Talaq-E-Hasan: दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस आयुक्त से मांगा जवाब, तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका का मामला
दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है। अवकाशकालीन न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा ने दिल्ली पुलिस आयुक्त, डाबडी थानाध्यक्ष व याची महिला के पति से जवाब मांगा है।
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हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली पुलिस आयुक्त, डाबडी थानाध्यक्ष व याची महिला के पति को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। तलाक-ए-हसन के अनुसार एक मुस्लिम व्यक्ति तीन महीने के लिए महीने में एक बार 'तलाक' कहकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है।
अवकाशकालीन न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा ने दोनों पक्षों को अपना पक्ष दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई 18 अगस्त तय की है। याची महिला ने दावा किया कि शादी के बाद उसके पति और उसके परिवार के सदस्यों ने न केवल ससुराल में बल्कि उसकी मां के आवास पर भी उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, क्योंकि उन्होंने नकदी और महंगे उपहार की अनुचित मांगों को पूरा करने से इनकार कर दिया। पत्नी ने अपने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया है।
याचिका में दावा किया गया है कि उसके और उसके परिवार के खिलाफ किसी भी कार्रवाई से बचने के लिए उसके पति ने तलाक-ए-हसन को प्राथमिकता दी और उसे पहला नोटिस दिया। याचिका में कहा गया है कि तलाक-ए-हसन न केवल मनमाना, अवैध, निराधार, कानून का दुरुपयोग है, बल्कि एकतरफा अतिरिक्त-न्यायिक अधिनियम भी है जो सीधे अनुच्छेद 14, 15, 21, 25 और संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का उल्लंघन है। याचिका में तर्क दिया गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 एक गलत धारणा देता है कि कानून तलाक-ए-हसन को एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक होने की अनुमति देता है, जो याचिकाकर्ता और अन्य विवाहित मुस्लिम महिलाओं के के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
याची ने कहा मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 का विघटन, तलाक-ए-हसन से याचिकाकर्ता की रक्षा करने में विफल रहता है, जिसे अन्य धर्मों की महिलाओं के लिए वैधानिक रूप से सुरक्षित किया गया है। याचिका में कहा गया है कि तलाक-ए-हसन संविधान के अनुच्छेद 21 का इस कारण से उल्लंघन करता है कि यह पुरुषों और महिलाओं के बीच भेदभाव करता है जिससे महिला की गरिमा के अधिकार का घोर उल्लंघन होता है।
याचिका में कहा गया है इसलिए, तलाक-ए-हसन की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकार के साथ हस्तक्षेप करती है। उक्त अधिकार को केवल एक न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और उचित कानून द्वारा ही छीना जा सकता है, जिसका वर्तमान मामले में अभाव है।
याची ने तलाक-ए-हसन को चुनौती देने के अलावा याचिका में निर्देश के लिए प्रार्थना की गई है कि सभी धार्मिक समूह, निकाय और नेता जो इस तरह की प्रथाओं की अनुमति और प्रचार करते हैं, उन्हें याचिकाकर्ता को सरिया कानून के अनुसार कार्य करने और तलाक-ए-हसन को स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। याची ने सभी धार्मिक समूहों, निकायों और नेताओं से सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस को निर्देश देने का आग्रह किया गया है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि यह प्रथा भेदभावपूर्ण है क्योंकि केवल पुरुष ही इसका प्रयोग कर सकते हैं, यह प्रथा असंवैधानिक है क्योंकि यह मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह इस्लामी आस्था का एक अनिवार्य अभ्यास नहीं है।