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भारत-पाक एक दूसरे के दुश्मन नहीं, आतंकवाद दोनों का दुश्मन

Sun, 20 Mar 2016 10:04 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 20 Mar 2016 10:04 PM IST
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Sufi Conference at Ramlila Maidan
राष्ट्रीय सूफी सम्मेलन - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली

ऑल इंडिया उलेमा मशाइक बोर्ड की ओर से आयोजित विश्व सूफी फोरम के आखिरी दिन रामलीला मैदान में पाकिस्तानी राजनेता व इस्लामिक विद्वान प्रो. ताहिर अल कादरी ने कहा कि भारत व पाकिस्तान एक-दूसरे के दुश्मन नहीं है।

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बल्कि आतंकवाद दोनों का दुश्मन है। दोनों सरकारों को अपना बजट आतंकवाद के खात्मे पर लगाना चाहिए। कादरी ने कहा कि दोनों देशों को बने 70 साल हो गए। न भारत खत्म होगा, न पाकिस्तान।
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दोनों देशों की आवाम आपस में मोहब्बत करती है। दोनों तरफ के लोग अमन चैन चाहते हैं। दोनों एक दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि आतंक दोनों का साझा दुश्मन है।

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इंतहा पसंद आम लोगों को मुस्लिम धर्म से दूर कर रहे हैं

Sufi Conference at Ramlila Maidan
राष्ट्रीय सूफी सम्मेलन - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली

सूफीवाद का इतिहास बताते हुए उन्होंने कहा कि हर काल में सूफी संतों को काफिर कहा गया, उनके खिलाफ फतवे जारी हुए। लेकिन कभी किसी सूफी ने किसी के खिलाफ फतवा जारी नहीं किया।

कादरी ने कहा कि इंतहा पसंद आम लोगों को मुस्लिम धर्म से दूर कर रहे हैं। जबकि सूफीवाद सभी को जोड़ता है। उन्होंने दो-टूक शब्दों ने कहा कि आतंकवाद का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है।

लेकिन कुछ राजनेता सत्ता को हासिल करने के लिए आतंकियों को पनाह देते हैं। आतंकियों का सफाया होने की जगह वह मालदार होते जा रहे हैं। आज अगर सूफीवाद को बढ़ावा मिले तो आतंक का सफाया हो सकता है।

इस्लाम से जुड़ा है सूफीवाद

Sufi Conference at Ramlila Maidan
राष्ट्रीय सूफी सम्मेलन - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली

फोरम में शामिल सभी विद्वानों का मानना था कि सूफीवाद इस्लाम से ताल्लुक रखता है। कादिरी ने तो कुरान की एक आयत और हदीस से लिए गए कुछ उद्धरणों का जिक्र करते हुए साबित किया कि मूल इस्लाम धर्म का सूफीवाद हिस्सा रहा है।

यूके के सूफी विद्वान पीर मोहम्मद अलाउद्दीन सिद्दीकी ने अपनी तकरीर में मुस्लिमों में फिरकों की बात को बढ़ावा दिया। उन्होंने मस्जिद, मदरसों के रहबरों पर हमला बोलते हुए कहा बाहर शांति का पैगाम लगा रहता है और अंदर दहशतगर्दी पनप रही होती है।

उन्होंने सीधे-सीधे सऊदी अरब के और दिल्ली के शाही इमाम पर हमला बोलते हुए कहा कि जो भी आतंकियों का समर्थन करता है, उनके खिलाफ एक फतवा जारी किया जाए जिसमें उन इमामों के पीछे नमाज की मनाही की जाए और समाज से बहिष्कार किया जाए।

Sufi Conference at Ramlila Maidan
राष्ट्रीय सूफी सम्मेलन - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली

मोहम्मद अलाउद्दीन की इस तकरीर से माहौल गरमाता देखकर तनवीर हाशमी ने मोर्चा संभाला। उन्होंने साफ-साफ कहा कि सूफी तालीम किसी फतवे की मोहताज नहीं है। सूफी दरगाहें सभी धर्म और जाति के लिए खुली हुई हैं।

ऑल इंडिया उलेमा मशाइक बोर्ड के सदर सैयद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने कहा आतंकवाद अगर समाप्त हो सकता है तो वह सूफी विचारधारा से ही संभव है।

आईएस की तरफ युवा वर्ग के झुकाव को देखते हुए केंद्र सरकार से मांग की कि ख्वाजा गरीब नवाज के नाम पर अजमेर में एक विश्वविद्यालय बनाया जाए और सूफी तालीम को पढ़ाया जाए। सिविल सर्विस कि सभी प्रतियोगिताओं में उर्दू और फारसी भाषा को शामिल करने की पुरजोर वकालत की गई।

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