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कैंसर से साइबर-युद्ध कर वो जीत गया यूएन पुरस्कार

Mon, 27 Oct 2014 12:36 PM IST
Updated Mon, 27 Oct 2014 12:36 PM IST
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Rahul's cyber battle from cancer win him un prize.

अगस्त 2013 में जब राहुल यादव को पता चला कि उसे दुर्लभ किस्म का कैंसर है तब उसने ऑनलाइन खोजना शुरू किया कि उसके पास कितना वक्त है। उस वक्त राहुल 28 साल का था और एक आईटी कंपनी में अच्छा काम कर रहा था।

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अपनी बातें बताते हुए राहुल जोर से हंसता है और कहता है कि हम कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाले लोग हैं, हम वही मानते हैं जो ऑनलाइन दिखता है। इसके बाद यादव बैंगलुरू छोड़कर दिल्ली अपने घर वापस आ गया। परिवार से उसे काफी सहारा मिला।
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इसके अलावा उसने कई वेबाइट और दुनियाभर में चल रहे अनेक ग्रुप आदि से जानकारियां लीं। इस खोज ने उसे एक नया सपोर्ट ग्रुप बनाने की प्रेरणा की दी, जिसका नाम राहुल ने योद्धा रखा।
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उसके इस प्रयास ने रंग दिखाना शुरू किया और जनवरी में उसे इसके लिए पिपुल्स च्वाइस अवार्ड मिला। इसके साथ ही अक्टूबर में राहुल को यूनेस्को की तरफ से हुए यूथ सीटिजेन ऑन्टरप्रोन्योर कॉम्पटीशन में दूसरा स्थान मिला।

पहले चल रहा था डेंगू का इलाज

Rahul's cyber battle from cancer win him un prize.

राहुल बताते हैं कि कैंसर का पता चलना अपने आप में एक बड़ा शॉक था। राहुल का इलाज डेंगू के लिए चल रहा था क्योंकि उसके ब्लड टेस्ट में प्लेटलेट्स काफी कम पाए गए थे। बाद में डेंगू टेस्ट निगेटिव आने पर उसे बताया गया कि उसे कैंसर है।

इस खबर से वह दुखी तो था ही पर वह काफी संशय में था। इसका कारण था कि डॉक्टर भी ये समझ नहीं पा रहे थे कि उसे ये कैसे हुआ। डॉक्टरों ने राहुल को बताया भी कि वह शायद इस बीमारी का सबसे युवा मरीज है। क्योंकि यह बीमारी 40 से कम उम्र में बहुत ही कम लोगों को होती है।

अपने इलाज के दौरान राहुल ने कई ऑनलाइन ग्रुप्स से अपने डाइट, दवाईयों के साइड-इफेक्ट जैसे विषयों पर सलाह ली। राहुल के कीमोथेरेपी के 15 सेशन्स हुए और उसे अधिकतर सहायता विदेश में बसे सपोर्ट ग्रुप से मिली।

राहुल बताता है कि वो एक ऐसा ग्रुप बनाना चाहता जिसमें एक मरीज सीधे दूसरे मरीज से संपर्क कर अपने अनुभव साझा कर सके। इसलिए उसने खुद ही एक ऐसा ग्रुप बनाया और उसमें वो लोग थे जो उसे अपने इलाज के दौरान अस्पताल में मिले थे। छोटे स्तर से शुरू हुए इस ग्रुप में अब करीब 2000 मरीज और उनके परिवार के सदस्य हैं।

'कैंसर मरीजों पर दया की जगह करें मदद'

Rahul's cyber battle from cancer win him un prize.

राहुल कहता है कि किसी भी कैंसर मरीज को बहुत मुश्किलों से गुजरना होता है। वो इससे लड़कर बाहर आते हैं। वो एक योद्धा है जिसकी केवल मदद की जानी चाहिए ना कि दया दिखानी चाहिए।

राहुल बताता है कि ब्लड कैंसर के अधिकतर मरीज 40 के पार उम्र के होते हैं और उन्हें यह बताने में बहुत परेशानी होती है कि उन्हें कैंसर है। इस बीमारी के बाद कई दोस्त आप से दूर हो जाते हैं।

राहुल कहता है कि यह उसकी समझ से परे है कि उसके कई दोस्त थे पर उनमें से आज कोई नहीं। कई अंजाने लोग दोस्त बन गए हैं और कई सारे दोस्त जा चुके हैं।

उसके प्रयास से कैंसर के खिलाफ शुरू हुई ऑनलाइन जंग की वजह से मिले पुरस्कार ने उसका हौसला तो जरूर बढ़ाया है। लेकिन वो इस कोशिश में है कि अपने साथ ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ सके, जिससे जागरूकता अभियान चलाए जा सकें।

'युवा होते हैं सबसे अच्छे डोनर'

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राहुल की टीम कॉलेज के छात्रो के संपर्क में है और उन्हें जंक फूड और धूम्रपान से दूर रखने की मुहिम शुरू कर चुकी है। इसका एक कारण और भी है कि छात्रों की उम्र सबसे बेहतर होती है बोन मैरो दान करने की। वही जगह जहां ब्लड प्लेटलेट्स बनते हैं।

यादव कहता है कि 16 से 30 उम्र के लोग बेस्ट डोनर होते हैं। यादव और उसका समूह मिलकर बोन मैरो डोनेशन के बारे में भी जागरूकता फैला रहा है। भारत में डोनरों की संख्या बहुत कम है। यादव को खुद भी बोन मैरो ट्रांस्प्लांट कराना है पर अब तक उसे कोई सही मैच नहीं मिला है।

योद्धा ग्रुप के लोग भले ही ऑनलाइन मिले हों पर वो अधिकतर जानकारियां फोन पर ही साझा करते हैं। राहुल कहता है कि सुबह में अक्सर उसे कुछ कॉल आते हैं जो दवाई संबंधी प्रश्नों को लेकर होते हैं।

तब वह उन्हें हेल्दी डायट के कुछ टिप्स देता है जैसे हल्दी खाएं। राहुल बोलता भी है कि न तो वो डॉक्टर है और ना ही एक ऐसा व्यक्ति है जिसने कैंसर से लड़ाई जीत ली है। वह खुद भी अभी लड़ रहा है इस बीमारी से।

साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया

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