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एम्स में एक नए घोटाले का पर्दाफाश
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 29 Sep 2014 08:27 AM IST
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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सर्जरी उपकरण की खरीद में घोटाले के बाद नया गड़बड़झाला सामने आया है। यह मामला एम्स में मरीजों के अप्वाइंटमेंट व रजिस्ट्रेशन के कंप्यूटराइजेशन से जुड़ा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड भी रखा जाना है।
इसमें एक विशेष कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए न सिर्फ योग्यता में वार्षिक टर्नओवर राशि बढ़ाई गई, बल्कि टेंडर जमा करने की तारीख भी घटा दी गई।
‘अमर उजाला’ के पास मौजूद अगस्त, 2014 में केंद्रीय सतर्कता आयोग को भेजी गई चिट्ठी के अनुसार एम्स की कंप्यूटराइजेशन कमेटी की गड़बड़ी की शिकायत को प्राथमिक जांच में सही पाया गया है। टेंडर एम्स के निदेशक की अनुमति से निकाले गए थे लेकिन बाद में बदलाव करने के लिए अनुमति नहीं ली गई।
जांच में यह बात भी सामने आई कि कुछ शर्तें शुरू में नहीं थी जो टेंडर डॉक्यूमेंट में जोड़ी गईं। महज 7 करोड़ के कार्य के लिए सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रखा गया, जबकि नियमानुसार 70 करोड़ होना चाहिए था।
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सूत्र बताते हैं कि एम्स में कंप्यूटराजेशन के काम के लिए 4 कंपनियों ने टेंडर भरे थे। अलग-अलग स्तर पर टेंडर खुलने से पहले ही तीन कंपनियों को आयोग्य घोषित कर दिया गया। उसी में से एक कंपनी ने स्वास्थ्य मंत्रालय में शिकायत की थी।
मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी ने एम्स के निदेशक को मामले की जांच के लिए पत्र लिखा था। निदेशक ने तत्कालीन मुख्य सतर्कता अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को जांच सौंपी। उन्होंने संबंधित कमेटी के चेयरमैन को बुलाकर पूछताछ की और कागजातों की जांच की। उसमें गड़बड़ी पाई गई है।
सूत्र बताते हैं कि प्राथमिक जांच में गड़बड़ियों की पुष्टि होने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग के निदेशक को आगे की कार्रवाई के लिए सिफारिश भेजी गई है। सिफारिश में कहा गया है कि गड़बड़ियां हुई हैं, आगे की कार्रवाई के दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।
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इसमें एक विशेष कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए न सिर्फ योग्यता में वार्षिक टर्नओवर राशि बढ़ाई गई, बल्कि टेंडर जमा करने की तारीख भी घटा दी गई।
‘अमर उजाला’ के पास मौजूद अगस्त, 2014 में केंद्रीय सतर्कता आयोग को भेजी गई चिट्ठी के अनुसार एम्स की कंप्यूटराइजेशन कमेटी की गड़बड़ी की शिकायत को प्राथमिक जांच में सही पाया गया है। टेंडर एम्स के निदेशक की अनुमति से निकाले गए थे लेकिन बाद में बदलाव करने के लिए अनुमति नहीं ली गई।
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जांच में यह बात भी सामने आई कि कुछ शर्तें शुरू में नहीं थी जो टेंडर डॉक्यूमेंट में जोड़ी गईं। महज 7 करोड़ के कार्य के लिए सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रखा गया, जबकि नियमानुसार 70 करोड़ होना चाहिए था।
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सूत्र बताते हैं कि एम्स में कंप्यूटराजेशन के काम के लिए 4 कंपनियों ने टेंडर भरे थे। अलग-अलग स्तर पर टेंडर खुलने से पहले ही तीन कंपनियों को आयोग्य घोषित कर दिया गया। उसी में से एक कंपनी ने स्वास्थ्य मंत्रालय में शिकायत की थी।
मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी ने एम्स के निदेशक को मामले की जांच के लिए पत्र लिखा था। निदेशक ने तत्कालीन मुख्य सतर्कता अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को जांच सौंपी। उन्होंने संबंधित कमेटी के चेयरमैन को बुलाकर पूछताछ की और कागजातों की जांच की। उसमें गड़बड़ी पाई गई है।
सूत्र बताते हैं कि प्राथमिक जांच में गड़बड़ियों की पुष्टि होने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग के निदेशक को आगे की कार्रवाई के लिए सिफारिश भेजी गई है। सिफारिश में कहा गया है कि गड़बड़ियां हुई हैं, आगे की कार्रवाई के दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।