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Noida News: सबवेंशन स्कीम में बिल्डर व बैंकों के गठजोड़ पर जांच शुरु

Fri, 09 May 2025 06:37 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Fri, 09 May 2025 06:37 PM IST
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Investigation begins on collusion between builders and banks in subsidy scheme
-नोएडा प्राधिकरण पहुंची सीबीआई टीम, नोडल अधिकरी से कई प्लॉट आवंटन को लेकर मांगी जानकारी
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-29 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने दिया था सीबीआई को जांच व प्राधिकरण को नोडल नियुक्त करने का आदेश

माई सिटी रिपोर्टर,

नोएडा। सबवेंशन स्कीम में फ्लैट खरीदारों को फंसाने के लिए बिल्डर व बैंकों के गठजोड़ पर सीबीआई ने जांच शुरू कर दी है। 29 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सुपरटेक समेत अन्य बिल्डरों की ऐसी योजनाओं की जांच का आदेश दिया था। इसके साथ ही प्राधिकरण को जांच के लिए जानकारी उपलब्ध कराने को नोडल अधिकारी नियुक्त करने के लिए कहा था।
मिली जानकारी के मुताबिक गुरुवार को सीबीआई टीम इस प्रकरण में जांच को नोएडा प्राधिकरण पहुंची। प्राधिकरण में नियुक्त नोडल अधिकारी की जानकारी मांगी। इस पर यह बताया गया कि अकाउंट ऑफिसर संजीव दत्ता को नोडल बनाया गया है। फिर टीम ने पहुंच कर अकाउंट ऑफिसर को पत्र देकर कुछ प्लॉटों के आवंटन व अन्य जानकारियां एक हफ्ते में मांगी है। बात अगर नोएडा, ग्रेटर नोएडा में सबवेंशन स्कीम के तहत लाई गई ग्रुप हाउसिंग योजनाओं की करें तो 2014 में इसकी शुरुआत हुई। 2017-018 तक ये योजनाएं बिल्डरों की तरफ से लांच की गईं।
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लेकिन लांच करने वाले अधिकतर बिल्डर दिवालिया हुए हैं। इनमें फ्लैट खरीदार फंसे हैं। इस स्कीम में एनसीआर में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गांव व अन्य जगहों पर करीब 40 परियोजनाओं में फ्लैट खरीदारों को फंसाया गया है। फ्लैट खरीदारों की याचिका पर पूरा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में है। कोर्ट यह टिप्पणी कर चुका है कि परियोजनाओं में खरीदारों को बंधक बना दिया गया है। नोएडा प्राधिकरण से मिली जानकारी के मुताबिक सीबीआई ने कुछ प्लॉट के आवंटन का ब्यौरा मांगा है। यह पूछा है कि इन प्लॉट का आवंटन कब और किस बिल्डर को हुआ। मौजूदा समय में बकाया व अन्य स्थिति को भी स्पष्ट करने के लिए कहा गया है।
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यह थी सबवेंशन स्कीम-

ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए बिल्डर व बैंकों ने एक साथ मिलकर सबवेंशन स्कीम शुरू की थी। इसमें बिल्डर यह वादा करते थे कि फ्लैट में कब्जा न मिलने तक किश्त वह देंगे, कब्जा मिलने के बाद खरीदार को देनी होंगी। बदले में बैंक, बिल्डर, खरीदारों के बीच त्रिपक्षीय करार कर लोन करवाया जाता था। करीब 10 प्रतिशत धनराशि खरीदार बिल्डर को देता था। बाकी लोन की रकम एकमुश्त बिल्डर को बैंक से मिल जाती थी। आरबीआई ने जब इसे पोंजी स्कीम करार दिया फिर यह बंद हुई। बहुत सी परियोजनाओं में बिल्डरों ने खरीदार से लोन करवाकर रकम तो ली। लेकिन किश्तें जमा नहीं की। खरीदारों को घर नहीं मिला और वह बैंक डिफाल्टर भी हो गए।
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