{"_id":"be14bda829784af8812007742a6e0799","slug":"what-is-the-yellow-revolution","type":"story","status":"publish","title_hn":"हरित, श्वेत के बाद आई पीली क्रांति, क्या है ये?","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हरित, श्वेत के बाद आई पीली क्रांति, क्या है ये?
अमित कुमार/अमर उजाला,गुड़गांव
Updated Thu, 16 Jan 2014 05:20 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हरियाणा को अभी तक हरित और श्वेत क्रांति के लिए जाना जाता था, लेकिन अब पीली क्रांति भी इसकी पहचान बन रही है। प्रदेश को पीली क्रांति में सिरमौर बनाने में दक्षिणी क्षेत्र का विशेष योगदान है। सरसों उत्पादन को पीली क्रांति की संज्ञा दी जाती है।
प्रदेश में सरसों के कुल उत्पादन का 70 फीसदी गुड़गांव, फरीदाबाद, मेवात, रेवाड़ी, झज्जर और भिवानी जिले से प्राप्त होता है। साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन (एसएआई) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति वर्ष करीब 60 लाख टन सरसों का उत्पादन होता है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से सरसों की बिजाई में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान आगे हैं, लेकिन उत्पादन में हरियाणा का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां 2011-12 के दौरान 511 हजार हेक्टेयर में 847 हजार टन सरसों की पैदावार हुई।
विज्ञापन
इसे भी पढ़ें: ये अनोखा साइंस सेंटर बस उनके लिए...
राजस्थान और मध्य प्रदेश में जहां पिछले तीन सालों में सरसों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं हरियाणा में पैदावार लगातार बढ़ी है। सरसों उत्पादन में हरियाणा के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए सरसों अनुसंधान एवं संवर्धन परिषद् (एमपीआरसी) ने राज्य में विशेष केंद्र खोलने की योजना बनाई है।
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि इन केंद्रों के माध्यम से किसानों को सरसों की उपयोगिता के बारे में जागरूक किया जाएगा। एमपीआरसी का दावा है कि सरसों की महज 10 फीसदी पैदावार बढ़ाकर विदेशों से आयात तेलों पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा में 40 फीसदी की बचत की जा सकती है। ऐसे में हरियाणा पीली क्रांति को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा सकता है।
कैसे आगे है हरियाणा?
किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग मध्य प्रदेश के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010-11 में मध्य प्रदेश में 7,26,000 हेक्टेयर भूमि पर सरसों की बिजाई की गई। इससे 1,128 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सरसों का उत्पादन हुआ। प्रदेश में 2011-12 के दौरान 5,11,000 हेक्टेयर भूमि पर सरसों की बिजाई की, जिससे 1,657 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सरसों का उत्पादन हुआ।
इसे भी पढ़ें: दिल्ली-गुड़गांव में नौकरी करते हैं, तो पढ़ें ये खबर
2012-13 की रिपोर्ट में जहां मध्य प्रदेश में सरसों का रकबा घटकर 7,84,000 हेक्टेयर रह गया है, वहीं अव्वल तीन राज्यों में शुमार राजस्थान में क्षेत्रफल 28.03 लाख हेक्टेयर से घटकर 23.25 लाख हेक्टेयर पहुंचने की संभावना है। ऐसे में हरियाणा को भविष्य में पीली क्रांति के सिरमौर के तौर पर देखा जा रहा है।
विज्ञापन
प्रदेश में सरसों के कुल उत्पादन का 70 फीसदी गुड़गांव, फरीदाबाद, मेवात, रेवाड़ी, झज्जर और भिवानी जिले से प्राप्त होता है। साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन (एसएआई) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति वर्ष करीब 60 लाख टन सरसों का उत्पादन होता है।
विज्ञापन
क्षेत्रफल की दृष्टि से सरसों की बिजाई में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान आगे हैं, लेकिन उत्पादन में हरियाणा का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां 2011-12 के दौरान 511 हजार हेक्टेयर में 847 हजार टन सरसों की पैदावार हुई।
विज्ञापन
इसे भी पढ़ें: ये अनोखा साइंस सेंटर बस उनके लिए...
राजस्थान और मध्य प्रदेश में जहां पिछले तीन सालों में सरसों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं हरियाणा में पैदावार लगातार बढ़ी है। सरसों उत्पादन में हरियाणा के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए सरसों अनुसंधान एवं संवर्धन परिषद् (एमपीआरसी) ने राज्य में विशेष केंद्र खोलने की योजना बनाई है।
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि इन केंद्रों के माध्यम से किसानों को सरसों की उपयोगिता के बारे में जागरूक किया जाएगा। एमपीआरसी का दावा है कि सरसों की महज 10 फीसदी पैदावार बढ़ाकर विदेशों से आयात तेलों पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा में 40 फीसदी की बचत की जा सकती है। ऐसे में हरियाणा पीली क्रांति को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा सकता है।
कैसे आगे है हरियाणा?
किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग मध्य प्रदेश के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010-11 में मध्य प्रदेश में 7,26,000 हेक्टेयर भूमि पर सरसों की बिजाई की गई। इससे 1,128 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सरसों का उत्पादन हुआ। प्रदेश में 2011-12 के दौरान 5,11,000 हेक्टेयर भूमि पर सरसों की बिजाई की, जिससे 1,657 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सरसों का उत्पादन हुआ।
इसे भी पढ़ें: दिल्ली-गुड़गांव में नौकरी करते हैं, तो पढ़ें ये खबर
2012-13 की रिपोर्ट में जहां मध्य प्रदेश में सरसों का रकबा घटकर 7,84,000 हेक्टेयर रह गया है, वहीं अव्वल तीन राज्यों में शुमार राजस्थान में क्षेत्रफल 28.03 लाख हेक्टेयर से घटकर 23.25 लाख हेक्टेयर पहुंचने की संभावना है। ऐसे में हरियाणा को भविष्य में पीली क्रांति के सिरमौर के तौर पर देखा जा रहा है।