'किसानों ने कहा कि जो उनकी सुनेगा, उसी को चुनेंगे'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मुंह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन। आवाजों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन॥ ‘ मशहूर कवि निदा फाजली की इन पंक्तियों जैसा माहौल गौतमबुद्ध नगर लोक सभा सीट पर किसानों का भी है।
सांसद बनने की दौड़ में खड़े प्रत्याशियों पर आरोप है कि उनको गांव-किसान से सरोकार न होने का आरोप भी है। अमर उजाला संवाद में किसानों की ओर से यही अवाज उठी कि जमीन अधिग्रहण, मुआवजा, रोजगार, स्कूल-कॉलेज-नौकरियों में आरक्षण या फिर सरकारी विभागों में फैला भ्रष्टाचार जैसे स्थानीय मुद्दे चुनावी लड़ाई में खो गए हैं।
किसानों का कहना है कि उम्मीदवारों ने उनके मुद्दे को नहीं उठाया है न ही उनके अंदोलनों में अपनी भूमिका निभाई है।
स्थानीय किसानों द्वारा उठाए गए दस बड़े स्थानीय मुद्दे
1-जमीन अधिग्रहण की पॉलिसी किसान हित में बनाई जाए।
2-जमीन के बदले मिलने वाले मुआवजे की शक्ल में बदलाव हो।
3-अथोरिटी से जारी होने वाले ठेकों में किसानों को आरक्षण मिले।
4-बिल्डर प्रोजेक्ट या डवलेप लैंड में हिस्सेदारी या रॉयल्टी दी जाए।
5-अथोरिटी और तहसील जैसे विभागों में फैला भ्रष्टाचार खत्म हो।
6-तीनों प्राधिकरणों को संचालित करने वालों में स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हों।
7-जमीन पर बनने वाली कंपनी या संस्थान में नौकरी का प्रावधान।
8-आबादी के मुताबिक पांच इंटर कॉलेज व पांच डिग्री कॉलेज बनें।
9-जमीन लेकर उद्योग लगाना प्राथमिकता पर हो ताकि रोजगार बढ़े।
10-स्कूलों में किसानों के बच्चों को दाखिला जरूरी किया जाए।
संवाद में उठे प्रमुख मुद्दे
राजनीति तक नहीं पहुंचा किसान संघर्ष
हर गांव में किसान संघर्ष समितियां सक्रिय हैं लेकिन इनकी मौजूदगी इतनी ताकतवर नहीं बन पाई कि राजनैतिक बदलाव कर सके। मुद्दे उठाए तो गए लेकिन प्रभावी नहीं हो पाए। वजह साफ है, किसानों के मुद्दे और राजनीति में चलने वाले ध्रवीकरण के बीच आवाजें दबती जा रही हैं। पिछले सालों में हुए किसानों के आंदोलन में तमाम पार्टियों के नेता आए जरूरी, लेकिन सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए। किसान और आम लोगों के लिए संघर्ष करने वाले स्थानीय बाशिंदे को एक पार्टी टिकट देकर अपनी स्थिति मजबूत कर सकती थी लेकिन जो भूमिका इस पार्टी की हो सकती थी वो अब खत्म हो गई।
आपराधिक हुई जीबी नगर की राजनीति
संवाद के दौरान किसानों से माना कि गौतमबुद्ध नगर की राजनीति में आपराधिक ग्राफ बढ़ गया है। नेता लोग गैंग के साथ जुड़ हुए हैं। यही कारण है कि क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। जब भी क्षेत्र में गैंगवार होती है तो लोग मारे जाते हैं। उसका प्रभाव देश स्तर पर जाता है। कोई भी निवेशक जब कोई निवेश करता है तो पहले सुरक्षा व्यवस्था ही देखता है। पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि यहां से उद्योद बंद हो रहे हैं और अपराधिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। जो देशी विदेशी कंपनियां स्थापित हैं, वहां भी आए दिन चोरियां जैसी घटनाएं हो रही हैं। उसमें पुलिस की भी मिलीभगत होती है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। फरीदाबाद में सुरक्षा व्यवस्था अच्छी होने के चलते ही वहां पर औद्योगिक जमीन की दर काफी ऊंची है। जबकि गौतमबुद्धनगर में उद्योग बंद हो रहे हैं।
भविष्य में कैसे होगा गुजारा
प्राधिकरण ने किसानों की जमीन ले ली है। जहां पर उद्योग लगने चाहिए, वहां पर मल्टीस्टोरी फ्लैट बन रहे हैं। वह इतने ऊंचे हैं कि भविष्य में गांवों के चारो तरफ फ्लैट ही फ्लैट होंगे। हवा पानी मिलना मुश्किल होगा। जो मुआवजा मिला है, वह धीरे-धीरे खतम हो रहा है। हालत इतनी खराब है कि स्थानीय किसान के बेटे को कोई नौकरी नहीं देता है। जब किसान के पास जमीन नहीं होगी, रोजगार नहीं होगा तो क्या होगा। किसान अपने परिवार के भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं। सरकार को इसके लिए कोई ठोस नीति बनानी चाहिए।
शहरीकारण तोड़ रहा है जातिवाद
लोक सभा चुनावों में जातिवाद खत्म होते दिख नहीं रहा। किसानों का कहना है कि एक खास जाति का होने के बाद वे अगर किसी दूसरी पार्टी को चुनने की कोशिश भी करें तो वहां कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो बेहतर हो या पसंद करने लायक हो। ऐसे में घूम फिर कर अपनी जाति के समर्थन की विचारधारा पर लौटना मजूबरी सी बन गई है। यह भेदभाव इतना गहरा हो गया है कि हर किसी में जातिवाद का असर दिखता है। यहां तक कि जब किसी सरकारी काम से किसी दफ्तर में जाया जाता है जो सबसे पहले जाति पूछी जाती है। ऐसे में मजबूरी हो जाती है कि जाति का ही पक्ष लेना पड़ता है। भविष्य में जब शहरीकरण बढ़ेगा तो जातिवाद खुद ही समाप्त हो जाएगा। इसमें दिल्ली विधान सभा के चुनावों को देखा जा सकता है।
इतने कॉलेजों से नहीं चलेगा काम
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में चार से लेकर पांच डिग्री कॉलेज खुलने चाहिए। प्राधिकरण के पास पैसा भी है। अगर प्राधिकरण 1200 करोड़ रुपये खर्च करके गौतमबुद्ध यूनिवर्सिटी बना सकता है तो कॉलेज बनाने में क्यों पहल नहीं की जा रही है। जितनी ज्यादा शिक्षा होगी, उतना ही लाभ किसानों और अन्य लोगों को होगा। अच्छा तो यह भी रहे कि तकनीकि प्रशिक्षण की भी व्यवस्था कराई जाए। प्राधिकरण को सबसे पहले किसान हित के फैसले लेने चाहिए और जो भी किसानों के काम हैं उनमें देरी नहीं करनी चाहिए। इसी तरह अस्पतालों की भी जरूरत है। ल़ड़कियों की शिक्षा भी जरूरी है।
मुजफ्फरनगर दंगों का नहीं है असर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई जिलों में जहां मुजफ्फरनगर दंगों का असर चुनावों पर पूरी तरह हावी है वहीं गौतमबुद्ध सीट पर ये मुद्दा ज्यादा गंभीर नहीं है। जेवर के कुछ गांवों को छोड़कर बाकी जगह एक समुदाय के लोगों की संख्या नहीं है, जिसके चलते इस मुद्दे का असर वोट और जातिवाद की समीकरण को प्रभावित नहीं करेगा। चूंकि किसान यह भी मानते हैं कि दंगा के पीछे कोई न कोई राजनीति जरूर है। चुनावों के वक्त यहां पर यही देखा जाता है कि कौन सा ऐसा प्रत्याशी है,जो बेहतर साबित हो सकता है। जब भी कहीं दंगे या फसाद हुए हैं, क्षेत्र में अमन चैन की स्थिति रही है।
यही है स्थानीय और बाहरी का फर्क
संवाद के दौरान गौतमबुद्ध नगर सीट से पार्टी छोड़कर भागने वाले प्रत्याशी का जिक्र हुआ तो माहौल गर्मा गया। किसानों ने एक सुर में कहा कि भले कुछ भी हो लेकिन किसी इंसान को इतना नहीं गिरना चाहिए। अंतिम मौके पर ऐसा करने वाले लोगों के लिए जेल का प्रावधान होना चाहिए। इस घटना से स्थानीय और बाहरी प्रत्याशी होने का फर्क भी देखने को मिला। स्थानीय नेता अपने लोगों के बीच ऐसा कभी नहीं कर पाता। इस बात के दौरान इस घटना को किसानों के एक समुदाय की बेज्जती करार देते हुए कहा कि अब नतीजे भारी उलटफेर और चौकाने वाले होंगे।
संवाद में शामिल किसानों की प्रतिक्रिया
किसान संघर्ष समिति के अजब सिंह प्रधान ने कहा, अपने मुद्दे, अपने व्यक्तित्व या अपनी राजनीति के दम पर कोई वोट नहीं मांग पा रहा है। किसान अंदोलन में सभी पार्टियों को सहयोग करना चाहिए लेकिन सभी का मकसद सिर्फ अपनी हाजरी लगाने तक रहा है। किसान अंदोलन में सत्तारुढ़ सांसद ने लखनऊ से अनुमति न मिलने के चलते साथ नहीं दिया तो विपक्ष मजूबरी और खाली हाथ होने के चलते सरेंडर किए खड़ा रहा।
किसान नेता अमोद भाटी ने कहा कि स्थानीय प्रत्याशियों को मुद्दे का तो छोड़िए अपनी सीट के गांवों तक की जानकारी नहीं है। चुनाव लड़ रहा कोई प्रत्याशी आंदोलन या संघर्ष में साथ नहीं रहा। जमीन से जुड़े लोगों को टिकट नहीं दिया जाता। भूमि अधिग्रहण के नाम पर सिर्फ सोसायटी बनी हैं। जमीन ले ली जाएं लेकिन उद्योगों को लाना, चलाना प्राथमिकता पर होना चाहिए ताकि रोजगार बढ़ सकें।
किसान संघर्ष समिति के नरेंद्र यादव ने कहा कि भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है। जमीन ट्रांसफर कराने के केस में 100 रुपये मीटर के हिसाब से रिश्वत ली जा रही है। किसानों के मुआवजे की रकम दो से ढ़ाई फीसदी कमीशन मांगा जाता है। अधिकार ठेकेदारों से 45 फीसदी कमीशन लेते हैं। इस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए अथोरिटी संचालित करने वाले अधिकारियों के साथ स्थानीय लोगों की भी भागेदारी होनी चाहिए।
किसान नेता डॉ. रुपेश वर्मा ने कहा, चुनावों में मुद्दों से ज्यादा ध्रुवीकरण चलता है। आज की राजनीति मुद्दों से ज्यादा सिर्फ बयानों तक सिमट गई है। घोषणा पत्र को लेकर पार्टियां गंभीर नहीं हैं। स्थानीय मुद्दे नदारद हैं। गुड़गांव-फरीदाबाद में मेट्रो विस्तार का काम लगातार चल रहा है जबकि नोएडा में आगे की कोई पहल नहीं है। इंडस्ट्री हालत अच्छी नहीं है। सुरक्षा का बड़ा मुद्दा है। किसानों से जमीन ली गई लेकिन उद्योग प्राथमिकता पर नहीं रहे।
किसान संघर्ष समिति के बलराज यादव ने कहा कि किसानों के साथ विपक्ष के लोग सिर्फ दिखाने और अपने स्वार्थ के लिए रहते हैं, मदद के लिए नहीं। विभागों का हाल और बुरा है। गौतमबुद्ध नगर में पोस्टिंग के साथ ही अधिकारी मूड बनाकर आते हैं कि यहां आंकर माल बनाएंगे। अधिकारी अपने मुंह से कहते हैं कि पैसा देकर पोस्टिंग ली है अब पैसा कमाएंगे। मॉनिटरिंग हो और जवाबदेही तय हो।
किसान नेता हरेंद्र भाटी ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। एक दो गांव को छोड़कर बाकी जगह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति खराब है। बड़े अस्पतालों में इलाज महंगा है। स्थानीय किसानों को मिलने वाली सुविधाएं और छूट को लागू करवाने में कोई आगे नहीं आता।
किसान संघर्ष समिति के अजय प्रधान कहते हैं, स्थानीय प्रत्याशियों को खेती-किसानी की जरा भी समझ नहीं है। चुनाव लड़ने वाले किसी प्रत्याशी ने साथ नहीं दिया तो अब कैसा वोट। मुआवजा मिला लेकिन दस साल बाद कोई गुजारा नहीं है। किसानों के विकास, रोजगार, हिस्सेदारी जैसी व्यवस्थाओं पर किसी का ध्यान नहीं है। हर पार्टी हर नेता का एक जैसा हाल है। पैराशूट प्रत्याशी तो वैसे भी किसी काम के नहीं है।
किसान नेता लीले प्रधान ने कहा कि प्रत्याशियों के पास मुद्दे नहीं हैं। नेता अपनी पहचान बनाने और धनबल से चुनाव लड़ रहे हैं। जनसेवा और सुविधाओं से सरोकार नहीं है। जनप्रतिनिधियों ने किसानों की अवाज नहीं उठाई है। तीनों प्राधिकरण अलग-अलग हैं। नोएडा में रहने वाली की जमीन ग्रेटर नोएडा में है तो उसे गैर पुश्तैनी मान लिया जाता है। एजुकेशन हब वाला शहर एमएनसी की तरह चल रहा है।
किसान नेता अशोक यादव ने कहा कि पिछली सरकार में हमारा नाम सुनकर अधिकारी फाइलें फेंक दिया करते थे। अब सरकार बदली है तब जाकर हम लोगों का काम हो रहा है। सरकार ऐसा भेदभाव करती है तभी जाति याद आती है और चुनावों में इसका असर भी देखने को मिलता है। जब सब अपनी जाति की बात करते हैं तो किसान की तो कोई जाति नहीं होती है। इसमें किसान नुकसान उठाता है।