चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध की अधिसूचना जारी, अब केवल सूती मांझे से उड़ेंगी पतंगें
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राजधानी में चाइनीज मांझे के साथ नायलोन, प्लास्टिक तथा पतंग उड़ाने वाले वो सभी धागे जो धारधार हों, शीशे, धातु या अन्य धारदार सामग्री से बनाए गए हों उन पर प्रतिबंध लगेगा।
सिर्फ सूती धागे या प्राकृतिक रेशे जो किसी धातु या शीशे के घटकों से रहित हो, उसी से पतंग उड़ाने की अनुमति होगी। दिल्ली सरकार की ड्राफ्ट अधिसूचना में साफ किया गया है कि प्रतिबंध सिर्फ उत्पादन, भंडारण और बिक्री पर ही नहीं होगा बल्कि उसका इस्तेमाल भी प्रतिबंधित होगा।
मसलन ऐसे मांझे को खरीदकर पतंग उड़ाने वाला भी कानून के दायरे में होगा। अभी तक ज्यादातर ऐसे कानून में उत्पादन, भंडारण या बिक्रे ता को ही दायरे में रखा जाता था, जिसमें प्लास्टिक बैग व गुटखा प्रतिबंध के कानून शामिल हैं।
बिक्री के साथ इस्तेमाल पर होगा प्रतिबंध
दिल्ली सरकार ने उपराज्यपाल से स्वीकृति मिलने के बाद पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 में मंगलवार को ड्राफ्ट अधिसूचना जारी कर 60 दिनों में प्रभावित वर्ग से आपत्तियां मंगाई हैं, जो आपत्तियां व सुझाव आएंगे, उस पर विचार के बाद अंतिम अधिसूचना जारी की जाएगी।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 5 में जारी निर्देश लागू होंगे। उन निर्देशों का उल्लंघन करने वाले पर अधिनियम की धारा-15 में कार्रवाई होगी।
इसमें उल्लंघनकर्ता को पांच साल तक की जेल या एक लाख रुपये तक जुर्माना या एक साथ दोनों सजा भुगतनी पड़ सकती है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले हफ्ते चाइनीज मांझे व तेज मांझे को लेकर जागरूकता का दिशा निर्देश जारी करने और प्रतिबंध की अधिसूचना जल्द से जल्द जारी करने का निर्देश दिया था।
जानिए क्या है अधिसूचना में प्रतिबंध का तर्क
पतंग उड़ाने में प्लास्टिक, सिंथेटिक सामग्री से बने पक्के मांझे, जिसमें चाइनीज मांझा शामिल है, से पतंग उड़ाने के दौरान लोगों और पक्षियों की जान को खतरा है। प्रतियोगिता में कई पतंगें कटती हैं जो जमीन पर गिरती हैं।
इससे प्लास्टिक मांझा नष्ट नहीं होता, सीवर-नाली, नहरों को अवरुध करता है। प्लास्टिक सामग्री के साथ उसे खाने वाली गाय व अन्य जानवर के दम घुटने की समस्या होती है।
चीनी धागा बनाने में इस्तेमाल प्लास्टिक सामग्री के कई दुष्प्रभाव हैं। इन धागों से बिजली आपूर्ति प्रभावित होने के साथ विद्युतीय संपत्ति को नुकसान पहुंचता है। सुबह 6-8 बजे और शाम को 5-7 बजे तक पक्षी गतिविधि अधिक होती है। गिद्धों को विलुप्त व दुर्लभ श्रेणी में रखा गया है, इन्हें बचाने की जरूरत है।