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Noida News: चॉक, मार्कर के लिए स्कूल मोहताज, अब तक नहीं मिला ग्रांट
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चॉक, मार्कर के लिए स्कूल मोहताज, अब तक नहीं मिला ग्रांट
- सत्र शुरू हुए छह महीने बीते, शिक्षक अपनी जेब से कर रहे खर्च
- छात्रों की पढ़ाई हो रही प्रभावित, बैंच तक की नहीं हो पा रही मरम्मत
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। परिषदीय स्कूलों में सत्र शुरू हुए छह महीने हो गए हैं, लेकिन अभी तक कंपोजिट ग्रांट नहीं मिल पाया। इससे स्कूलों में चॉक, पैन, रजिस्टर, बिजली व पानी आदि की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही। छात्रों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है। वहीं, कई स्कूलों के शिक्षक अपनी जेब से खर्च करके इन जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, लेकिन ग्रांट के आगे यह ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रही है।
जिले में 511 परिषदीय स्कूलों में करीब 90 हजार छात्र पढ़ते हैं। प्रत्येक स्कूल में ग्रांट वहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या के अनुसार दिया जाता है। हालांकि इस सत्र में छात्र और शिक्षक इसकी अब तक राह देख रहे हैं। इसके न मिलने से कई स्कूलों में टूटी बैंच को भी ठीक नहीं कराया जा सका है, वहीं कई स्कूलों में मूलभूत सामग्री व सुविधाएं बिल्कुल नदारद हैं। अभिभावक अपने बच्चों को बड़ी उम्मीद के साथ स्कूल भेज रहे हैं, लेकिन बिना सामग्री के शिक्षक चाह कर भी इनका भला नहीं कर पा रहे। कुछ स्कूलों के शिक्षकों का कहना है, खुद के पैसे खर्च करके वह काम तो चला रहे हैं, लेकिन इन पैसों के लौटने की आस कम ही रहती है। बहुत से छोटे-छोटे काम ऐसे होते हैं, जिसका जीएसटी बिल नहीं होता है। बिना जीएसटी बिल इनका रुपया उन्हें वापस नहीं मिल पाता।
हरौला के जूनियर स्कूल की प्रधानाचार्या अनीता संकलानी ने बताया कि आधा सत्र बीत चुका है। बच्चों की पढ़ाई का काफी नुकसान हो चुका है। अब इस सप्ताह ग्रांट आने की उम्मीद है। मोरना के कंपोजिट स्कूल की प्रधानाचार्या शांति पांडेय ने बताया कि अभी तो अपनी ही जेब से पैसा खर्च करना पड़ रहा है। ग्रांट आने पर स्कूल के कई काम कराए जाने बाकी हैं।
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खर्च नहीं हो पाता कंपोजिट ग्रांट
स्कूलों का कहना है कि कंपोजिट ग्रांट आधा सत्र खत्म होने के बाद आता है। इस वजह से स्कूलों में बहुत से काम हो नहीं हो पाता है। फिर हर साल बड़ा अमाउंट बिना खर्च किए ही लौटा दिया जाता है। अगर ग्रांट समय से आए तो उसे सही से प्रयोग में लाया जा सकता है। अभिभावकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा का दावा किया जाता है, लेकिन जब बच्चों व शिक्षकों को जरूरत की सामग्री ही उपलब्ध नहीं हो रही तो यहां बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना कैसे की जा सकती है। इन्हीं हालातों के चलते वह बच्चों को महंगी फीस पर निजी स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर होते हैं।
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इस आधार पर मिलता है ग्रांट
छात्र संख्या ग्रांट
एक से 30 10 हजार रुपये
31 से 100 तक 25 हजार रुपये
101 से 250 50 हजार रुपये
251 से 1000 75 हजार रुपये
1000 से अधिक एक लाख रुपये
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अभी तक बीआरसी और स्कूलों को कंपोजिट ग्रांट नहीं मिल पाया है। इस महीने आने की उम्मीद है।
यश पाल, एडिशनल बेसिक शिक्षा अधिकारी
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- सत्र शुरू हुए छह महीने बीते, शिक्षक अपनी जेब से कर रहे खर्च
- छात्रों की पढ़ाई हो रही प्रभावित, बैंच तक की नहीं हो पा रही मरम्मत
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। परिषदीय स्कूलों में सत्र शुरू हुए छह महीने हो गए हैं, लेकिन अभी तक कंपोजिट ग्रांट नहीं मिल पाया। इससे स्कूलों में चॉक, पैन, रजिस्टर, बिजली व पानी आदि की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही। छात्रों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है। वहीं, कई स्कूलों के शिक्षक अपनी जेब से खर्च करके इन जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, लेकिन ग्रांट के आगे यह ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रही है।
जिले में 511 परिषदीय स्कूलों में करीब 90 हजार छात्र पढ़ते हैं। प्रत्येक स्कूल में ग्रांट वहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या के अनुसार दिया जाता है। हालांकि इस सत्र में छात्र और शिक्षक इसकी अब तक राह देख रहे हैं। इसके न मिलने से कई स्कूलों में टूटी बैंच को भी ठीक नहीं कराया जा सका है, वहीं कई स्कूलों में मूलभूत सामग्री व सुविधाएं बिल्कुल नदारद हैं। अभिभावक अपने बच्चों को बड़ी उम्मीद के साथ स्कूल भेज रहे हैं, लेकिन बिना सामग्री के शिक्षक चाह कर भी इनका भला नहीं कर पा रहे। कुछ स्कूलों के शिक्षकों का कहना है, खुद के पैसे खर्च करके वह काम तो चला रहे हैं, लेकिन इन पैसों के लौटने की आस कम ही रहती है। बहुत से छोटे-छोटे काम ऐसे होते हैं, जिसका जीएसटी बिल नहीं होता है। बिना जीएसटी बिल इनका रुपया उन्हें वापस नहीं मिल पाता।
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हरौला के जूनियर स्कूल की प्रधानाचार्या अनीता संकलानी ने बताया कि आधा सत्र बीत चुका है। बच्चों की पढ़ाई का काफी नुकसान हो चुका है। अब इस सप्ताह ग्रांट आने की उम्मीद है। मोरना के कंपोजिट स्कूल की प्रधानाचार्या शांति पांडेय ने बताया कि अभी तो अपनी ही जेब से पैसा खर्च करना पड़ रहा है। ग्रांट आने पर स्कूल के कई काम कराए जाने बाकी हैं।
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खर्च नहीं हो पाता कंपोजिट ग्रांट
स्कूलों का कहना है कि कंपोजिट ग्रांट आधा सत्र खत्म होने के बाद आता है। इस वजह से स्कूलों में बहुत से काम हो नहीं हो पाता है। फिर हर साल बड़ा अमाउंट बिना खर्च किए ही लौटा दिया जाता है। अगर ग्रांट समय से आए तो उसे सही से प्रयोग में लाया जा सकता है। अभिभावकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा का दावा किया जाता है, लेकिन जब बच्चों व शिक्षकों को जरूरत की सामग्री ही उपलब्ध नहीं हो रही तो यहां बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना कैसे की जा सकती है। इन्हीं हालातों के चलते वह बच्चों को महंगी फीस पर निजी स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर होते हैं।
इस आधार पर मिलता है ग्रांट
छात्र संख्या ग्रांट
एक से 30 10 हजार रुपये
31 से 100 तक 25 हजार रुपये
101 से 250 50 हजार रुपये
251 से 1000 75 हजार रुपये
1000 से अधिक एक लाख रुपये
अभी तक बीआरसी और स्कूलों को कंपोजिट ग्रांट नहीं मिल पाया है। इस महीने आने की उम्मीद है।
यश पाल, एडिशनल बेसिक शिक्षा अधिकारी