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Noida News: सीजन में पश्चिमी विक्षोभ तो अब मोंथा चक्रवात से किसान बेहाल
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बारिश से गिरी धान की फसल।
महराजगंज। इस वर्ष का मौसम जैसे किसानों से किसी तरह का बदला लेेने पर आमादा है। मानसूनी सीजन में बादलों को जहां पश्चिमी विक्षोभ ने प्रभावित किया, वहीं लौट चुके मानसून के बाद अब मोंथा चक्रवात किसानों को बेचारा बनाने पर आमादा है। तमाम मौसमी झंझावात झेलने के बाद इन दिनों लगभग काटने लायक फसल खेतों में है, लेकिन बेमौसम बारिश और हवाओं का रुख देख किसानों के होश फाख्ता हैं। सुरक्षित फसल कटकर घर तक पहुंच पाएगा, इसपर संशय के बादलों ने किसानों की नींद उड़ा रखी है।
2025 में मानसून इस बार समय से पहले पूर्वी यूपी में पहुंचा, लेकिन बारिश का दौर मजबूत होता कि इससे पहले पश्चिमी विक्षोभ के प्रभावी होने से मेहरबानी पश्चिमी यूपी की तरफ चली गई। जिन क्षेत्रों में कभी औसत बारिश तक नहीं होती थी उन क्षेत्रों में औसत से अधिक बारिश हुई और तराई का जिला प्रतीक्षा करता रहा।
लौटते मानसून ने सितंबर में थोड़ी बहुत मेहरबानी की बारिश के साथ विदाई कर ली। मौसम से लोहा लेते हुए किसानों ने किसी तरह खरीफ की धान फसल तैयार की, लेकिन मानसून की विदाई के बाद मोंथा की आफत उस तैयार फसल को गिरफ्त में लेने पर आमादा है।
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सिर्फ नुकसान झेलते रहे जिले के किसान : जिले में इस बार खरीफ की बुआई से लेकर सिंचाई और अब कटाई में किसानों को सिर्फ नुकसान ही झेलना पड़ा। महदेवा के किसान सतीश कुमार व विनय ने बताया कि पहले की तरह मानसून की मेहरबानी इस बार सावन में भी जनपद में नहीं देखी गई। जलवायु परिवर्तन के कारण किसी क्षेत्र में छिटपुट बारिश तो कहीं सूखे के हालात तीन से चार किमी के दायरे में दिखे। नहर व निजी संसाधन से किसी तरह रोपाई कराई गई तो खाद की किल्लत शुरू हो गई। यूरिया के लिए लाइन लगाते रह गए। इन असुविधाओं को झेलकर किसी तरह फसल अब तैयार थी, लेकिन कटाई से पहले बारिश उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा है। बारिश के साथ अगर हवा ने रफ्तार दिखाई तो तैयार फसल खेतों में लेट जाएगी और पूरी मेहनत बर्बाद हो जाएगी। कम्हरिया के किसान अरविंद चौधरी ने बताया कि जनपद में लगभग 85 फीसदी धान की फसल खेत में है। लेट बुआई के कारण फसल पकने में कसर और स्ट्रारिपर वाले कंबाइन से कटाई की अनिवार्यता ने किसानों को कहीं का नहीं छोड़ा। अपनी गाढ़ी कमाई को हम छिनता देखकर भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं।
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2025 में मानसून इस बार समय से पहले पूर्वी यूपी में पहुंचा, लेकिन बारिश का दौर मजबूत होता कि इससे पहले पश्चिमी विक्षोभ के प्रभावी होने से मेहरबानी पश्चिमी यूपी की तरफ चली गई। जिन क्षेत्रों में कभी औसत बारिश तक नहीं होती थी उन क्षेत्रों में औसत से अधिक बारिश हुई और तराई का जिला प्रतीक्षा करता रहा।
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लौटते मानसून ने सितंबर में थोड़ी बहुत मेहरबानी की बारिश के साथ विदाई कर ली। मौसम से लोहा लेते हुए किसानों ने किसी तरह खरीफ की धान फसल तैयार की, लेकिन मानसून की विदाई के बाद मोंथा की आफत उस तैयार फसल को गिरफ्त में लेने पर आमादा है।
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सिर्फ नुकसान झेलते रहे जिले के किसान : जिले में इस बार खरीफ की बुआई से लेकर सिंचाई और अब कटाई में किसानों को सिर्फ नुकसान ही झेलना पड़ा। महदेवा के किसान सतीश कुमार व विनय ने बताया कि पहले की तरह मानसून की मेहरबानी इस बार सावन में भी जनपद में नहीं देखी गई। जलवायु परिवर्तन के कारण किसी क्षेत्र में छिटपुट बारिश तो कहीं सूखे के हालात तीन से चार किमी के दायरे में दिखे। नहर व निजी संसाधन से किसी तरह रोपाई कराई गई तो खाद की किल्लत शुरू हो गई। यूरिया के लिए लाइन लगाते रह गए। इन असुविधाओं को झेलकर किसी तरह फसल अब तैयार थी, लेकिन कटाई से पहले बारिश उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा है। बारिश के साथ अगर हवा ने रफ्तार दिखाई तो तैयार फसल खेतों में लेट जाएगी और पूरी मेहनत बर्बाद हो जाएगी। कम्हरिया के किसान अरविंद चौधरी ने बताया कि जनपद में लगभग 85 फीसदी धान की फसल खेत में है। लेट बुआई के कारण फसल पकने में कसर और स्ट्रारिपर वाले कंबाइन से कटाई की अनिवार्यता ने किसानों को कहीं का नहीं छोड़ा। अपनी गाढ़ी कमाई को हम छिनता देखकर भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं।