बूझो तो जानें: अवपंक, स्वापक और ज्वलखंडाश्मी... ये शब्दों की पहेली नहीं, बल्कि UPSC में पूछे गए प्रश्न हैं
यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में कुछ इसी तरह के प्रश्न छात्रों से पूछे गए। ऐसे में छात्र जवाब देने में उलझे रहे। वे सवालों का सही जवाब कैसे दें, जब शब्द ही समझ से परे हों।
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अवपंक, द्योतित, अधिरोपित, विस्तारित, स्वापक, मानीटरन, विरचन, संपार्शि्वकीकृत, पीट भूमि, परजीवाभ्य, ज्वलखंडाश्मी, लिप्यंतरित... यह हिंदी के कठिन शब्दों की पहेली मात्र नहीं, बल्कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पूछे गए प्रश्न हैं। रविवार को यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में कुछ इसी तरह के प्रश्न छात्रों को उलझाए रखा।
सवालों का सही जवाब कैसे दें, जब शब्द ही समझ से परे हों। सवाल ठीक से समझे बिना जवाब नहीं बन सकता। प्रतिभागी ही नहीं एक्सपर्ट भी कहते हैं कि यह पहला मौका नहीं है जब हिंदी के इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल हुआ। रविवार को देशभर में सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की गई। इसके पहले प्रश्न पत्र में हिंदी के सवालों में इस्तेमाल कुछ शब्द बेहद ही कठिन देखने को मिला।
हिंदी को सरल और सर्वग्राही बनाने की आवश्यकता
एक तरफ हम हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में उत्थान करना चाहते है। दूसरी तरफ ऐसे शब्दों का चयन कर रहे है जो समझना बेहद ही कठिन हो। इसके लिए हिंदी को सरल और सर्वग्राही बनाने की आवश्यकता होगी। आवश्यक समझा जाए तो अंग्रेजी शब्द कोष डालकर इसे समृद्ध बनाया जा सकता है। इस तरह की भाषा हिंदी के छात्रों को डरा रहा है। आम धारना यह भी बनी है कि हिंदी में पढ़ाई कर सफलता मुश्किल है।सुझाव है कि लोक प्रचलित हिंदी, संस्कृत, उर्दू को समाहित किया जो आम प्रचलन में हो। -मणिकांत सिंह, डायरेक्टर द स्टडी एन इंस्टीट्यूट फॉर आईएएस
ऐसी भाषा एनसीईआरटी की किताबों में भी नहीं
यह शब्द न तो एनसीईआरटी की किताबों में देखने को मिलते हैं और न ही कॉलेज-स्कूल के पाठ्यक्रम की भाषा में। इतना ही नहीं यह संस्कृतनिष्ठ शब्दों से भी बाहर के शब्द कोष जैसी दिखते हैं। इस तरह के प्रश्न में हिंदी भाषी क्षेत्र के प्रतिभागी ऐसे उलझ जाते हैं कि उन्हें प्रश्न समझना कठिन हो जाता है। -प्रो सुनील सिंह, डायरेक्टर अभिव्यिक्ति आईएएस