शायरी की दुनिया के धुरंधर, जिन्होंने फिल्मों में भी गाड़े झंडे
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निदा फाजली
उर्दू के अजीम शायर निदा फाजदी रविवार को दुनिया से विदा हो गए। वे उर्दू शायरी के रास्ते बॉलीवुड में दाखिल हुए और मशहूर हो गए। यूं तो पहले ही उर्दू के स्थापित शायर थे। 'आंख और ख्वाब के दरमियां', 'लफ्जों का पुल', 'शहर मेरे साथ चल तू', 'दीवारों के बाहर' जैसी उनकी मशहूर रचानाएं हैं।
लेकिन 'होश वालों को खबर क्या', 'तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है', 'हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी', 'किसी को कभी मुकम्मल जहां नहीं मिलता', 'अजनबी कौन हो तुम' जैसे गाने लिखकर वे बॉलीवुड के स्थापित शीर्ष गीतकारों में शामिल हो गए।
कैफी आजमी
'आवारा सजदे', 'इंकार', 'आखिरे-शब' जैसी उर्दू रचनाएं करने वाले शायर कैफी आजमी शेरो-शायरी की दुनिया में अपनी शोहरत थी। लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न पत्नी शौकत के साथ जब वो मुंबई आए तो यहां भी छा गए।
वह कैफी आजमी ही थे, जिन्होंने 'हीर-रांझा' पूरी फिल्म को शायरी बना दिया। फिल्म का हर संवाद शायरी के अंदाज में बोला जाता है। 'कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों', 'मिलो न तुम तो हम घबराए', 'ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं' जैसे ही कितने गाने हैं, जिनके लफ्ज आज भी हमारे दिलों में बसे हुए हैं।
मजरूह सुल्तानपुरी
मजरूह सुल्तानपुरी प्रगतिशील आंदोलन के उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक थे। उन्होंने 'गुलकरी ए वहशत का शैर', 'मुकाम और कलाम', 'गजल' जैसी अव्वल उर्दू रचनाएं की हैं।
इसी के साथ बॉलीवुड की सुपरहिट फिल्में 'सीआईडी', 'चलती का नाम गाड़ी', 'नौ-दो ग्यारह', 'तीसरी मंजिल', 'पेइंग गेस्ट', 'काला पानी', 'तुम सा नहीं देखा', 'दिल देके देखो', 'दिल्ली का ठग' आदि फिल्मों के गाने भी मजरूह ने लिखे।
इनमें 'तेरे मेरे मिलन की ये रैना', 'जाइए आप कहां जाएंगे', 'रहे न रहे हम', 'ठाढ़े रहियो', 'एक लड़की भीगी भागी सी', 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' आदि प्रमुख हैं।
इन आंखों की मस्ती के....
शकील बदायूनी
'शाम-ओ-हरम', 'रंगीनियां', 'शकील बदायूनी की शायरी', 'शकील बदायूनी की रूमानी शायरी' जैसी उतकृष्ट रचनाओं से शकील बदायूनी उर्दू शायरी की दुनिया में जाना-पहचाना नाम हो गया था। लेकिन जब वो फिल्मों में आए तो उन्होंने नए तरह के तराने लिखे।
शकील के गाने, 'चौदवीं का चांद हो', 'सुहानी रात ढल चुकी', 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज', 'दो सितारों का जमी पर है मिलन', 'कहीं दीप जले कहीं दिल', 'मधुबन में राधिका नाचे', 'प्यार किया तो डरना क्या', 'रहा गरदिशों में हरदम मेरे इश्क का सितारा', 'तेरे हुस्न की क्या तारीफ करू' जैसे ही कई मशहूर गाने दिए।
शहरयार
शेर-ओ-हिकमत, इज्म-ए-अजम, ख्वाब का दर बंद है, फिरक-ओ-नजर जैसी उच्च श्रेणी की उर्दू रचनाएं करने वाले अखलाक मुहम्मद खान उर्फ सहरयार का नाम उर्दू की दुनिया सम्मान लेती है। उन्होंने शेरो-शायरी ही नहीं, उर्दू साहित्य की भी सेवा की है।
पर जब वे फिल्मी दुनिया में उतरे तो उनके गानों ने लोगों को दीवाना बना दिया, खासकर के फिल्म उमराव जान के इन गानों 'दिल चीज क्या है', 'इन आंखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' ने।
हसरत जयपुरी
एक मुशायरे में उर्दू की शायरी पढ़ रहे एक नौजवान पर अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की नजर पड़ी। मुशायरों की दुनिया में वह तेजी से आगे बढ़ रहे थे। पृथ्वीराज कपूर ने तुरंत अपने बेटे राज कपूर को हसरत का नाम सुझाया, जो कि उन दिनों कई फिल्मों के निर्माण में पूरे जोर-शोर से लगे हुए थे। तब हसरत मुंबई में एक बस कंडक्टर की नौकरी कर रहे थे।
लेकिन जैसे ही हसरत ने बॉलीवुड का रुख किया 'जिया बेकरार है', 'जिंदगी एक सफर है सुहाना', 'एहसान तेरा होगा मुझपर', 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में सामाई', 'सुन साइबा सुन', 'तुम मुझे यूं भुला न पाओगे' जैसे गाने लिखे।
मैं पल दो पल का शायर हूं....
साहिर लुधियानवी
पंजाब ये प्रसिद्ध शायर मशहूर उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ, शाहकार और शाहराह, प्रीतलड़ी जैसी उर्दू पत्रिकाओं के संपादक रह चुके हैं। उनकी रचानाओं का संग्रह 'तल्खियां' भी उनकी पहचान हैं। लेकिन जब उन्होंने बॉलीवुड का रुख किया तो यहां भी झंडे गाड़ दिए।
साहिर ने "मैं पल दो पल का शायर हूं", "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं", "ईश्वर अल्लाह तेरे नाम", "यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है" जैसे गाने लिखे। लेखिका अमृता प्रीतम के साथ उनका नाम जुड़ना भी खूब चर्चाओं में रहा। हालांकि वे आजीवन अविवाहित रहे।
जांनिसार अख्तर
प्रगतिशील लेखक आंदोलन के अहम आंदोलनकारी व उर्दू शायर जांनिसार अख्तर ने शायरी की वो बीज बोई है, जिसकी महक आज भी हम लोगों के बीच मौजूद है। कभी जावेद अख्तर की कलम से तो कभी-कभी फरहान अख्तर की आवाज में। 'खाक-ए दिल' जैसी रचना करने वाले जांनिसार बॉलीवुड को भी कुछ बेहद खूबसूरत गानों से उन्नत बनाया।
उनके लिखे गाने, 'आंखों ही आंखों में इशारा हो गया', 'आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा', 'ऐ दिले नादां', 'सैयां के गांव में तारों के छांव में', 'चोरी-चोरी कोई आए' हिन्दी पट्टी में खूब मशहूर हुए। उनके गानों में हिन्दी-उर्दू का गंजब का संयोजन था। जिसे उनके बेटे बेटे जावेद ने आगे बढ़ाया।
जावेद अख्तर
वालिद के फिल्मों में आने के चलते जावेद अख्तर की परवरिश ही फिल्मी माहौल में हुई। बावजूद इसके उनकी उर्दू शायरी काबिले गौर है। उन्होंने ग्लैमर में रहते हुए उर्दू शायरी में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी उर्दू शायरियों के कई संकलन प्रकाशित भी हुए हैं।
उन्होंने सलमी खान के साथ मिलकर कई फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं। इनमें शोले सबसे मशहूर है। 'देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए', 'जादू भरी आंखों वाली सनम तुम मुझको ऐसे देखा न करो', 'रुत आ गई रे', 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा', 'संदेशे आते हैं', 'ये जो देश है तेरा, स्वदेश है तेरा', 'सागर किनारे दिल ये पुकारे' जैसे कितने ही गाने लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। वह अब भी सक्रिय लेखन कर रहे हैं।