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Delhi: जंतर-मंतर में राम यंत्र की आकृति करेगी आकर्षित, ऐतिहासिक स्मारक को सजा संवार कर दिया जा रहा नया रंग रूप

Sat, 30 Sep 2023 08:42 AM IST
विजय पुंडीर आशीष सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली
आशीष सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विजय पुंडीर Updated Sat, 30 Sep 2023 08:42 AM IST
सार

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) स्मारक को नया रंग-रूप दे रहा है। इसमें पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ाने के साथ ही साज-सज्जा की जा रही है। स्मारक को रात में रोशन करने की भी योजना है। जिससे लोग स्मारक को रात में भी देख सकेंगे।

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shape of Ram Yantra will attract tourists in Jantar Mantar
जंतर मंतर - फोटो : शुभम बंसल

विस्तार

जंतर-मंतर परिसर के बाहर मिश्र व राम यंत्र की आकृति उकेरी जाएगी। पर्यटकों को जयप्रकाश यंत्र की छवि भी यहां जल्द देखने को मिलेगी। इस ऐतिहासिक स्मारक को नया रंग रूप दिया जा रहा है। ऐसे में देश ही नहीं विदेशी पर्यटकों को भी यह दूर से ही आकर्षित करेगा। 

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विशेष बात यह है कि यहां पर्यटक इन यंत्रों के बारे में बाहर से ही जान सकेंगे और अंदर आकर इनके उपयोग को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे। पर्यटकों के लिए यहां इंटरप्रिटेशन केंद्र भी स्थापित किया गया है। इसमें प्राचीन खगोल विज्ञान के बारे में वीडियो, थ्रीडी व डिजिटल माध्यम से पर्यटकों को जागरूक किया जाएगा। 
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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) स्मारक को नया रंग-रूप दे रहा है। इसमें पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ाने के साथ ही साज-सज्जा की जा रही है। स्मारक को रात में रोशन करने की भी योजना है। जिससे लोग स्मारक को रात में भी देख सकेंगे। ऐसे में किसी यंत्र पर इसका विपरीत असर न पड़े, इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा। स्मारक के मुख्य द्वार की दीवार को ब्रिटिश कोलोनियल वास्तुकला पर निर्मित किया गया है। वहीं, नया टिकट काउंटर बनाया गया है। बता दें, यहां मौजूद यंत्रों को विशेषज्ञ की मदद से शुरू किए जाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है। इसके तहत भूमंडलीय विशेषज्ञों की मदद से यंत्रों पर मार्किंग की जाएगी।

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सन 1724 से 1734 ईस्वी के मध्य हुआ था निर्माण
जंतर मंतर में स्थित वृहद खगोलीय यंत्र विश्व की असाधारण कृतियों में से एक है। इनसे प्राचीन खगोलीय संस्थाओं के अंतिम स्वरूप के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। इसका निर्माण आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय (1724-1734) में कराया था। उन्होंने सबसे पहले प्रथम वेधशाला का निर्माण दिल्ली में किया गया था। इसके बाद जयपुर, उज्जैन, वाराणसी व मथुरा में वेध शालाओं का निर्माण किया था, इसमें मथुरा की वेधशाला काफी पहले ही नष्ट हो चुकी है। मिश्र यंत्र की मान्यता है कि इसका निर्माण जयसिंह के पुत्र महाराजा माधो सिंह ने (1751-68) द्वारा कराया था।  

उपग्रह की भी मिलेगी जानकारी
स्मारक में पर चार यंत्र मौजूद हैं। इसमें जयप्रकाश यंत्र का व्यास लगभग 6.33 मीटर है। इसका उपयोग खगोलीय पिंडों, स्थानीय समय व राशिवलयों का समन्वयात्मकता मापने के लिए किया जाता था। मिश्र यंत्र अंतरराष्ट्रीय समय दर्शाता है। इसमें जापान, आइलैंड, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड का समय देखा जा सकता था। वहीं, सम्राट यंत्र एशिया की सबसे बड़ी धूप घड़ी है। इससे राजा महाराजा ध्रुव तारा भी देखा करते थे। इसी तरह राम यंत्र ग्रह व उपग्रह के बारे में जानकारी देता था। स्मारक के सहायक संरक्षण अधिकारी ने बताया कि इसका कार्य कुछ माह में पूरा होने की उम्मीद है। 

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