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BCCC: बीसीसीसी की चैनलों को सलाह, कहा- एससी-एसटी समुदायों के चित्रण पर अत्यंत सतर्कता बरतें

Tue, 17 Oct 2023 08:32 PM IST
मोहम्मद फायक अंसारी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: मोहम्मद फायक अंसारी Updated Tue, 17 Oct 2023 08:32 PM IST
सार

यह समझा जा सकता है कि कई नैतिक आयाम वाली कहानियों में अच्छे और बुरे के चित्रण की आवश्यकता होती है। हालांकि, ऐसा करते समय, चैनल को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह ऐसी भाषा का उपयोग न करें जो गैरकानूनी हो।

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BCCC advisory to entertainment channels Exercise extreme caution on portrayal of SCs STs
प्रतीकात्मक फोटो - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल (बीसीसीसी) ने मंगलवार को मनोरंजन चैनलों से टेलीविजन कार्यक्रमों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का चित्रण करते समय दोनों समुदायों के सदस्यों की भावनाओं को आहत करने से बचने के लिए अत्यधिक सावधानी बरतने को कहा।

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परिषद ने कंटेंट को लेकर कही यह बात

परिषद की ओर जारी की गई एडवाइजरी में कहा गया है कि चैनलों को अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के सदस्यों की कहानियों का चित्रण करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कहानियों की बारीकियों और मानवीयता को संवेदनशीलता से संप्रेषित किया जाए और प्रदर्शित हिंसा समुदायों या पीड़ितों को पुन: आघात न पहुंचाए। गैर-समाचार मनोरंजन चैनलों के स्व-नियामक निकाय ने कहा कि ऐसी कहानियों जो पूरी तरह से अस्पृश्यता और जातिवाद जैसी सामाजिक बुराइयों पर आधारित हैं को चित्रित करते समय मनोरंजन चैनलों अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए।  

गैरकानूनी भाषा का न करें उपयोग

इसमें आगे कहा गया है कि यह समझा जा सकता है कि कई नैतिक आयाम वाली कहानियों में अच्छे और बुरे के चित्रण की आवश्यकता होती है। हालांकि, ऐसा करते समय, चैनल को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह ऐसी भाषा का उपयोग न करें जो गैरकानूनी हो और जो किसी विशेष समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती हो।

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दृश्यों को लेकर बरते सावधानी

परिषद ने कहा कि बीसीसीसी चैनलों से इन समुदायों से संबंधित दृश्यों को चित्रित करते समय "सतर्क और संतुलित" रहने के लिए कहता है, क्योंकि संदर्भ से हटकर एक अलग एपिसोड का दृश्य भी इन समुदायों के बीच अशांति पैदा कर सकता है। बीसीसीसी ने कहा कि भारतीय समाज में एससी और एसटी के खिलाफ अपराध बड़े पैमाने पर हैं। इनमें शारीरिक से लेकर मौखिक और यौन उत्पीड़न तक शामिल हैं। परिषद ने आगे कहा, "इस प्रकार का कंटेंट को लेकर रचनाकारों को जो बात ध्यान में रखनी चाहिए वह यह है कि जिस तरह की कहानियां टेलीविजन पर कल्पना या तथ्य के रूप में दिखाई जाती हैं, वे सामाजिक सोच को आकार देती हैं। वे सामाजिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार के लिए आदर्श स्थापित करके ऐसा करते हैं।  साथ ही यह किसी को अपनी वास्तविकता से बचने का रास्ता भी प्रदान करते हैं। 

अपमान और उपहास के शब्दों को स्क्रिप्ट से बाहर रखा जाए

2011 की जनगणना के अनुसार, भारतीय आबादी का कुल 16.6 प्रतिशत और 8.6 प्रतिशत क्रमशः एससी और एसटी समुदायों से संबंधित है। बीसीसीसी अध्यक्ष न्यायमूर्ति गीता मित्तल द्वारा अनुमोदित सलाह में कहा गया है, "यह कोई छोटी संख्या नहीं है। इसलिए, यह सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि एससी और एसटी समूहों के प्रति अपमान और उपहास के शब्दों को स्क्रिप्ट से बाहर रखा जाए।" इनमें अपमान के रूप में इस्तेमाल किए गए जातियों के नामों को दर्शाने वाले शब्द या एक निश्चित जाति समूह की सदस्यता के कारण किसी व्यक्ति को अपमानित करने के इरादे से इस्तेमाल किए गए शब्द शामिल हैं।
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