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सेनेटरी नैपकिन से नहीं फैलेगी गंदगी, इंजीनियरिंग की छात्राओं ने ईजाद की तकनीक

Mon, 08 Oct 2018 05:52 AM IST
सीमा शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
सीमा शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 08 Oct 2018 05:52 AM IST
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Sanitary napkins will not spread garbage, engineering students developed techniques
centenary Napkin Destroy Pot - फोटो : अमर उजाला

सेनेटरी नैपकिन से अब मिट्टी या जमीन प्रदूषित नहीं होगी। इंजीनियरिंग की छात्राओं ने नैपकिन को गलाने की तकनीक ईजाद की है। इसमें सेनेटरी नैपकिन राख बन जाएगी। यह राख लोहे की सफाई में प्रयोग होगी। खास बात यह है कि इस तकनीक से प्रदूषण में कमी आएगी और मिट्टी के बर्तन बनाने वालों को रोजगार का मौका मिलेगा।  

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इंदिरा गांधी दिल्ली तकनीकी महिला विश्वविद्यालय की बीटेक की 36 छात्राओं की टीम ने सामाजिक सरोकार में यह अनोखी तकनीक तैयार की है। टीम की प्रोजेक्ट मैनेजर सुमेधा और गुरमिशा के मुताबिक, मासिक धर्म में महिलाओं व बच्चियों को बीमारियों से बचाने के लिए सेनेटरी नैपकिन का प्रयोग जरूरी है।
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जो सेनेटरी नैपकिन मार्केट में उपलब्ध हैं, वे जमीन में जाकर खत्म (गलना) नहीं होते हैं। क्योंकि यह बायोडिग्रेडिबल नहीं है। एक रिसर्च के मुताबिक, सेनेटरी नैपकिन में प्रयोग होने वाला प्लास्टिक रूपी पॉलिथीन सैकड़ों सालों तक जमीन में रह सकता है। सेनेटरी नैपकिन के चलते जमीन प्रदूषित होती है, नालियों में रुकावट और नदियों में मछली या अन्य जीवों की मौत का कारण बनती है।  

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टेराकोटा, सीमेंट व क्ले से बनाया डिजाइन  

टीम सदस्यों के मुताबिक, सेनेटरी नैपकिन को खत्म करने के लिए टेराकोटा, सीमेंट व क्ले से एक बड़ा सा गमले की शेप का डस्टबिन तैयार किया गया है। यह इस प्रकार तैयार किया गया है जो कि 400 डिग्री तापमान में भी काम कर सकता है। इस गमले के अंदर एक स्टील की प्लेट लगी है। इसी गमले में एक्टीवेटेड कार्बन फिल्टर भी लगाया गया है।

सेनेटरी नैपकिन को प्रयोग के बाद इस डस्टबिन में डालकर एक साइड से आग लगा दें। सेनेटरी नैपकिन जलने से दो प्रकार का केमिकल (डाइऑक्सिन और फ्यूरी) धुंआ बनकर निकलता है। इस धुएं को एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर सोख लेगा। आखिर में जो राख बचेगी, उसे ग्लास और मेटल क्लीनर में प्रयोग करने वाली कंपनी 80 रुपये प्रति 100 ग्राम के हिसाब से खरीदती हैं।  

एक  कार्बन फिल्टर 700 नैपकिन लगाएगा ठिकाने 
टीम सदस्यों के अनुसार, एक कार्बन फिल्टर 600 से 700 सेनेटरी नेपकिन को खत्म करने की क्षमता रखता है। फिलहाल दिल्ली में चार स्थानों पर पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा है। टीम इस तकनीक को जल्द की पेटेंट करवाने के लिए आवेदन करेगी। मिट्टी से प्रति गमला तैयार करवाने के लिए कुम्हार समुदाय को 3500 रुपये दिए जा रहे हैं। जबकि इस पूरी तकनीक रूपी डस्टबिन को तैयार करने में पांच हजार रुपये का खर्चा आ रहा है।

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