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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   Story of nurse Megha James who saved the lives of 14-15 children in Jhansi fire incident

झांसी अग्निकांड: 'दिमाग काम नहीं कर रहा था... कपड़ों में आग लग गई', 14-15 बच्चों को नर्स मेघा ने दिया नया जीवन

Sun, 17 Nov 2024 10:47 PM IST
श्याम जी. पीटीआई, झांसी
पीटीआई, झांसी Published by: श्याम जी. Updated Sun, 17 Nov 2024 10:47 PM IST
सार

नर्स मेघा ने कहा, "मेरी चप्पल में आग लग गई और मेरा पैर जल गया। फिर मेरी कपड़ों में आग लग गई। उस समय मेरा दिमाग लगभग काम नहीं कर रहा था।" 
 

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Story of nurse Megha James who saved the lives of 14-15 children in Jhansi fire incident
अस्पताल में भर्ती नर्स मेघा जेम्स - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जब झांसी मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू वार्ड में आग लगी तो नर्स मेघा जेम्स ड्यूटी पर थीं। उन्होंने बचाव प्रयासों में खुद को झोंक दिया और कई शिशुओं को बचाकर एक नायक की भूमिका निभाई। यहां तक कि जब उनकी सलवार जल गई, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरों की मदद से 14-15 बच्चों को निकालने में सफल रहीं।

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भीषण आग का सामना करते हुए जेम्स का दिमाग इतनी तेजी से काम कर रहा था कि उसे खुद को जलाने की कोई परवाह नहीं थी। नर्स मेघा जेम्स ने कहा, "मैं एक बच्चे को इंजेक्शन देने के लिए सिरिंज लेने गई थी। जब मैं वापस आई तो मैंने देखा कि (ऑक्सीजन) कंसंट्रेटर में आग लग गई थी। मैंने वार्ड बॉय को बुलाया, जो आग बुझाने वाला यंत्र लेकर आया और उसे लगाने की कोशिश की, लेकिन तब तक आग फैल चुकी थी।

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'मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था'
उन्होंने पीटीआई वीडियो को बताया, "मेरी चप्पल में आग लग गई और मेरा पैर जल गया। फिर मेरी सलवार में आग लग गई। मैंने अपनी सलवार उतार दी और उसे फेंक दिया। उस समय मेरा दिमाग लगभग काम नहीं कर रहा था।" जेम्स ने बस एक और सलवार पहनी और बचाव अभियान में वापस चली गई। उन्होंने कहा, "वहां बहुत धुआं था और एक बार लाइट चली गई तो हमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। पूरे स्टाफ ने कम से कम 14-15 बच्चों को बाहर निकाला। वार्ड में 11 बिस्तर थे, जिनमें 23-24 बच्चे थे।"
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'अगर लाइटें नहीं बुझी होतीं तो और बच्चों को बचा सकते थे'
जेम्स ने कहा, 'अगर लाइटें नहीं बुझी होतीं तो वे और अधिक बच्चों को बचा सकते थे। यह सब बहुत अचानक हुआ। हममें से किसी ने भी इसकी उम्मीद नहीं की थी।' सहायक नर्सिंग अधीक्षक नलिनी सूद ने जेम्स की वीरता की प्रशंसा की और बचाव अभियान कैसे चलाया गया, इसकी कुछ बातें बताईं। उन्होंने कहा, "अस्पताल के कर्मचारियों ने बच्चों को निकालने के लिए एनआईसीयू वार्ड के शीशे तोड़ दिए, तभी नर्स मेघा की सलवार में आग लग गई। अपनी सुरक्षा की परवाह करने के बजाय, वह बच्चों को बचाने के लिए वहां रुकी और उन्हें बाहर लोगों को सौंप दिया।" 

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'उस दृश्य को याद करती हूं तो मुझे रोना आता है'
नलिनी सूद ने कहा, 'जेम्स का फिलहाल उसी मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है। उसने कहा कि उसे नहीं पता कि वह कितनी जली है। बचाए गए बच्चों को एनआईसीयू वार्ड के बहुत करीब एक वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया... जब मैं उस दृश्य को याद करती हूं तो मुझे रोना आता है।" मेडिकल कॉलेज में एनेस्थिसियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अंशुल जैन ने मानक बचाव अभियान के बारे में बताया और दावा किया कि अस्पताल ने टी प्रोटोकॉल का पालन किया।

पहले कम प्रभावित रोगियों को निकालने की है नीति
डॉ. अंशुल जैन ने कहा, "आईसीयू निकासी के दौरान ट्राइएज प्रक्रिया में नीति पहले कम प्रभावित रोगियों को निकालने की है। इस दृष्टिकोण के पीछे तर्क यह है कि न्यूनतम समर्थन की आवश्यकता वाले रोगियों को जल्दी से स्थानांतरित किया जा सकता है, जिससे बड़ी संख्या में निकासी को कम समय में पूरा किया जा सके। इसके विपरीत, वेंटिलेटर पर या उच्च ऑक्सीजन समर्थन की आवश्यकता वाले मरीज़ निकासी के लिए अधिक समय और संसाधनों की मांग करते हैं।"

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