीन देने के मुद्दे पर उस समय जमींदार का रुख क्या होगा?
9.5 एकड़ में फैला है पोखरा, 150 लोगों को जारी हुआ था नोटिस
शहर के बीच में स्थित असुरन पोखरे का मूल क्षेत्रफल करीब साढ़े नौ एकड़ का रहा है। पर धीरे-धीरे इसका दायरा घटता गया और जमीन की खरीद-बिक्री होती रही। जमीन खरीदने के बाद कई लोगों ने निर्माण भी करा लिया है। 200 से अधिक आवासीय एवं वाणिज्यिक भवन बनाकर इसका अवैध कब्जा कर लिया गया है। ताल-पोखरों को खाली कराने के अभियान के क्रम में एसडीएम/ ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सदर गौरव सिंह सोगरवाल ने पिछले साल असुरन पोखरे का क्षेत्रफल जांचने के लिए कमेटी बनाई थी। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक करीब 9.5 एकड़ क्षेत्रफल वाला यह पोखरा आज 4.5 एकड़ में सिमट गया है। निर्माण करने वाले करीब 150 लोगों को नोटिस जारी कर उन्हें अपना पक्ष रखने के साथ मामले में कार्रवाई आगे बढ़ी।
13 मई 2010 को जमींदार ने किया था समझौता
असुरन पोखरे की जमीन पर कब्जे का मामला 2010 में भी गरमाया था। तत्कालीन कमिश्नर पीके महांति के सख्त होने पर पोखरे की करीब 3.5 एकड़ जमीन बेचने वाले ऋषभ जैन ने समझौते के आधार पर शपथ देकर कब्जा हो चुकी जमीन के बराबर और उतनी ही कीमत की जमीन प्रशासन को उपलब्ध कराने का वादा किया था। इसी बीच पीके महांति का तबादला हो गया और मामला दब गया। इसके करीब एक दशक बाद जब पूर्व ज्वाइंट मजिस्ट्रेट गौरव सिंह सोगरवाल ने पोखरे की जमीन पर कब्जा करने वालों को नोटिस भेजकर जमीन खाली करने को कहा तो उन्होंने उनसे मिलकर समझौते की जानकारी दी। कॉलोनी वालों के दबाव में ऋषभ जैन खुद आगे आए और समझौते के मुताबिक जमीन देने की बात कही। छह जगह का प्रस्ताव भी दिया, मगर अंतिम मुहर किसी पर नहीं लग पाई।
पोखरे की जमीन पर जीडीए ने पास किए हैं 45 मानचित्र
पोखरे की जिस जमीन पर हुए निर्माण को प्रशासन शुरू से अवैध ठहराता आया है, उनमें ज्यादातर ने रजिस्ट्री कराकर जमीन ली है। जीडीए ने एक दो नहीं 45 मानचित्र भी स्वीकृत किए हैं। नगर निगम ने सड़क बनवाई है। बिजली विभाग ने तय फीस लेकर कनेक्शन दिया है। वहां रहने वाले लोग जलकर, गृह कर जमा करते हैं। इस मामले में जीडीए पहले कोई मानचित्र स्वीकृत नहीं होने का दावा करता रहा, मगर पड़ताल के दौरान जीडीए के पूर्व उपाध्यक्ष राम सिंह की तरफ से वर्ष 2010 में पूर्व कमिश्नर पीके महांति को सौंपी गई एक रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ कि 45 मानचित्र स्वीकृत हुए हैं। ये सभी मानचित्र वर्ष 1991 और 2008 के बीच जारी किए गए। इन मानचित्रों से जुड़े आवेदन पर किस जेई, एई ने रिपोर्ट लगाई और कौन से तत्कालीन सचिव ने इसे स्वीकृति दी, यह सब स्पष्ट है। बावजूद इसके एक दशक से प्राधिकरण ने कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि वर्ष 2010 में ही असुरन पोखरे की जमीन को पाटकर वहां प्लाटिंग और मकान बनवा लेने का मामला प्रकाश में आ गया था।
पूर्व उपाध्यक्ष की रिपोर्ट में आराजी संख्या 27 पर संबंधित मानचित्र स्वीकृत होने की बात कही गई है। इसपर प्राधिकरण यह दलील देता आ रहा है कि फाइलों की जांच पड़ताल से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आराजी संख्या 27 के कौन सी संख्या पर निर्माण के लिए ये मानचित्र स्वीकृत किए गए। प्राधिकरण के मुताबिक, आराजी संख्या 27 का कुछ भाग तालाब में नहीं आता है। सिर्फ 27/1 ही तालाब की जमीन है।
13 मई 2010 को जमींदार ने किया था समझौता
असुरन पोखरे की जमीन पर कब्जे का मामला 2010 में भी गरमाया था। तत्कालीन कमिश्नर पीके महांति के सख्त होने पर पोखरे की करीब 3.5 एकड़ जमीन बेचने वाले ऋषभ जैन ने समझौते के आधार पर शपथ देकर कब्जा हो चुकी जमीन के बराबर और उतनी ही कीमत की जमीन प्रशासन को उपलब्ध कराने का वादा किया था। इसी बीच पीके महांति का तबादला हो गया और मामला दब गया। इसके करीब एक दशक बाद जब पूर्व ज्वाइंट मजिस्ट्रेट गौरव सिंह सोगरवाल ने पोखरे की जमीन पर कब्जा करने वालों को नोटिस भेजकर जमीन खाली करने को कहा तो उन्होंने उनसे मिलकर समझौते की जानकारी दी। कॉलोनी वालों के दबाव में ऋषभ जैन खुद आगे आए और समझौते के मुताबिक जमीन देने की बात कही। छह जगह का प्रस्ताव भी दिया, मगर अंतिम मुहर किसी पर नहीं लग पाई।
पोखरे की जमीन पर जीडीए ने पास किए हैं 45 मानचित्र
पोखरे की जिस जमीन पर हुए निर्माण को प्रशासन शुरू से अवैध ठहराता आया है, उनमें ज्यादातर ने रजिस्ट्री कराकर जमीन ली है। जीडीए ने एक दो नहीं 45 मानचित्र भी स्वीकृत किए हैं। नगर निगम ने सड़क बनवाई है। बिजली विभाग ने तय फीस लेकर कनेक्शन दिया है। वहां रहने वाले लोग जलकर, गृह कर जमा करते हैं। इस मामले में जीडीए पहले कोई मानचित्र स्वीकृत नहीं होने का दावा करता रहा, मगर पड़ताल के दौरान जीडीए के पूर्व उपाध्यक्ष राम सिंह की तरफ से वर्ष 2010 में पूर्व कमिश्नर पीके महांति को सौंपी गई एक रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ कि 45 मानचित्र स्वीकृत हुए हैं। ये सभी मानचित्र वर्ष 1991 और 2008 के बीच जारी किए गए। इन मानचित्रों से जुड़े आवेदन पर किस जेई, एई ने रिपोर्ट लगाई और कौन से तत्कालीन सचिव ने इसे स्वीकृति दी, यह सब स्पष्ट है। बावजूद इसके एक दशक से प्राधिकरण ने कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि वर्ष 2010 में ही असुरन पोखरे की जमीन को पाटकर वहां प्लाटिंग और मकान बनवा लेने का मामला प्रकाश में आ गया था।
पूर्व उपाध्यक्ष की रिपोर्ट में आराजी संख्या 27 पर संबंधित मानचित्र स्वीकृत होने की बात कही गई है। इसपर प्राधिकरण यह दलील देता आ रहा है कि फाइलों की जांच पड़ताल से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आराजी संख्या 27 के कौन सी संख्या पर निर्माण के लिए ये मानचित्र स्वीकृत किए गए। प्राधिकरण के मुताबिक, आराजी संख्या 27 का कुछ भाग तालाब में नहीं आता है। सिर्फ 27/1 ही तालाब की जमीन है।
20 फरवरी को आखिरी बार पूर्व कमिश्नर ने दिखाई सख्ती
मामले को अंजाम तक ले जाने की कोशिश कर रहे तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट गौरव सिंह सोगरवाल के तबादले के बाद इस मामले में आखिरी बार 20 फरवरी 2021 को पूर्व कमिश्नर जयंत नार्लिकर ने सख्ती दिखाई थी। उन्होंने शपथपत्र देने के एक दशक बाद भी मामले के लंबित होने पर नाराजगी जताई थी। निर्देश दिया था कि अब पोखरे की जमीन बेचने वाले ऋषभ जैन को अधिक मौका न दिया जाए। तय समय में यदि उतनी ही कीमत और क्षेत्रफल की जमीन न मिले तो पोखरे की जमीन से सभी अवैध निर्माण हटाए जाएं। साथ ही उसे फिर से पोखरे का स्वरूप दिया जाए।
जीडीए, निगम और राजस्व कर्मियों पर भी नहीं हुई कार्रवाई
इस मामले में पूर्व कमिश्नर जयंत नार्लिकर ने मानचित्र स्वीकृत करने वाले अफसरों की जवाबदेही तय करने के साथ ही उनके खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। साथ ही पोखरे की जमीन पर सड़क, नाली आदि का निर्माण कराने वाले नगर निगम को भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई का निर्देश दिया था। जमीन रजिस्ट्री होने के बाद खारिज-दाखिल करने वाले राजस्व कर्मियों पर भी कार्रवाई होनी थी, मगर वह भी नहीं हुई। इस मामले में कमिश्नर रवि कुमार एनजी का कहना है कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है। वह इसके बारे में जानकारी लेंगे।
जीडीए, निगम और राजस्व कर्मियों पर भी नहीं हुई कार्रवाई
इस मामले में पूर्व कमिश्नर जयंत नार्लिकर ने मानचित्र स्वीकृत करने वाले अफसरों की जवाबदेही तय करने के साथ ही उनके खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। साथ ही पोखरे की जमीन पर सड़क, नाली आदि का निर्माण कराने वाले नगर निगम को भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई का निर्देश दिया था। जमीन रजिस्ट्री होने के बाद खारिज-दाखिल करने वाले राजस्व कर्मियों पर भी कार्रवाई होनी थी, मगर वह भी नहीं हुई। इस मामले में कमिश्नर रवि कुमार एनजी का कहना है कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है। वह इसके बारे में जानकारी लेंगे।