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Delhi NCR News: युवा मरीजों में समय से पहले हृदय रोग में प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म का छिपा खतरा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 04 Apr 2026 09:25 PM IST
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-शोध के अनुसार, कम उम्र में कोरोनरी धमनी रोग से जूझ रहे मरीजों में प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म (पीए) का खतरा भी छिपा हो सकता है, जो अक्सर पहचान में नहीं आता
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-एम्स के शोधकर्ताओं ने 45 वर्ष से कम उम्र के 64 सीएडी मरीजों का अध्ययन किया और उनकी तुलना 60 अन्य समान उम्र के मरीजों से की

सिमरन
नई दिल्ली। दिल की बीमारी बुजुर्गों के साथ युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के हालिया अध्ययन के अनुसार, कम उम्र में कोरोनरी धमनी रोग से जूझ रहे मरीजों में प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म (पीए) का खतरा भी छिपा हो सकता है, जो अक्सर पहचान में नहीं आता। यह हार्मोन से जुड़ी समस्या न सिर्फ ब्लड प्रेशर बढ़ाती है, बल्कि दिल पर अतिरिक्त दबाव भी डालती है। समय रहते इसकी पहचान से युवाओं को बड़ी बीमारी से बचाया जा सकता है।
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एम्स के शोधकर्ताओं ने 45 वर्ष से कम उम्र के 64 सीएडी मरीजों का अध्ययन किया और उनकी तुलना 60 अन्य समान उम्र के मरीजों से की। जांच में जिन मरीजों में पीए के संकेत मिले, उन्हें आगे विशेष परीक्षणों से पुष्टि की गई। शोध में पाया गया कि लगभग 3.1 प्रतिशत युवा सीएडी मरीजों में पीए मौजूद था, जबकि तुलना समूह में यह समस्या नहीं मिली। जिन मरीजों में यह बीमारी पाई गई, उनमें ब्लड प्रेशर सामान्य से अधिक था और लंबे समय से उच्च रक्तचाप की समस्या बनी हुई थी।
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बीमारी की पहचान के लिए खून की जांच
शोधकर्ता इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज के मनीष कुमार ठाकुर, एम्स की मनस्विनी भट्ट और अल्पेश गोयल ने बताया कि बीमारी की पहचान खून की जांच से होती है, जिसमें रेनिन का स्तर कम और एल्डोस्टेरोन का स्तर ज्यादा होता है। पुष्टि के लिए सलाइन इन्फ्यूजन टेस्ट किया जाता है। अध्ययन से पता चला है कि जिन मरीजों में पीए पाया गया, उनके दिल की जांच (इकोकार्डियोग्राफी) में दिल की मांसपेशियां मोटी हो रही थीं। दक्षिण एशियाई देशों में कम उम्र में दिल की बीमारी होने का खतरा ज्यादा होता है।
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प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म क्या है?
प्राइमरी एल्डोस्टेरोनिज्म या कॉन सिंड्रोम एक अंतःस्रावी विकार है, जिसमें एड्रिनल ग्रंथियां बहुत अधिक एल्डोस्टेरोन हार्मोन बनाने लगती हैं। यह हार्मोन शरीर में रक्तचाप, नमक और पोटेशियम के स्तर को नियंत्रित करता है। इसका निदान आमतौर पर रक्त परीक्षण से होता है और उपचार में दवाएं या सर्जरी शामिल हैं।

कारण:
यह स्थिति तब होती है जब एक या दोनों एड्रिनल ग्रंथियां बहुत अधिक एल्डोस्टेरोन का उत्पादन करती हैं, जो रक्तचाप को नियंत्रित करता है और सोडियम, पोटेशियम को संतुलित करता है।
लक्षण:
उच्च रक्तचाप (अक्सर प्रतिरोधी), थकान-सिरदर्द-मांसपेशियों में ऐंठन और बार-बार प्यास या पेशाब आना
निदान:
प्रमुख परीक्षण में प्लाज्मा एल्डोस्टेरोन से रेनिन अनुपात शामिल है।
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