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मलबे से अस्पताल तक: अपनों की एक झलक के लिए तड़पते रहे परिजन, किसी की आंखों में आंसू... किसी की जुबां पर दुआ
Thu, 08 Oct 2026 01:57 AM IST
दुष्यंत शर्मा
नितिन राजपूत, पूर्वी दिल्ली
नितिन राजपूत, पूर्वी दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 08 Oct 2026 01:57 AM IST
सार
हादसे की खबर मिलते ही परिजन बदहवास हालत में अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। किसी को अपने बेटे की चिंता थी तो कोई भाई, पति या बच्चे की सलामती की खबर लेने पहुंचा था।
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- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सीमापुरी में इमारत गिरने के बाद बुधवार को राजीव गांधी अस्पताल के बाहर का मंजर बेहद भावुक कर देने वाला था। हादसे की खबर मिलते ही परिजन बदहवास हालत में अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। किसी को अपने बेटे की चिंता थी तो कोई भाई, पति या बच्चे की सलामती की खबर लेने पहुंचा था। आंखों में डर, चेहरे पर बेचैनी और जुबान पर सिर्फ अपनों का नाम था।
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एक के बाद एक एंबुलेंस अस्पताल पहुंचती रही। सायरन की आवाज सुनते ही गेट के बाहर खड़े लोगों की नजरें उस पर टिक जातीं। एंबुलेंस का दरवाजा खुलते ही कई लोग उसकी ओर दौड़ पड़ते। हर किसी के मन में यही डर था कि कहीं उसमें उसका अपना तो नहीं है।
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अस्पताल के बाहर कई परिजन फूट-फूटकर रोते दिखाई दिए। कुछ लोग मोबाइल फोन पर रिश्तेदारों को हादसे की जानकारी दे रहे थे, जबकि कई लगातार अपने परिचितों से संपर्क करने में जुटे थे। कुछ परिजन हाथ जोड़कर भगवान से अपनों की सलामती की दुआ मांगते नजर आए। किसी परिवार के लिए कुछ मिनटों का इंतजार जैसे घंटों में बदल गया था।
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जैसे ही किसी घायल को स्ट्रेचर पर अस्पताल के भीतर ले जाया जाता, बाहर मौजूद लोग दुआ करने लगते। कुछ लोग घायल के चेहरे को पहचानने की कोशिश करते तो कुछ उसके कपड़ों और सामान के जरिए पहचान करने का प्रयास करते। हर स्ट्रेचर के साथ उम्मीद और आशंका दोनों जुड़ी थीं।
अस्पताल बना उम्मीद का ठिकाना
बाहर खड़े परिजनों के लिए अस्पताल उस समय सिर्फ इलाज की जगह नहीं, बल्कि उम्मीद का आखिरी सहारा था। मलबे में दबे अपनों की चिंता लेकर पहुंचे लोगों के लिए हर एंबुलेंस एक नई उम्मीद लेकर आती और हर गुजरता पल बेचैनी बढ़ाता।